द ग्रेट 'कवि-सम्मेलन' वॉर (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त' | Nov 27, 2025

मिसिरबाबू, आपको फिर से लख-लख बधाइयाँ! इस बार आप उस महायुद्ध से बच निकले हैं जिसका नाम है “द ग्रेट कवि-सम्मेलन वॉर”। यह कोई साधारण युद्ध नहीं, यह कविता का मंचीय महाभारत है, जहाँ अर्जुन और दुर्योधन की जगह अब 'कवि' और 'संयोजक' खड़े हैं। यहाँ तीर-कमान नहीं चलते, बल्कि 'माइक', 'तालियाँ' और 'पैसे दो पहले' के नारे चलते हैं। यह वह युद्ध है जिसमें कविता, साहित्य और संस्कृति सब कुछ 'स्टेज लाइट' की गोली से ढेर हो जाते हैं।

सोचिए मिसिरबाबू, कल तक जो कवि अपने कमरे में गहन चिंतन करके कविता लिखते थे, आज वही कवि मंच पर खड़े होकर 'सुरीली मूर्खता' गा रहे हैं। मोहल्ले का शर्मा जी, जिनके घर में कभी 'दिनकर' और 'निराला' की किताबें थीं, अब कवि-सम्मेलन में जाकर 'हँसी के ठहाके' खरीद रहे हैं क्योंकि टिकट सिनेमा से सस्ता है। कविता की परिभाषा अब इतनी नाजुक हो गई है कि अगर कवि ने मंच पर 'देशभक्ति' की दो लाइनें नहीं पढ़ीं तो श्रोता उसे 'देशद्रोही' घोषित कर देते हैं।

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यमलोक में भी इस 'कवि-सम्मेलन वॉर' का असर पहुँच चुका है। चित्रगुप्त जी का 'कविता-प्रोसेसर 2.0' बार-बार क्रैश हो रहा है। यमराज ने इमरजेंसी मीटिंग बुलाई। "चित्रगुप्त! ये क्या हो रहा है? कल तक जो लोग 'कविता' लिखकर पुण्य कमा रहे थे, आज उनके खाते में 'स्टेज पर उखाड़ दिया' की एंट्री क्यों आ रही है?" चित्रगुप्त ने सिर पीट लिया। "प्रभु, अब पुण्य और पाप का हिसाब कविता से नहीं, बल्कि 'तालियों' से तय होता है। जिसने सबसे ज़्यादा तालियाँ बटोरीं वही पुण्यवान है। जिसने मंच पर फिसड्डी साबित किया गया वही पापी है। और जिसने कविता लिखी लेकिन मंच पर नहीं पढ़ी, उसे तो सीधे नरक में भेजा जा रहा है।"

मिसिरबाबू, यह युद्ध इतना खतरनाक है कि अब कविता की असली परीक्षा 'तालियों' और 'हँसी' से होती है। कवि संयोजक को 'ब्लॉक' कर रहा है क्योंकि उसने पैसे नहीं दिए। संयोजक कवि को 'अनफ्रेंड' कर रहा है क्योंकि उसने मंच पर 'फ्लॉप' कर दिया। भाई कवि भाई कवि को 'उखाड़' रहा है क्योंकि उसने उससे ज़्यादा तालियाँ बटोर लीं। यह वह युद्ध है जहाँ खून नहीं बहता, बल्कि 'सम्मान' बहता है। यह वह युद्ध है जहाँ तलवारें नहीं चलतीं, बल्कि 'माइक' चलता है। और यह वह युद्ध है जहाँ कविता की कब्रें हर दिन खोदी जाती हैं, और हर दिन कोई न कोई 'कवि' मंच पर दफ़न हो जाता है।

कवि-सम्मेलन की 'ट्रोल-आर्मी' इस युद्ध की असली सेनापति है। वे तय करते हैं कि कौन 'महाकवि' है और कौन 'फ्लॉप कवि'। अगर आपने मंच पर चुटकुला सुनाया तो आप 'लोकप्रिय'। अगर आपने गंभीर कविता पढ़ी तो आप 'बोरिंग'। और अगर आपने कविता लिखी लेकिन मंच पर नहीं आए तो आप 'अज्ञात'। मिसिरबाबू, यह कविता का कब्रिस्तान इतना बड़ा हो चुका है कि अब हर शहर में कवि-सम्मेलन की लाशें पड़ी हैं। लोग अब कविता को साहित्य से नहीं, बल्कि 'स्टेज पर तालियों' से गिनते हैं।

लेकिन मिसिरबाबू, सवाल यह है कि आप कब तक इस 'कवि-सम्मेलन वॉर' से बचेंगे! आख़िर बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनाएगी! एक दिन सिस्टम आपकी सादगी, आपके विवेक की बलि तो लेकर रहेगा। हो सकता है कल को 'एक देश, एक कवि-सम्मेलन' का क़ानून आ जाए। हो सकता है कि राशन कार्ड, आधार कार्ड और वोटर आईडी सब कुछ आपके 'कविता-पाठ' से जुड़ जाए। जिसके पास मंचीय कविता नहीं, उसकी नागरिकता ही नहीं। तब आप भी इस साहित्यिक कब्रिस्तान का हिस्सा बन जाएँगे।

तब तक के लिए, जब तक आपके पास आपका पुराना, भरोसेमंद, बिना किसी 'तालियों' वाला कविता संग्रह है, कांग्रेचुलेशंस मिसिरबाबू। आप बच गए। लेकिन याद रखिए, यह युद्ध अभी जारी है और कविता की लाशें हर दिन इस कब्रिस्तान में दफ़न हो रही हैं।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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