परमाणु हथियारों के प्रतिबंध की वकालत करती है हिरोशिमा त्रासदी

By डॉ. रमेश ठाकुर | Aug 06, 2026

मानव इतिहास में ‘6 अगस्त 1945’ की मनहूस तारीख को शायद ही कोई भूल पाए। 'हिरोशिमा दिवस' के रूप में मनाई जाती है ये तारीख। इस तारीख में सिर्फ तबाही लिखी थी। तारीख में ऐसा मुकर्रर वक्त था जिसने मात्र 16 मिनट के भीतर 1,30,000 लोगों की सांसें एक साथ रोकी थी। हताहतों का आकंड़ा फिलहाल सरकारी है, पर वास्तिवक संख्या इससे कहीं अधिक बताई जाती है। हिरोशिमा पर किए परमाणु हमले में मरने वालों में बूढ़े, बच्चे, नौजवान, औरतें भी थीं। सुबह करीब 8ः15 बजे अमेरिका ने हिरोशिमा पर अपने ‘बी-29 ‘एनाला गे’ विमान द्वारा आसमान से परिमाणु बमों की बारिश करके पूरा शहर जिंदा जला दिया था। घटना के वक्त ज्यादातर लोग सोए हुए थे, परमाणु बम ने उन्हें सोता ही मार दिया। हिरोशिमा में जब परमाणु बम फोड़ा गया, तो जापानियों को लगा कि सूरज फटा है। जबकि, वह सूरज नहीं, बल्कि तथाकथित विकसित, सभ्य और मुट्ठी भर लोगों का निर्णय तथा एक महाशक्ति द्वारा निर्मित कृत्रिम सूरज था जिसकी आग में लाखों निर्दोष लोग भाप बनकर चंद मिनटों में उड़ गए। घटना का सामूहिक हत्यारा अमेरिका था।

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जापान का जब तक अस्तित्व रहेगा, उनके लोग अमेरिका को माफ नहीं करेंगे। जापान के अलावा पूरे विश्व में इस मानव त्रासदी की निंदा प्रत्येक 6 अगस्त को की जाती है। नागासाकी पर गिराए बम से भी लाखों की संख्या में बेकसूर नागरिक मरे थे। हिरोशिमा दिवस वैश्विक स्तरीय पर परमाणु हथियारों के विरुद्ध एकजुट होने एवं समूचे संसार में अमन-शांति की वकालत के लिए भी याद किया जाता है। साथ ही भविष्य में ऐसे विनाशकारी युद्धों को रोकने के लिए परमाणु हथियारों को नष्ट करने की पुरजोर अपील भी करता है। हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति फ्रैंकलिन ‘डेलानो रूजवेल्ट’ के सन्दर्भ में ‘लिटिल ब्वाय’ और नागासाकी के बम को विन्सटन चर्चिल के सन्दर्भ में ‘फैट मैन’ भी कहा जाता है। फ्रैंकलिन डेलानो रूजवेल्ट अमेरिका के 32वें राष्ट्रपति हुआ करते थे। वह द्वितीय विश्वयुद्ध और वैश्विक आर्थिक मंदी के दौरान बीसवीं सदी के सबसे क्रूर व्यक्तियों में गिने जाते रहे। यह त्रासदी उनकी ही देन थी।

  

पाकिस्तान, अमरिका जैसे मुल्क आज भी परमाणु बमों को फोड़ने की धमकी देते हैं। इसलिए हिरोशिमा दिवस उनके लिए चेतावनी के अलावा सीख जैसा भी है। हिरोशिमा की घटना को आज 81 वर्ष हो गए, लेकिन दुर्भाग्य संसार आज भी युद्ध-हिंसा में संलग्न है। यूं कहें कि परमाणु हथियारों के ढेर पर बैठा है। हाल में, अमेरिका द्वारा ईराक पर परमाणु हमले की धमकी देना, दुनिया भर में बढ़ती हिंसा की घटनाएं और हथियारों को इकट्ठा करने की होड़ के बीच हमारे सामने यह प्रश्न खड़ा होता है कि हम हिरोशिमा और नागासाकी की घटनाओं से क्या कुछ सबक सीख पाए या नहीं? 81 साल पहले 2,50,000 हजार लोगों को मारकर भी अमेरिका को शांति नहीं मिली? अमेरिका की दादागिरी को जवाब देने का वक्त आ चुका है इसके लिए वैश्विक स्तर पर सभी मुल्कों को एकजुट होना होगा। साथ ही परमाणु हथियारों के निर्माणों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाए जाने की दिशा में सभी देशों को सामूहिक पहल करने की जरूरत है।

- डॉ. रमेश ठाकुर

सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!

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