स्मार्टफोन संयमित उपयोग की वैश्विक जरूरत

By ललित गर्ग | Jun 25, 2026

विज्ञान और तकनीक ने मानव सभ्यता को अभूतपूर्व गति प्रदान की है। आज का युग डिजिटल युग है, जहां एक क्लिक पर पूरी दुनिया हमारी हथेली में सिमट आई है। स्मार्टफोन ने संचार, शिक्षा, व्यापार, बैंकिंग, स्वास्थ्य, शासन और सामाजिक संबंधों को नई दिशा दी है। लेकिन हर तकनीकी क्रांति अपने साथ कुछ गंभीर चुनौतियां भी लेकर आती है। स्मार्टफोन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यह जितना बड़ा वरदान सिद्ध हुआ है, उतना ही बड़ा अभिशाप भी बनता जा रहा है। विशेष रूप से बच्चों और किशोरों पर इसके दुष्प्रभावों ने पूरी दुनिया को चिंतित कर दिया है। आज विश्वभर में यह स्वीकार किया जा रहा है कि स्मार्टफोन केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि एक ऐसी शक्ति है, जिसका विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है। दुर्भाग्यवश, विवेक और अनुशासन के अभाव में इसका नकारात्मक पक्ष अधिक मुखर हो रहा है। स्मार्टफोन की लत बच्चों और युवाओं में मानसिक तनाव, अवसाद, एकाकीपन, हिंसक प्रवृत्तियों, अश्लीलता, साइबर अपराध और सामाजिक विघटन का कारण बन रही है। यही कारण है कि आज केवल परंपरागत समाज और विकासशील देश ही नहीं, बल्कि विकसित देश भी इस चुनौती से निपटने के लिए कठोर कदम उठा रहे हैं।

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वास्तव में स्मार्टफोन जहां वरदान है, वहीं अभिशाप भी है। इससे ज्ञान का भंडार भी उपलब्ध है और भ्रम का संसार भी। यह शिक्षा का माध्यम भी है और अश्लीलता तथा हिंसा का प्रवेश-द्वार भी। यह रोजगार के अवसर भी देता है और साइबर अपराध की राह भी खोलता है। आज अनेक युवा रातों-रात अमीर बनने की लालसा में साइबर ठगी, सेक्सटॉर्शन, ऑनलाइन जुआ और डिजिटल धोखाधड़ी जैसे अपराधों में फंस रहे हैं। सोशल मीडिया पर फैल रही अश्लील सामग्री, फेक न्यूज, नफरत और ट्रोल संस्कृति ने सामाजिक मूल्यों को गहरी चोट पहुंचाई है। सबसे अधिक चिंता का विषय बच्चों और किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य है। शोध बताते हैं कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम से बच्चों की एकाग्रता, स्मरण शक्ति और रचनात्मक क्षमता प्रभावित होती है। नींद में कमी, चिड़चिड़ापन, अवसाद, चिंता, आत्महत्या की प्रवृत्ति और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। परिवारों में संवाद कम हुआ है और डिजिटल निकटता के बावजूद भावनात्मक दूरियां बढ़ी हैं। बच्चे खेल के मैदानों से दूर होकर आभासी दुनिया में खोते जा रहे हैं।

