Pakistan-Bangladesh की बढ़ती नजदीकियां South Asia में बना रही हैं नए समीकरण, भारत के लिए सतर्कता बरतने का समय

By नीरज कुमार दुबे | Aug 25, 2025

पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच मंत्रिस्तरीय बातचीत के बाद कुछ ऐसे संकेत सामने आए हैं जो दक्षिण एशिया की कूटनीति को नई दिशा दे सकते हैं। हम आपको बता दें कि पाकिस्तान ने 1971 की त्रासदी को “बीता हुआ अध्याय” बताकर संबंधों में नई शुरुआत की बात की है जबकि बांग्लादेश ने जवाबदेही और माफ़ी की अपनी पुरानी मांग दोहराई है। इस पृष्ठभूमि में दोनों देशों के रिश्तों के भविष्य और भारत पर इसके संभावित असर को लेकर चर्चाएं शुरू हो गयी हें।

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इस सबके भारत पर संभावित प्रभाव की बात करें तो भारत के पूर्वी पड़ोसी बांग्लादेश और पश्चिमी पड़ोसी पाकिस्तान अगर धीरे-धीरे रिश्ते सामान्य करते हैं, तो यह भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा रणनीति के लिए नई चुनौती होगी। साथ ही अगर ढाका–इस्लामाबाद समीपता चीनी समर्थन से होती है, तो दक्षिण एशिया में चीन–पाकिस्तान–बांग्लादेश त्रिकोण भारत की सुरक्षा और आर्थिक हितों को घेरने की स्थिति बना सकता है। इसके अलावा, बांग्लादेश अगर पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने लगता है तो भारत के साथ उसकी पारंपरिक निकटता संतुलन की तलाश में बदल सकती है। भारत को चाहिए कि वह बांग्लादेश के साथ बुनियादी ढांचे, ऊर्जा और सुरक्षा सहयोग को और मजबूत करे ताकि ढाका की कूटनीति में भारत की अहमियत बनी रहे। वैसे, पाकिस्तान–बांग्लादेश संबंधों में हालिया गर्मजोशी व्यावहारिक हितों पर आधारित है, न कि ऐतिहासिक विश्वास पर। बांग्लादेश, पाकिस्तान से आर्थिक अवसर ले सकता है, लेकिन 1971 की पीड़ा को इतनी आसानी से भुला नहीं पाएगा।

हम आपको बता दें कि पाकिस्तान के विदेश मंत्री और उपप्रधानमंत्री मोहम्मद इशाक डार के रूप में 13 वर्षों बाद कोई पाकिस्तानी विदेश मंत्री बांग्लादेश की यात्रा पर पहुँचा था। इशाक डार ने अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार प्रो. मोहम्मद यूनुस, विदेश मामलों के सलाहकार तौहीद हुसैन, जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफ़ीकुर रहमान और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा ज़िया से मुलाक़ात की। 

हम आपको याद दिला दें कि 1971 का युद्ध और पाकिस्तान सेना द्वारा किए गए अत्याचार बांग्लादेश की राष्ट्रीय स्मृति में गहरे अंकित हैं। लाखों लोगों की जानें गईं, असंख्य महिलाओं के साथ हिंसा हुई और यह त्रासदी आज भी रिश्तों की सबसे बड़ी बाधा है। पाकिस्तान का दावा है कि 1974 के त्रिपक्षीय समझौते (भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच) के बाद यह अध्याय “बंद” हो गया। हम आपको यह भी याद दिला दें कि पाकिस्तानी सेना के पूर्व अध्यक्ष परवेज मुशर्रफ़ ने 2002 में ढाका जाकर “पछतावे” की बात की थी, लेकिन बांग्लादेश इसे पर्याप्त नहीं मानता। बांग्लादेशी मंत्री तौहीद हुसैन ने पाकिस्तान से साफ़ कहा है कि बांग्लादेश अब भी “जवाबदेही और क्षतिपूर्ति” चाहता है और पाकिस्तान को औपचारिक रूप से माफी माँगनी चाहिए।

हालांकि दोनों देशों के बीच चल रहे विवादों के बावजूद इशाक डार की बांग्लादेश यात्रा के दौरान कई समझौते भी हुए। जैसे दोनों देशों के राजनयिकों और अधिकारियों के लिए वीजा मुक्त यात्रा का करार हुआ है। साथ ही व्यापार व शिक्षा क्षेत्र में सहयोग के लिए संयुक्त कार्यदल की स्थापना की गयी है। इसके अलावा, विदेशी सेवा अकादमियों में सहयोग बढ़ाया जायेगा। साथ ही सरकारी समाचार एजेंसियों BSS (बांग्लादेश) और APPC (पाकिस्तान) के बीच साझेदारी की घोषणा की गयी है। इसके अलावा, Pakistan-Bangladesh Knowledge Corridor के तहत अगले पाँच सालों में 500 बांग्लादेशी छात्रों को पाकिस्तान में छात्रवृत्ति दी जायेगी। 100 सिविल सेवकों के प्रशिक्षण की योजना भी बनी है। तकनीकी सहायता कार्यक्रम के तहत छात्रवृत्तियाँ 5 से बढ़ाकर 25 की गईं हैं।

हम आपको यह भी बता दें कि इशाक डार का जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफ़ीकुर रहमान और बीएनपी नेता खालिदा ज़िया से मुलाक़ात करना एक राजनीतिक संकेत माना जा रहा है। दरअसल जमात-ए-इस्लामी 1971 में पाकिस्तान का समर्थक रहा था और अब भी बांग्लादेशी राजनीति में विवादित है। वहीं खालिदा ज़िया, जो प्रधानमंत्री शेख़ हसीना की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी रही हैं, से मुलाक़ात पाकिस्तान की राजनीतिक समीकरण साधने की कोशिश समझी जा रही है।

इसके अलावा, बांग्लादेश के विदेश सलाहकार ने यह स्वीकार किया है कि चीन, पाकिस्तान-बांग्लादेश संबंधों को मजबूत करने के पक्ष में है। दरअसल चीन, पाकिस्तान का सबसे बड़ा रणनीतिक सहयोगी है। साथ ही बांग्लादेश में चीन का बढ़ता निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएँ, इस रिश्ते को और गहराई दे रही हैं। यह भारत के लिए विशेष ध्यान देने योग्य है, क्योंकि बांग्लादेश की विदेश नीति में चीन और पाकिस्तान की साझेदारी नई चुनौतियाँ खड़ी कर सकती है।

बहरहाल, ढाका में इशाक डार की यात्रा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बांग्लादेश-पाकिस्तान रिश्तों में सहयोग और अविश्वास दोनों ही साथ-साथ चल रहे हैं। आर्थिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक सहयोग के नए रास्ते खुले हैं, लेकिन 1971 की त्रासदी अभी भी अटकी हुई है। सवाल यही है— क्या बांग्लादेश “दिल साफ़” कर आगे बढ़ पाएगा, या 1971 की स्मृति हर समझौते पर साया डालती रहेगी?

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