बंगाल में लोकतंत्र, विकास और अस्मिता की निर्णायक परीक्षा-घड़ी

By ललित गर्ग | Jan 20, 2026

पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय एक ऐसे संक्रमण काल से गुजर रही है, जहां सत्ता, संघर्ष, कानून और जनभावना-चारों धाराएं एक-दूसरे से टकराती हुई दिखाई देती हैं। यह टकराव केवल भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई भर नहीं है, बल्कि यह उस शासन शैली, लोकतांत्रिक मर्यादा और विकास दृष्टि की भी परीक्षा है, जिसके आधार पर बंगाल अपनी आने वाली राजनीतिक दिशा तय करेगा। लंबे समय तक “खेला होगा” के नारे के सहारे भाजपा को रोकने में सफल रहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सामने इस बार परिस्थितियां अपेक्षाकृत अधिक जटिल, चुनौतीपूर्ण और बहुआयामी नजर आ रही हैं। आज समूचे देश की नजरे पश्चिम बंगाल पर टिकी है। वहां आगामी विधानसभा काफी रोमांचक एवं निर्णायक होगा, जिसमें पश्चिम बंगाल का नया भविष्य बुनने की दिशाएं उद्घाटित होगी।

 

एक ओर केंद्र और राज्य के बीच टकराव अपने चरम पर है, तो दूसरी ओर केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई, अदालती टिप्पणियां और कानूनी बहसें राजनीतिक विमर्श को नियंत्रित कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों ने केवल एक कानूनी प्रश्न ही नहीं उठाया, बल्कि यह संकेत भी दिया कि राज्य सरकारों द्वारा केंद्रीय जांच एजेंसियों के कामकाज में हस्तक्षेप की सीमाएं कहां तक हो सकती हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने ममता बनर्जी की उस राजनीतिक छवि को आंशिक रूप से प्रभावित किया है, जो अब तक स्वयं को केंद्र के कथित दमन के विरुद्ध संघीय ढांचे की रक्षक के रूप में प्रस्तुत करती रही हैं। अदालतों में लंबी चलने वाली कानूनी लड़ाइयों का राजनीतिक प्रभाव तुरंत और गहरा होता है, विशेषकर तब, जब चुनाव नजदीक हों और जनता का ध्यान प्रशासनिक उपलब्धियों से हटकर आरोप-प्रत्यारोप पर केंद्रित होने लगे। बंगाल की राजनीति की एक विशिष्ट विशेषता यह रही है कि यहां विचारधारा और भावनाएं अत्यंत तीव्र रूप से अभिव्यक्त होती हैं। वाम मोर्चे के लंबे शासन के बाद ममता बनर्जी का उदय एक जनांदोलन के रूप में हुआ था। उन्होंने न केवल वामपंथी वर्चस्व को तोड़ा, बल्कि खुद को गरीब, हाशिए के वर्ग और क्षेत्रीय अस्मिता की आवाज के रूप में स्थापित किया। शुरुआती वर्षों में उनकी सरकार ने कुछ कल्याणकारी योजनाओं और सशक्त राजनीतिक संप्रेषण के माध्यम से जनता का विश्वास भी अर्जित किया। किंतु समय के साथ सत्ता का केंद्रीकरण, संगठन पर अत्यधिक नियंत्रण और विरोध के प्रति असहिष्णुता जैसे आरोप भी समानांतर रूप से उभरते गए।

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भाजपा ने इन्हीं कमजोरियों को अपना राजनीतिक आधार बनाने की कोशिश की है। 2019 के लोकसभा चुनावों से लेकर अब तक भाजपा ने बंगाल में अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत किया है और हिंदुत्व, राष्ट्रवाद तथा भ्रष्टाचार विरोधी विमर्श को आक्रामक रूप से आगे बढ़ाया है। हालांकि विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने भारी बहुमत से वापसी की, लेकिन यह भी सच है कि भाजपा बंगाल की राजनीति में एक स्थायी और निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित हो चुकी है। मत प्रतिशत में अंतर और सीटों का आंकड़ा भाजपा के लिए भले ही निराशाजनक रहा हो, पर संगठनात्मक विस्तार और सामाजिक आधार का विस्तार उसके लिए भविष्य की संभावनाओं के द्वार खोलता है। हाल के वर्षों में बंगाल में विकास का प्रश्न अपेक्षाकृत पीछे छूटता दिखाई दिया है। उद्योग, निवेश और रोजगार के मुद्दे राजनीतिक शोर में दब गए हैं। आम जनता की एक बड़ी चिंता यह भी है कि राज्य की राजनीति निरंतर टकराव और हिंसा के आरोपों से क्यों घिरी रहती है। चुनावी हिंसा, राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर हमले और प्रशासन की निष्पक्षता पर उठते सवाल राज्य की छवि को नुकसान पहुंचाते हैं। पड़ोसी देशों से अवैध घुसपैठ, सीमावर्ती इलाकों में जनसांख्यिकीय बदलाव और कानून-व्यवस्था की चुनौतियां भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुकी हैं। इन मुद्दों पर ममता सरकार का रुख अक्सर रक्षात्मक दिखाई देता है, जबकि भाजपा इन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर व्यापक समर्थन जुटाने का प्रयास करती है।


