By कमलेश पांडे | May 15, 2026
ब्रिक्स (BRICS) के विदेश मंत्रियों की दो दिवसीय दिल्ली बैठक ने दुनिया को कई महत्वपूर्ण राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक संदेश दिए हैं, जिनके कूटनीतिक निहितार्थ को समझने की जरूरत है। अन्यथा शेष दुनिया को अमेरिकी-यूरोपीय दादागिरी (नाटो सैन्य गठबंधन) के दुनियावी दांवपेंचों से निजात मिलनी मुश्किल है। लिहाजा, इस बैठक में मुख्य रूप से वैश्विक शक्ति-संतुलन, अमेरिकी प्रतिबंध नीति, पश्चिम एशिया संकट, वैश्विक व्यापार व्यवस्था और “ग्लोबल साउथ” की भूमिका पर जोर दिखाई दिया।
जिस तरह से कूटनीतिक सम्मेलन के पहले ही दिन जयशंकर ने अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के खिलाफ लगाए जाने वाले एकतरफा प्रतिबंधों का जिक्र किया, जो सबसे ज्यादा विकासशील देशों को नुकसान पहुंचाते हैं। स्वाभाविक तौर पर उनका इशारा अमेरिका है, क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों की वजह से दुनिया को बहुत ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है। वहीं, ईरान मामले में भी गतिरोध की वजह बहुत हद तक वॉशिंगटन की अव्यवहारिक मांगें है। ब्रिक्स के बड़े मंच से उठी आवाज का असर ज्यादा होगा।
विदेश मंत्री एस जयशंकर का उद्घाटन भाषण मौजूदा चुनौतियों का सही खाका खींचता है। पश्चिम एशिया पर मंडराता युद्ध का खतरा, ऊर्जा संकट, सप्लाई चेन में रुकावट और जलवायु परिवर्तन ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। तमाम देशों की अर्थव्यवस्था को मंदी में फंसने का डर सता रहा है। ऐसे में जैसा कि विदेश मंत्री ने कहा, विकासशील देशों ने ब्रिक्स से यह उम्मीद लगाई है कि यह मंच स्थिरता कायम करने में सकारात्मक भूमिका अदा करेगा। इसके कतिपय निहितार्थ इस प्रकार हैं-
पहला, एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था को चुनौती: बैठक का सबसे बड़ा संदेश यह था कि दुनिया अब केवल अमेरिका-केन्द्रित व्यवस्था पर निर्भर नहीं रहना चाहती। ब्रिक्स देशों ने “मल्टीपोलर वर्ल्ड” के दृष्टिगत बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया। इसका अर्थ है कि वैश्विक निर्णयों में पश्चिमी देशों के साथ एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की शक्तियों की भी बराबर भूमिका हो।
दूसरा, अमेरिकी प्रतिबंधों और आर्थिक दबाव का विरोध: भारत, रूस, चीन और ईरान सहित कई देशों ने एकतरफा प्रतिबंधों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार और संप्रभुता के खिलाफ बताया। विशेष रूप से एस जयशंकर ने कहा कि प्रतिबंध और दबाव कूटनीति का विकल्प नहीं हो सकते। यह संदेश सीधे तौर पर अमेरिका की प्रतिबंध नीति की आलोचना माना गया।
तीसरा, डॉलर प्रभुत्व कम करने का संकेत: बैठक में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों पर भी चर्चा हुई। यह संदेश था कि ब्रिक्स देश डॉलर पर निर्भरता कम करना चाहते हैं ताकि अमेरिकी आर्थिक दबाव का असर घटाया जा सके।
चतुर्थ, पश्चिम एशिया संकट पर चिंता: ईरान-इज़राइल तनाव और समुद्री मार्गों की सुरक्षा बड़ा मुद्दा रहा। ब्रिक्स देशों ने रेड सी और होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे मार्गों की सुरक्षा पर जोर दिया। दुनिया को यह संदेश दिया गया कि क्षेत्रीय युद्ध अब वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा को सीधे प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि इस मंच के सामने भी चुनौती है। ईरान और यूएई के आपसी रिश्ते ठीक नहीं चल रहे। जबकि चीन ने अपने विदेश मंत्री को नहीं भेजा है।
एक बात और, जब सम्मेलन की शुरुआत हुई, चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग तब ट्रंप की मेजबानी में व्यस्त थे। ब्रिक्स के सबसे बड़े विरोधी ट्रंप है। उन्हें लगता है कि यह मंच अमेरिकी हितों के खिलाफ खड़ा किया गया है। मेजबान होने के नाते यह भारत की जिम्मेदारी है कि यहां से निकला संदेश किसी के विरोध में नहीं, साझा हित में हो। भारत के पास सभी सदस्यों को करीब लाने और मौजूदा संकट का समाधान पेश करने का मौका है।
पांचवां, ग्लोबल साउथ की राजनीतिक आवाज: बैठक में यह स्पष्ट हुआ किब्रिक्स स्वयं को केवल आर्थिक समूह नहीं, बल्कि विकासशील देशों की सामूहिक राजनीतिक आवाज के रूप में स्थापित करना चाहता है। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों की समस्याओं—जैसे खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा संकट और कर्ज—को वैश्विक एजेंडा में प्रमुखता देने की बात कही गई।
छठा, संयुक्त राष्ट्र सुधार की मांग: भारत और ब्राजील ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और विकासशील देशों के अधिक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता दोहराई। यह संदेश था कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी संस्थाओं में अब नई वैश्विक वास्तविकताओं के अनुसार बदलाव होना चाहिए।
सातवां, ब्रिक्स के भीतर मतभेद भी सामने आए: हालांकि बैठक में एकजुटता दिखाई गई, लेकिन यह भी स्पष्ट हुआ कि सभी सदस्य अमेरिका-विरोधी नीति पर पूरी तरह एकमत नहीं हैं। भारत और ब्राजील जैसे देश पश्चिम के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना चाहते हैं, जबकि रूस और ईरान अधिक आक्रामक रुख चाहते हैं। इससे यह संकेत मिला कि ब्रिक्स अभी पूर्ण राजनीतिक गठबंधन नहीं, बल्कि साझा हितों वाला मंच है।
समग्र रूप से कहा जाए तो, इस बैठक का वैश्विक संदेश यह था कि उभरती शक्तियाँ अब विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था में अधिक स्वतंत्र, संतुलित और पश्चिम से अलग भूमिका चाहती हैं। ब्रिक्स ने यह दिखाने की कोशिश की कि “ग्लोबल साउथ” अब केवल दर्शक नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन का सक्रिय खिलाड़ी बनना चाहता है। चूंकि ब्रिक्स अब केवल उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का समूह नहीं रहा, इसकी भूमिका आज कहीं ज्यादा व्यापक हो चुकी है।
वास्तव में यह वैश्विक संतुलन स्थापित करने में महत्वपूर्ण हो सकता है। भारत का रोल इसमें सबसे अहम हो जाता है। उसने पश्चिमी देशों के साथ रिश्ते बनाए हुए हैं, जबकि रूस, ईरान और चीन के साथ भी बैलेंस रखा है। उसने हमेशा संवाद से समाधान की बात की है। यह रवैया उसे भरोसेमंद साथी बनाता है।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक