विश्व पर्यावरण दिवसः मौसम का लगातार बिगड़ता मिजाज हमें सचेत करने के लिए पर्याप्त है

By योगेश कुमार गोयल | Jun 03, 2022

प्रकृति समय-समय पर अपना प्रकोप दिखाते हुए गंभीर संकेत देती रही है कि विकास के नाम पर हम प्रकृति से भयानक तरीके से जो खिलवाड़ कर रहे हैं, उसके परिणामस्वरूप मौसम का मिजाज कब कहां किस कदर बदल जाए, उसकी कई दिनों पहले भविष्यवाणी करना अब मुश्किल है। इस साल गर्मी के मौसम की शुरूआत के दौरान लगने लगा था कि इस वर्ष भीषण गर्मी पड़ेगी, मौसम वैज्ञानिकों द्वारा भी ऐसी ही चेतावनी दी गई थी इस साल तो मार्च के माह से ही गर्मी की शुरूआत हो गई। ग्लोबल वार्मिंग के चलते दुनियाभर में मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है। न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर तापमान में लगातार हो रही बढ़ोतरी और मौसम का निरन्तर बिगड़ता मिजाज गंभीर चिंता का सबब बना है।

राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर प्रकृति के बिगड़ते मिजाज को लेकर चर्चाएं और चिंताएं तो बहुत होती हैं, तरह-तरह के संकल्प दोहराये जाते हैं किन्तु सुख-संसाधनों की अंधी चाहत, सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि, अनियंत्रित औद्योगिक विकास और रोजगार के अधिकाधिक अवसर पैदा करने के दबाव के चलते ऐसी चर्चाएं और चिंताएं प्रायः अर्थहीन होकर रह जाती हैं। प्रकृति कभी समुद्री तूफान तो कभी भूकम्प, कभी सूखा तो कभी अकाल के रूप में अपना विकराल रूप दिखाकर हमें चेतावनियां देती रही है किन्तु जलवायु परिवर्तन से निपटने के नाम पर वैश्विक चिंता व्यक्त करने से आगे हम शायद कुछ करना ही नहीं चाहते। पर्यावरण संरक्षण को लेकर इन्हीं सब चिंताओं, तथ्यों और समाधानों की चर्चा ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक में विस्तारपूर्वक की गई है। मौसम की प्रतिकूलता साल दर साल किस कदर बढ़ रही है, यह इसी से समझा जा सकता है कि कहीं भयानक सूखा तो कहीं बेमौसम अत्यधिक वर्षा, कहीं जबरदस्त बर्फबारी तो कहीं कड़ाके की ठंड, कभी-कभार ठंड में गर्मी का अहसास तो कहीं तूफान और कहीं भयानक प्राकृतिक आपदाएं, ये सब प्रकृति के साथ हमारे खिलवाड़ के ही दुष्परिणाम हैं।

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मौसम का लगातार बिगड़ता मिजाज हमें यह सचेत करने के लिए पर्याप्त है कि अगर हम इसी प्रकार प्रकृति के संसाधनों का बुरे तरीके से दोहन करते रहे तो हमारे भविष्य की तस्वीर कैसी होने वाली है। हम नहीं समझना चाहते कि पहाड़ों का सीना चीरकर हरे-भरे जंगलों को तबाह कर हम कंक्रीट के जो जंगल विकसित कर रहे हैं, वह वास्तव में विकास नहीं बल्कि विकास के नाम पर हम अपने विनाश का ही मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। कुछ वर्ष पूर्व तक पर्वतीय क्षेत्रों का ठंडा वातावरण हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करता था किन्तु पर्वतीय क्षेत्रों में यातायात के साधनों से बढ़ते प्रदूषण, बड़े-बड़े उद्योग स्थापित करने और राजमार्ग बनाने के नाम पर बड़े पैमाने पर वनों के दोहन और सुरंगें बनाने के लिए बेदर्दी से पहाड़ों का सीना चीरते जाने का ही दुष्परिणाम है कि हमारे इन पहाड़ों की ठंडक भी धीरे-धीरे कम हो रही है। पहाड़ों में लगातार बढ़ती गर्माहट के चलते ही अब अक्सर घने वनों में भयानक आग लगने की खबरें सुनने को मिलती रहती हैं। पहाड़ों की इसी गर्माहट का सीधा असर निचले मैदानी इलाकों पर पड़ता है, जहां का पारा अब वर्ष दर वर्ष बढ़ रहा है। पिछले कुछ दशकों में वन-क्षेत्रों को बड़े पैमाने पर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील किया जाता रहा है। प्राकृतिक संसाधनों का बड़े पैमाने पर दोहन किया जा रहा है। इससे पर्यावरण की सेहत पर जो प्रहार हुआ है, उसी का परिणाम है कि पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है और समुद्रों का भी तापमान बढ़ने से समुद्री तूफान भयंकर चक्रवात के रूप में दुनियाभर में तबाही मचा रहे हैं।

प्रकृति हमें उपहार स्वरूप शुद्ध हवा, शुद्ध पानी, शुद्ध मिट्टी तथा ढ़ेरों जनोपयोगी चीजें दे रही है लेकिन अगर पर्यावरण असंतुलन तथा मौसम का मिजाज इसी प्रकार बिगड़ता रहा तो आने वाले वर्षों में पूरी दुनिया को इसके बेहद गंभीर परिणाम भुगतने को तैयार रहना होगा। अगर मानवीय क्रियाकलापों द्वारा पैदा किए जा रहे पर्यावरण संकट के चलते प्रकृति कुपित होती है तो उसे सब कुछ तबाह कर डालने में पलभर की भी देर नहीं लगेगी। विश्वभर में प्रदूषण के बढ़ते स्तर के कारण हर साल तरह-तरह की बीमारियों के कारण लोगों की मौतों की संख्या तेजी से बढ़ रही हैं। यहां तक कि बहुत से नवजात शिशुओं पर भी प्रदूषण के दुष्प्रभाव स्पष्ट देखे जाने लगे हैं। चिंताजनक स्थिति यह है कि दुनियाभर के सर्वाधिक प्रदूषित तीस शहरों में से अधिकांश भारत के ही हैं। बहरहाल, प्रकृति ने कोरोना जैसी महामारी के जरिये ही सही, हमें पर्यावरण संरक्षण को लेकर सोचने-समझने का स्वर्ण अवसर दिया है कि यदि हम चाहें तो अपने क्रियाकलापों में बदलाव लाकर आसानी से प्रकृति एवं पर्यावरण संरक्षण में मददगार बन सकते हैं। अगर प्रकृति से खिलवाड़ कर पर्यावरण को क्षति पहुंचाकर हम स्वयं इन समस्याओं का कारण बने हैं और गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं को लेकर वाकई चिंतित हैं तो इन समस्याओं का निवारण भी हमें ही करना होगा।

योगेश कुमार गोयल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा पर्यावरण मामलों के जानकार हैं, जिनकी पर्यावरण संरक्षण पर ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है)

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