संघ प्रमुख के व्याख्यान से साफ होगी वैचारिक तस्वीर

By उमेश चतुर्वेदी | Aug 27, 2025

संवाद और शास्त्रार्थ की परंपरा वाले देश में हाल के दिनों में सार्वजनिक चर्चाओं की गुंजाइश लगातार कम हुई है। इसे कभी असहिष्णुता तो तभी दूसरे विचार की उपेक्षा के तौर पर देखा गया है। देश के सर्वोच्च लोकतांत्रिक पद प्रधानमंत्री तक से शिकायत है कि संवाद नहीं रहा। ऐसे माहौल में अगर देश का पुराना संगठन और उसका प्रमुख खुद संवाद के लिए आगे आता है तो उसका भी स्वागत होना चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन राव भागवत की दिल्ली में होने जा रहे संवाद कार्यक्रम के जरिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने खुद पर उठने वाले सामाजिक और राजनीतिक सवालों के साथ ही आक्षेपित आरोपों पर जवाब देने की तैयारी है। इस कार्यक्रम के लिए राजनीतिक दलों की हस्तियों को भी आमंत्रित किया गया है, देखना है कि कितने दलों के लोग इसमें शामिल होते हैं।

संघ प्रमुख इसके पहले साल 2018 में भी इसी तरह का व्याख्यान दे चुके हैं। जिसमें संघ प्रमुख मोहन राव भागवत ने संगठन के विचारों से उन लोगों का परिचय कराने की कोशिश की थी, जो संघ से परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से नहीं जुड़े हैं। संघ से जो जुड़े हैं, जो उसके कार्यकर्ता हैं, जो स्वयंसेवक हैं, वे जानते हैं कि संघ है क्या, संघ की सोच क्या है और संघ किन विचारों के साथ आगे बढ़ रहा है। बहरहाल साल 2018 का वह आयोजन सिर्फ दिल्ली में हुआ था। संघ ने इस बीच अपनी स्थापना की शतकीय यात्रा पूरी करने की ओर है। विजयादशमी के दिन साल 1925 में स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस विजयादशमी को अपनी सौ साल की गौरवपूर्ण यात्रा पूरी कर लेगा। जाहिर है कि यह संघ शताब्दी वर्ष है, इस लिहाज से इस बार संघ की कोशिश अपने विचार को जन-जन और हर परिवार तक पहुंचाने की है। यही वजह है कि इस बार मोहन राव भागवत का यह संवाद कार्यक्रम इस बार बेंगलुरु, कोलकाता और मुंबई में संघ में भी आयोजित किया जाना है। संघ के आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि हो सकता है कि इसके अलावे भी अन्य जगहों पर भी व्याख्यान आयोजित किए जाएं। 

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किसी संगठन का सौ साल पूरा कर लेना मामूली बात नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी 100 साल की यात्रा में समाज के हर वर्ग तक पहुंचने की कोशिश की है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मोहन राव भागवत के इस शताब्दी व्याख्यान के लिए गंभीर तैयारियां की हैं। संघ ने आगंतुकों के लिए 17 श्रेणियां और 138 उप-श्रेणियां बनाई हैं। 

संघ सर्वदा यह जताने की कोशिश करता रहा है कि उसकी सोच, उसका विचार अन्य लोगों से अलग नहीं है। संघ को उसके विरोधियों ने भले ही कभी अछूत तो कभी सांप्रदायिक कहने की कोशिश की हो, लेकिन संघ ने उनके प्रति भी कभी वैमनस्यबोध नहीं रखा और ना ही उनके साथ कोई छुआछूत की भावना रखी। संघ के कई वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के अनुभवों से गुजरते हुए पता चला है कि उन्हें विरोधी राजनीतिक विचारधारा वाले नेताओं और बड़ी हस्तियों तक से मिलने, साथ चाय-पानी करने, भोजन करने, सहयोग करने-कराने तक का अवसर मिला है। संघ जरूर एक बात पर जोर देता है कि उसकी सोच भारत की स्थापित और मूल्यवान परंपराओं से प्रभावित है। संघ भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में गहराई से विश्वास करता है, इसीलिए वह हर भारतीय मे हिंदुत्व के मूल को देखने-समझने की कोशिश करता रहा है। 

