The Kerala Story 2 की रिलीज पर संकट? केरल हाई कोर्ट ने केंद्र और सेंसर बोर्ड को जारी किया नोटिस

By रेनू तिवारी | Feb 20, 2026

विवादों में घिरी फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ के सीक्वल ‘द केरल स्टोरी 2 - गोज बियॉन्ड’ की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। केरल उच्च न्यायालय ने फिल्म के निर्माताओं, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) और केंद्र सरकार को एक याचिका पर नोटिस जारी किया है। इस याचिका में फिल्म के प्रमाणन (Certification) को रद्द करने और इसके शीर्षक में बदलाव की मांग की गई है।

 

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याचिका में अदालत से फिल्म के प्रमाणन को रद्द करने और इसके शीर्षक पर पुनर्विचार सहित संशोधनों का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है। कन्नूर जिले के कन्नवम निवासी याचिकाकर्ता श्रीदेव नंबूदरी ने 18 फरवरी को दायर रिट याचिका में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, सीबीएफसी और निर्माता विपुल अमृतलाल शाह को प्रतिवादी बनाया है।

न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस की अध्यक्षता वाली पीठ ने बृहस्पतिवार को याचिका पर विचार करते हुए सभी प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया और मामले की आगे की सुनवाई 24 फरवरी को तय की। याचिका में कहा गया है कि सीबीएफसी द्वारा कथित तौर पर सिनेमाटोग्राफ अधिनियम, 1952 के तहत वैधानिक जनादेश का उचित अनुपालन किए बिना ‘द केरल स्टोरी 2 - गोज बियॉन्ड’ नामक फिल्म को प्रमाण पत्र प्रदान किए जाने से आहत होकर उसने अदालत का रुख किया है।

फिल्म 27 फरवरी को रिलीज होने वाली है। याचिका के अनुसार, फिल्म का टीजर और ट्रेलर सामने आने के बाद उन्होंने यह शिकायत की। फिल्म के टीजर और ट्रेलर में कई राज्यों की महिलाओं से जुड़ी कहानियों को दर्शाया गया है लेकिन सामग्री को ‘द केरल स्टोरी’ के रूप में ब्रांड किया गया है, साथ ही आतंकवाद, जबरन धर्मांतरण और जनसांख्यिकीय षड्यंत्र की कथित घटनाओं को विशेष रूप से केरल राज्य से जोड़ा गया है।

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याचिका में कहा गया है, ‘‘इस तरह के चित्रण से पूरे क्षेत्रीय समुदाय के प्रति एक तरह की धारणा बनने, सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने और सांप्रदायिक एवं क्षेत्रीय असामंजस्य भड़कने की आशंका रहती है।’’ याचिकाकर्ता ने बताया कि फिल्म के पहले भाग में कथित झूठे दावों के कारण पहले ही गंभीर विवाद उत्पन्न हुआ था, जिसे उच्चतम न्यायालय के समक्ष कार्यवाही के दौरान संज्ञान में लिया गया था।

याचिका में कहा गया है, ‘‘इसके बावजूद, सीबीएफसी ने सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता और नैतिकता पर इसके प्रभाव की पर्याप्त जांच किए बिना ही फिल्म के ‘सीक्वल’ को प्रमाणन प्रदान कर दिया, जबकि सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 की धारा 5बी के तहत ऐसा करना अनिवार्य है।

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