महाराष्ट्र के शहरी निकाय चुनावों और बिहार में भाजपा को मिली हालिया सफलता ने पार्टी के आत्मविश्वास को निश्चित रूप से बढ़ाया है। भाजपा का यह विश्वास कि बंगाल अब भी राजनीतिक परिवर्तन के लिए तैयार है, केवल चुनावी आंकड़ों पर आधारित नहीं है, बल्कि वह इसे एक लंबी रणनीति का हिस्सा मानती है। किंतु बंगाल कोई साधारण राजनीतिक मैदान नहीं है। यहां की सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक चेतना और ऐतिहासिक स्मृति किसी भी दल के लिए आसान नहीं रही है। ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत आज भी उनकी जमीनी पकड़ और भावनात्मक अपील है, जो उन्हें भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से अलग, एक क्षेत्रीय और स्थानीय नेता के रूप में स्थापित करती है। आने वाले विधानसभा चुनाव वास्तव में इस बात की कसौटी होंगे कि जनता विकास, स्थिरता और कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता देती है या फिर भावनात्मक और पहचान आधारित राजनीति को? क्या ममता बनर्जी लगातार चौथी बार सत्ता में लौटकर यह सिद्ध कर पाएंगी कि केंद्र से टकराव ही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है, या भाजपा जनता को यह विश्वास दिलाने में सफल होगी कि परिवर्तन ही स्थायित्व और विकास का रास्ता है, यह प्रश्न अभी खुला हुआ है। अदालती प्रक्रियाएं, राजनीतिक बयानबाजी और चुनावी रणनीतियां अपनी जगह हैं, लेकिन अंतिम निर्णय बंगाल की जनता के हाथ में है।


पश्चिम बंगाल की राजनीति आज संकीर्णता और सांप्रदायिक ध्रूवीकरण के ऐसे दौर से गुजर रही है, जिसने विकास की गति को गंभीर रूप से अवरुद्ध किया है। कभी देश की आर्थिक, औद्योगिक और बौद्धिक राजधानी कहलाने वाला बंगाल-विशेषकर कोलकाता, आज निवेश, उद्योग और रोजगार के मोर्चे पर पिछड़ता हुआ दिखाई देता है। ममता बनर्जी के लंबे शासनकाल में औद्योगिक विश्वास का क्षरण, पूंजी पलायन, बंद होती इकाइयाँ और युवाओं का अन्य राज्यों की ओर पलायन इस गिरावट के स्पष्ट संकेत हैं। लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर उठते प्रश्न, विपक्षी आवाज़ों का दमन और चुनावी हिंसा की घटनाएँ राज्य के लोकतांत्रिक स्वास्थ्य पर गहरी चोट करती हैं। इसके साथ ही, राज्य में सामाजिक ताने-बाने को लेकर बढ़ती आशंकाएँ भी कम चिंताजनक नहीं हैं। अनेक क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था, धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक संबंधों को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं; विशेषकर हिंदू समाज के एक हिस्से में असुरक्षा की भावना ने जनमन को आहत किया है। इन घटनाओं और धारणाओं ने जनता के भरोसे को कमजोर किया है और शासन के प्रति निराशा को बढ़ाया है। राजनीति जब पहचान और विभाजन के इर्द-गिर्द सिमटती है, तो विकास, समावेशन और सामाजिक सौहार्द पीछे छूट जाते हैं, यही आज के बंगाल की त्रासदी बनती दिख रही है।


ऐसे समय में बंगाल की जनता के लिए अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति सजग होना अनिवार्य है। यह राज्य केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि उसकी अस्मिता उसकी बौद्धिक परंपरा, भावनात्मक संवेदनशीलता, धार्मिक सहअस्तित्व, आध्यात्मिक खोज और समृद्ध साहित्यिक विरासत से निर्मित है-रवींद्रनाथ से विवेकानंद तक की धरोहर इसे दिशा देती रही है। दंगों, हिंसा और भय के साए में इस अस्मिता पर जो दाग लगे हैं, उन्हें मिटाने का मार्ग शांतिपूर्ण, जागरूक और निर्भीक लोकतांत्रिक सहभागिता से ही निकलेगा। आगामी चुनाव जनता के लिए आत्ममंथन और आत्मनिर्णय का अवसर हैं-जहाँ मत केवल सत्ता नहीं, बल्कि बंगाल के भविष्य, उसकी संस्कृति और उसके लोकतांत्रिक आत्मसम्मान की रक्षा का माध्यम बनना चाहिए। बंगाल की बनती नई तस्वीर अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। यह तस्वीर संघर्ष और संभावनाओं, आशंकाओं और उम्मीदों से बनी है। एक ओर सत्ता का अनुभव और जनाधार है, तो दूसरी ओर आक्रामक विपक्ष और राष्ट्रीय राजनीति की ताकत। लोकतंत्र की यही खूबी है कि वह अंतिम शब्द जनता को देता है। बंगाल के मतदाता ही तय करेंगे कि शह-मात की इस राजनीति में अगली चाल किसकी होगी और कौन-सा पक्ष अंततः बाजी मारेगा।


- ललित गर्ग

लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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