संघ पर गांधी जी को लेकर कई मिथ्या आरोप लगते रहे हैं। लेकिन सच यह भी है कि गांधी जी संघ के वर्ग को देखने गए थे। 27 सितंबर 1947 के हरिजन के अंक में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 1936 में वर्धा के पास लगे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविर में गांधी जी गए थे। उसके अगले दिन गांधी जी के वर्धा स्थित तत्कालीन निवास पर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने भेंट की थी। माना जा रहा है कि संघ प्रमुख के कल से होने वाले व्याख्यान में एक बार फिर इसकी चर्चा हो सकती है। चूंकि संघ का दृष्टिकोण राष्ट्र की प्रगति के लिए सभी के साथ मिलकर काम करना है। लिहाजा संघ के इस व्याख्यान का एक उद्देश्य यह भी है कि वह अपनी सौ साल की विकास यात्रा में समूचे देश के साथ जुड़े और समूचा देश एक साथ आगे बढ़ता रहे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पंच परिवर्तन के सिद्धांत स्वीकार रखा है और इन्हीं बिंदुओं पर समाज के बीच काम कर रहा है। संघ के पंच परिवर्तन का पहला बिंदु है, ससामाजिक समरसता। इसके तहत संघ और उसके असंख्य कार्यकर्ता लगातार समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सौहार्द और प्रेम बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करते हुए काम कर रहे हैं। संघ के पंच परिवर्तन का दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु है कुटुम्ब प्रबोधन, जिसके तहत संघ की कोशिश राष्ट्र के विकास में परिवार को महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली इकाई के रूप में संवर्धित करने के प्रयासों में लगातार जुटा है। पंच परिवर्तन के तीसरे बिंदु पर्यावरण संरक्षण के तरह संघ पृथ्वी को माता तो मानता ही, इसी आधार पर पर्यावरण संरक्षण के लिए लगातार सक्रिय रहता है और अपने स्वयंसेवकों के साथ ही समाज से ही आशा करता है कि वह भी ऐसा ही करे। पंच परिवर्तन के चौथे बिंदु स्वदेशी और आत्मनिर्भरता के तहत संघ अपने विभिन्न सहयोगी संगठनों और प्रकल्पों के माध्यम से लगातार देश की स्वदेशी अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता की दिशा में काम कर रहा है। पंच परिवर्तन के पांचवें बिंदु नागरिक कर्तव्य के तहत संघ की कोशिश देश के हर नागरिक की वैचारिकी को इस तरह स्थापित करना है कि वह अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन बखूबी कर सके और इस तरह राष्ट्रहित में अपना अप्रतिम योगदान दे सके। ऐसा कहा जा रहा है कि मोहन भागवत के इस व्याख्यान में इस बार इन पंच परिवर्तन के बिंदुओं पर जोर रहेगा और इसके तहत लोगों के बीच संघ अपनी बात, अपनी सोच और अपनी वैचारिकी को ना सिर्फ स्थापित करने की कोशिश करेगा, बल्कि इसके जरिए राष्ट्रहित में अपना अन्यतम योगदान दे सकेगा। संघ को लेकर एक वैचारिकी को स्थापित किया गया है कि वह अल्पसंख्यक विरोधी है। लेकिन यह सोच भी एकांगी है। संघ हर उस विचार और सोच का विरोधी है, जो भारतीयता या राष्ट्र का विरोधी है। संघ ना तो अल्पसंख्यक विरोधी है और ना ही समाज में ऊंचनीच का भाव बढ़ाने की कोशिश करता है। साल 2018 के व्याख्यान में मोहन राव भागवत ने इसे बखूबी रेखांकित करके संघ के दामन पर लगे मिथ्या आरोपों की दाग को साफ करने की कोशिश की थी। माना जा रहा है कि इस बार के व्याख्यान में संघ प्रमुख इस बारे में अपनी राय और गंभीरता से रखते हुए संघ के दृष्टिकोण को प्रस्तुत करेंगे।

साल 2018 में सरसंघचालक भागवत ने 'भविष्य का भारत' विषय पर व्याख्यान दिया था। तब उन्होंने समलैंगिकता, गौरक्षकों को लेकर उठ रही आवाजों, आरक्षण, अंतर्जातीय विवाह और जनसंख्या नीति जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर आरएसएस के रुख को स्पष्ट किया। इन बिंदुओं पर व्याख्यान संघ की स्थिति को स्पष्ट करने, आलोचनाओं का प्रतिकार करने और इस बात पर जोर देने के लिए एक अभियान का हिस्सा थे कि हिंदुत्व के बारे में उनका दृष्टिकोण क्या है। उस व्याख्यान में संघ प्रमुख ने संघ के दूसरे प्रमुख गुरू गोलवलकर की चर्चित पुस्तक ‘ब्रंच ऑफ थॉट’ पर उठने वाले सवालों का जवाब भी दिया था। तब उन्होंने कहा था कि संघ ऐसा संगठन नहीं है, जो एक ही विचार पर ठहरा रहे। दूसरे शब्दों में कहें तो संघ गतिशील संगठन है। हां, उसका मूल भारत, भारतीयता, भारतीय संस्कृति और हिंदुत्व है। लेकिन इसका मतलब नहीं है कि वह ठस्स विचारों पर अपनी सोच को अटकाए रखे। समय और स्थिति के लिहाज से उसकी वैचारिकी में भी गतिशीलता रहती है। माना जा रहा है कि संघ प्रमुख इस बार भी ऐसी कोई गतिशील सोच और वैचारिकी को प्रस्तुत कर सकते हैं। 

-उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

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