विशेषतः ‘स्मार्टफोन एक दुधारी तलवार है’। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) और अत्याधुनिक संचार माध्यमों ने इस चुनौती को और अधिक जटिल बना दिया है। एआई जहां शिक्षा, चिकित्सा, अनुसंधान और प्रशासन के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला रही है, वहीं इसके दुरुपयोग की आशंकाएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। डीपफेक वीडियो, फर्जी ऑडियो, साइबर ठगी, पहचान की चोरी, फेक न्यूज और डिजिटल ब्लैकमेल जैसे अपराधों में एआई का इस्तेमाल चिंताजनक स्तर तक बढ़ गया है। स्मार्टफोन इस पूरी प्रक्रिया का सबसे सुलभ और प्रभावी माध्यम बन गया है। एक साधारण मोबाइल फोन के माध्यम से आज कोई भी व्यक्ति एआई आधारित एप्लीकेशनों का उपयोग कर नकली तस्वीरें और वीडियो तैयार कर सकता है, भ्रामक सूचनाएं फैला सकता है या साइबर अपराधों को अंजाम दे सकता है। विशेष रूप से किशोर और युवा, जिनके पास तकनीकी कौशल तो है लेकिन नैतिक प्रशिक्षण और परिपक्वता का अभाव है, वे अनजाने में अथवा त्वरित लाभ की लालसा में ऐसे कृत्यों में संलिप्त हो सकते हैं। इसलिए आवश्यक है कि एआई और स्मार्टफोन के उपयोग के साथ-साथ डिजिटल नैतिकता, मानवीय मूल्यों और कानूनी जिम्मेदारियों का भी समुचित प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि तकनीक मानवता के विकास का साधन बने, विनाश का नहीं। इस संदर्भ में यह कथन अत्यंत प्रासंगिक है-‘विज्ञान बिना विवेक के विनाश का कारण बनता है, जबकि विवेक के साथ वही विज्ञान मानवता का वरदान बन जाता है।’

ऐसी स्थिति में भारत में भी व्यापक राष्ट्रीय विमर्श की आवश्यकता है। भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाला देश है और एक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से अग्रसर है। यदि भारत को विश्वगुरु के रूप में अपनी भूमिका निभानी है, तो उसे तकनीक और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। भारत द्वारा निर्मित नीतियां न केवल देश, बल्कि विश्व के लिए भी मार्गदर्शक बन सकती हैं। इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाए जा सकते हैं-पहला, बच्चों और किशोरों के लिए स्मार्टफोन उपयोग की आयु-सीमा और समय-सीमा निर्धारित की जाए। एक निश्चित आयु तक बच्चों को केवल आवश्यक और नियंत्रित डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। 

दूसरा, स्कूलों में साइबर साक्षरता और डिजिटल नैतिकता को पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए। बच्चों को केवल तकनीक का उपयोग ही नहीं, बल्कि उसके दुष्परिणामों और कानूनी पहलुओं की जानकारी भी दी जानी चाहिए। तीसरा, अभिभावकों को डिजिटल पैरेंटिंग का प्रशिक्षण दिया जाए। बच्चों को मोबाइल थमाकर जिम्मेदारी पूरी नहीं होती-उन्हें मार्गदर्शन, संवाद और संस्कार भी देने होंगे। चौथा, सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। हानिकारक और अश्लील सामग्री पर प्रभावी नियंत्रण, आयु सत्यापन और एल्गोरिदम की पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। पांचवां, युवाओं के लिए रोजगार, कौशल विकास और रचनात्मक अवसरों का विस्तार किया जाए, ताकि वे त्वरित धनार्जन के प्रलोभन में अपराध की ओर न बढ़ें।

भारतीय संस्कृति सदैव संयम की संस्कृति रही है। हमारे ऋषियों ने सिखाया है कि किसी भी साधन का मूल्य उसके उपयोग में निहित होता है। आग भोजन भी पका सकती है और घर भी जला सकती है-दोष आग का नहीं, उपयोगकर्ता का होता है। यही बात स्मार्टफोन पर भी लागू होती है। आज आवश्यकता डिजिटल दुनिया से कटने की नहीं, बल्कि डिजिटल जिम्मेदारी, साइबर साक्षरता और संयमित उपयोग की है। तकनीक का विरोध समाधान नहीं है, बल्कि उसके साथ नैतिकता, विवेक और मानवीय मूल्यों का समन्वय ही स्थायी समाधान है। स्मार्टफोन मानव की सेवा का साधन बने, मानव का स्वामी नहीं-इसी में व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का कल्याण निहित है।

 - ललित गर्ग

लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार

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