By नीरज कुमार दुबे | Jan 28, 2026
हिंद महासागर और दक्षिण पूर्व एशिया के सामरिक परिदृश्य में भारत की नौसैनिक उपस्थिति अब दिशा और दृष्टि तय करने वाली शक्ति के रूप में उभर रही है। इसी क्रम में भारतीय नौसेना का पहला प्रशिक्षण स्क्वाड्रन अपने व्यापक प्रशिक्षण अभियान के अंतर्गत जनवरी 2026 के अंतिम सप्ताह में थाईलैंड और इंडोनेशिया पहुंचा। यह यात्रा समुद्री कूटनीति, सामरिक संतुलन और क्षेत्रीय स्थिरता की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।
हम आपको बता दें कि 25 जनवरी 2026 को भारतीय नौसेना का पहला प्रशिक्षण स्क्वाड्रन थाईलैंड के फुकेट डीप शी पोर्ट पर पहुंचा। INS Tir, INS Shardul, INS Sujata और तटरक्षक पोत ICGS Sarathi का भव्य स्वागत Royal Thai Navy ने पारंपरिक सैन्य सम्मान और संगीत के साथ किया। देखा जाये तो यह आगमन ऐसे समय हुआ जब वर्ष 2026 को आसियान भारत समुद्री सहयोग वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। इस कारण यह यात्रा प्रतीकात्मक से कहीं आगे जाकर रणनीतिक महत्व की है।
इस बंदरगाह यात्रा के दौरान दोनों नौसेनाओं के बीच वरिष्ठ स्तर की वार्ताएं, पेशेवर आदान प्रदान, संयुक्त योग अभ्यास, मैत्रीपूर्ण खेल प्रतियोगिताएं और समुद्र में पासेक्स अभ्यास आयोजित किए गए। भारत और थाईलैंड के बीच पहले से चल रहे अभ्यास आयुथया, समन्वित गश्त और त्रिपक्षीय अभ्यास सितमेक्स ने इस सहयोग को मजबूत आधार दिया है। फरवरी 2026 में भारत द्वारा आयनस की अध्यक्षता संभालना इस साझेदारी को और सशक्त बनाएगा।
इससे पहले 23 जनवरी 2026 को यही स्क्वाड्रन इंडोनेशिया के बेलावान बंदरगाह से रवाना हुआ। तीन दिन की इस यात्रा के दौरान भारतीय नौसेना के अधिकारी और प्रशिक्षु इंडोनेशियाई नौसेना के साथ पेशेवर संवाद, सांस्कृतिक आदान प्रदान और प्रशिक्षण गतिविधियों में शामिल हुए। क्षेत्रीय नौसेना कमान के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ विचार विमर्श हुआ और भारतीय जहाजों पर आयोजित स्वागत समारोह में दोनों देशों के सामरिक हितों पर खुलकर चर्चा हुई।
भारतीय जहाजों को आम नागरिकों और विद्यालय के छात्रों के लिए खोला गया, जहां बच्चों की उत्सुक आंखों में भारत की समुद्री शक्ति का भविष्य झलक रहा था। यह यात्रा भारत की एक्ट ईस्ट नीति और महासागर दृष्टि को जमीन पर उतारने का सशक्त उदाहरण बनी।
देखा जाये तो भारतीय नौसेना का यह अभियान केवल प्रशिक्षण या सद्भावना यात्रा नहीं है। यह एक स्पष्ट संदेश है कि भारत अब समुद्रों में मौन दर्शक नहीं, बल्कि निर्णायक भागीदार है। हिंद महासागर क्षेत्र आज वैश्विक राजनीति का सबसे संवेदनशील रंगमंच बन चुका है। व्यापार मार्ग, ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री संसाधन और सामरिक ठिकाने सभी की नजर इसी क्षेत्र पर टिकी है। ऐसे में भारतीय नौसेना की सक्रियता भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और वैश्विक भूमिका को परिभाषित करती है।
साथ ही पहले प्रशिक्षण स्क्वाड्रन की यह तैनाती भारत की उस दीर्घकालिक सोच को दर्शाती है जिसमें प्रशिक्षण को शक्ति और कूटनीति का आधार माना गया है। युवा कैडेट और अधिकारी जब थाई और इंडोनेशियाई नौसेनाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अभ्यास करते हैं, तब केवल तकनीक नहीं, भरोसा भी साझा होता है। यही भरोसा संकट के समय साझा समुद्री क्षेत्र को सुरक्षित रखने की कुंजी बनता है।
देखा जाये तो भारत की महासागर नीति महज नारे तक सीमित नहीं है। महासागर यानी पारस्परिक और समग्र उन्नति का दृष्टिकोण अब व्यवहार में उतर चुका है। भारतीय नौसेना की यह उपस्थिति समुद्री सुरक्षा, आपदा राहत, मानव तस्करी विरोध और अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगाने में क्षेत्रीय देशों को भरोसा देती है कि भारत एक जिम्मेदार शक्ति है।
सामरिक दृष्टि से देखें तो थाईलैंड और इंडोनेशिया दोनों ही मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित हैं, जो विश्व के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है। यहां भारत की नौसैनिक मित्रता का अर्थ है वैश्विक व्यापार की धमनियों की सुरक्षा में निर्णायक भूमिका। यह उस विस्तारवादी सोच का शांत लेकिन सशक्त प्रतिकार है जो समुद्रों को प्रभुत्व का माध्यम बनाना चाहती है।
भारतीय नौसेना का शौर्य केवल युद्धपोतों की संख्या में नहीं, बल्कि उसके पेशेवर आचरण और मानवीय दृष्टि में भी झलकता है। योग सत्र, खेल प्रतियोगिताएं और सांस्कृतिक मेल मिलाप यह दिखाते हैं कि भारत शक्ति को संवाद के साथ संतुलित करना जानता है। यही कारण है कि भारतीय जहाज जहां भी जाते हैं, वहां संदेह नहीं बल्कि सम्मान प्राप्त करते हैं।
आज भारतीय नौसेना विस्तार के दौर में है। स्वदेशी विमान वाहक, पनडुब्बियां, निगरानी तंत्र और प्रशिक्षित मानव संसाधन भारत को समुद्री महाशक्ति की ओर ले जा रहे हैं। पहला प्रशिक्षण स्क्वाड्रन इस परिवर्तन का जीवंत प्रतीक है, जहां प्रशिक्षण ही रणनीति है और मित्रता ही शक्ति।
बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि थाईलैंड और इंडोनेशिया की यह यात्रा भारत के समुद्री भविष्य की झलक है। एक ऐसा भविष्य जहां भारतीय नौसेना न केवल अपने तटों की रक्षा करेगी, बल्कि पूरे क्षेत्र में शांति, संतुलन और सहयोग की धुरी बनेगी। यह शौर्य का विस्तार है, यह सामरिक चेतना है और यह भारत के उदयमान समुद्री नेतृत्व की घोषणा है।