डोनाल्ड ट्रंप की कूटनीतिक ब्लैकमेलिंग का वैश्विक फलाफल

By कमलेश पांडे | Jan 20, 2026

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कथित ब्लैकमेलिंग वाली कूटनीतिक रणनीति, विशेष रूप से टैरिफ़ और क्षेत्रीय दावों के माध्यम से, उनके मित्र देश रह रह कर परेशान हो उठते हैं। जबकि अमेरिका के शत्रु देश उनको आंख दिखाकर अपनी मनवाने से भी नहीं चूकते, खासकर चीन, रूस और ईरान जैसे दबंग देश। इससे जहां वैश्विक कूटनीति चौराहे पर खड़ी प्रतीत होती है, वहीं उनकी ढुलमुल नीति व्यापार को गहराई से प्रभावित कर रही है। यही वजह है कि यूरोपीय देश, जापान, भारत आदि अंदर से बेचैन हैं। सच कहूं तो राष्ट्रपति ट्रंफ का यह अव्यवहारिक व मतलबपरस्त रुख आर्कटिक सुरक्षा, नाटो एकता और बहुपक्षीय व्यापार नियमों को खुली चुनौती दे रहा है। 

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जहां तक चीन-अमेरिका व्यापार युद्ध की बात को इस ब्लैकमेलिंग वाली कसौटी पर कसें तो प्रतीत होता है कि साल 2025 में ट्रंप द्वारा चीन पर 104% टैरिफ़ लगाने को चीन (बीजिंग) ने खुलकर "ब्लैकमेलिंग" बताया और अंत तक लड़ने का वादा किया। चीनी पीएम ली कियांग ने इसे संरक्षणवाद का उदाहरण माना, और प्रतिक्रिया स्वरूप यूरोपीय संघ के साथ सहयोग बढ़ाने की बात कही। इससे वैश्विक शेयर बाजारों में मंदी की आशंका बढ़ी, क्योंकि अमेरिका ने 70+ देशों पर रेसिप्रोकल टैरिफ़ लागू किए।

वहीं ट्रंफ की ब्लैकमेलिंग वाली कूटनीति का वैश्विक प्रभाव भी साफ दिख रहा है, क्योंकि उनकी इस रणनीति से नाटो जैसे गठबंधनों में दरार डाल पड़ने लगी है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में अस्थिरता के संकेत भी मिलने लगे हैं, क्योंकि 1 फरवरी 2026 की डेडलाइन नजदीक है। यूरोप ने आपात बैठक बुलाई, जबकि भारत जैसे देश भी 26% से 50 प्रतिशत टैरिफ़ का सामना कर रहे हैं। इससे इनकी बेचैनी समझी जा सकती है। कुल मिलाकर, ट्रंफ की ब्लैकमेलिंग वाली कूटनीति सिर्फ अमेरिका-प्रथम नीति को प्राथमिकता देती है, लेकिन इससे बहुपक्षीय संस्थाओं के कमजोर होते चले जाने की आशंका भी निराधार नहीं है। 

देखा जाए तो अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियां नाटो पर दबाव बढ़ा रही हैं, खासकर ग्रीनलैंड विवाद और रक्षा खर्च मांग के माध्यम से। इसके वैश्विक दुष्प्रभाव या असर को समझते हुए ही अमेरिका ने पश्चिमी गोलार्द्ध में खुद को मजबूत करने के लिए बेनेज़ुएला सम्प्रभुता तहस नहस कांड कांड जैसा दुस्साहस दिखाया। इससे रूस, चीन, भारत, ईरान की फटी पड़ी पैबंद भी सामने आ गई। यह सबकुछ इसलिए किया गया ताकि "अमेरिका फर्स्ट" दृष्टिकोण को और अधिक मजबूत किया जा सके। अमेरिका की यह खुली पहल उसके नेतृत्व वाले नाटो गठबंधन की एकता को दो टूक चुनौती दे रही है, लेकिन कुछ नाटो सदस्यों ने जिस तरह से अपना रक्षा बजट बढ़ाया है, उससे ट्रंफ का मनोबल बढ़ा है। 

जहां तक ग्रीनलैंड सम्बन्धी तनाव की बात है तो ट्रंप की ग्रीनलैंड अधिग्रहण जैसी अव्यवहारिक मांग का विरोध होने के बाद अमेरिका ने डेनमार्क, स्वीडन, जर्मनी जैसे नाटो सदस्यों पर भी 10% टैरिफ़ लगाए, जो 25% तक बढ़ सकते हैं। जबकि यूरोपीय देशों ने आर्कटिक में सैन्य तैनाती बढ़ाई, जबकि ट्रंप ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बताया। इस पर नाटो प्रमुख मार्क रुटे ने ट्रंफ सेवबातचीत की, लेकिन विशेषज्ञ इसे गठबंधन के "सबसे काले घंटे" की संभावना मानते हैं। 

जहां तक नाटो देशों पर रक्षा खर्च बढ़ाने सम्बन्धी अमेरिकी दबाव की बात है तो ट्रंप ने सदस्य देशों से जीडीपी का 5% रक्षा पर खर्च करने की मांग की, जो पहले 2% के वेल्स वादे से दुगुने से भी ऊपर है। उनके दावे के अनुसार, इस दबाव से खर्च बढ़ा, लेकिन यूरोप को अमेरिकी सुरक्षा "ब्लैंक चेक" बंद करने की चेतावनी दी। इससे यूरोपीय नेता नाराज़ हैं, जो नाटो विस्तार (जैसे यूक्रेन) रोकने का संकेत भी देता है। 

जहां तक ट्रंफ के ब्लैकमेलिंग वाली कूटनीति के संभावित प्रभाव की बात है तो इस बात में कोई दो राय नहीं कि उनकी ये नीतियां नाटो में दरार पैदा कर सकती हैं, और ट्रांस-अटलांटिक संबंधों को कमजोर करेंगी। 

यही वजह है कि अमेरिकी संसद में नाटो से निकासी के विधेयक आए हैं, हालांकि तत्काल विदड्रॉल नहीं हुआ। कुल मिलाकर, लेन-देन वाली कूटनीति गठबंधन की विश्वसनीयता को खतरे में डाल रही है। जबकि अमेरिकी सोच है कि यूरोप की गफलत में फंसकर रूस और एशिया की चकरघिन्नी में फंसकर चीन से खुली दुश्मनी लेने से बेहतर है कि खुद को पश्चिमी गोलार्द्ध यानी उत्तर अमेरिका व दक्षिण अमेरिका के देशों के बीच महफूज रखो और यहां पर यूरोपीय/एशियाई देशों की दाल नहीं गल सके, इस हेतु बेनेज़ुएला जैसी अप्रत्याशित कार्रवाई करते रहो।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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