बटन का जादू (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Mar 05, 2025

एक वैज्ञानिक था। वह हमेशा सोचता था कि दुनिया में हर समस्या की जड़ आलस्य है। उसने देखा कि लोग अपने आराम के लिए इतने दीवाने हो गए हैं कि उन्हें चलते-फिरते भी आलस आता है। वह वैज्ञानिक चिंतन में डूबा रहता और रातों को जागकर इस बात पर शोध करता कि कैसे आदमी को उसकी जगह से हिलाए बिना भी सारे काम करवाए जा सकते हैं। आखिरकार एक दिन, उसने यह तय कर लिया कि वह ऐसा आविष्कार करेगा जिससे आदमी अपनी कुर्सी पर बैठा-बैठा पूरी दुनिया को चला सके।

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अब वैज्ञानिक ने सोचा कि इस बटन का सबसे पहले इस्तेमाल किस पर किया जाए। उसने बटन का पहला प्रयोग अपने पड़ोसी पर किया। पड़ोसी सुबह-सुबह लाउडस्पीकर पर भजन सुनाने का शौकीन था। वैज्ञानिक ने बटन दबाया, और तुरंत पड़ोसी के स्पीकर से आवाज बंद हो गई। वैज्ञानिक खुश हो गया। उसने सोचा कि यह बटन मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या – पड़ोसी – का समाधान है।

लेकिन जैसा हर आविष्कार के साथ होता है, बटन का प्रयोग भी धीरे-धीरे बढ़ता गया। लोग इसे खरीदने के लिए दौड़ पड़े। बाजार में बटन के नए-नए मॉडल आने लगे। "सिंगल बटन," "डबल बटन," और "डीलक्स बटन" तक। एक विशेष बटन तो ऐसा था जिससे आप अपने बॉस को घर बैठे डांट सकते थे। लोगों ने इसे "क्रांति का बटन" नाम दिया।

बटन के कारण समाज में बड़ी क्रांति हुई। अब लोगों को उठने की जरूरत नहीं रह गई। वे कुर्सी पर बैठे-बैठे काम करने लगे। सब कुछ बटन के इशारे पर चलने लगा। यहाँ तक कि स्कूलों में बच्चे बटन के जरिए होमवर्क करने लगे। एक बच्चा परीक्षा में नकल करते हुए पकड़ा गया। जब शिक्षक ने पूछा कि तुमने कैसे किया, तो बच्चे ने कहा, "यह तो बटन का कमाल है, गुरुजी। मैं क्या करूँ?"

एक दिन वैज्ञानिक ने देखा कि उसके ही घर के लोग बटन का दुरुपयोग करने लगे हैं। उसका बेटा बटन दबाकर गाड़ी चला रहा था, जबकि वह गाड़ी में बैठा भी नहीं था। उसकी पत्नी ने बटन से बाजार के सारे कपड़े मंगा लिए थे। और तो और, उसकी बिल्ली ने बटन से मछलियों का ऑर्डर दे दिया।

यह देखकर वैज्ञानिक को चिंता हुई। उसने सोचा कि क्या उसने कोई गलती कर दी है? क्या यह आविष्कार मानव जाति को आलसी बना देगा? लेकिन फिर उसने खुद को समझाया, "जो लोग आराम को गुनाह मानते हैं, वे सभ्यता के दुश्मन हैं। आखिरकार, यह बटन मानव स्वतंत्रता का प्रतीक है।"

इस बटन के कारण समाज में कई बदलाव हुए। पहले लोग बहस करते थे, लड़ाई करते थे, अब वे बटन दबाकर लड़ाई कर लेते हैं। कोई किसी से नाराज़ है, तो वह बटन दबाकर उसे "गुड मॉर्निंग" का मैसेज भेज देता है। और यह सोचता है कि अब नाराजगी खत्म हो जाएगी।

बटन ने लोगों के नैतिक स्तर को भी बढ़ाया। अब लोग बटन के जरिए सच बोलने लगे। कोई गुस्से में है, तो वह बटन दबाकर अपने दोस्त को गाली दे देता है। लेकिन दोस्त भी बटन दबाकर जवाब देता है, "तुम भी महान हो।" यह सब देखकर वैज्ञानिक को खुशी हुई।

एक दिन वैज्ञानिक ने सोचा कि वह अपने बटन का सबसे कठिन प्रयोग करेगा। उसने एक बटन ऐसा बनाया जिससे किसी के दिल में झाँका जा सकता था। उसने सोचा, "अब देखता हूँ कि लोग अंदर से कितने सच्चे हैं।"

पहला प्रयोग उसने अपने मित्र पर किया। उसने बटन दबाया, और देखा कि उसका मित्र हमेशा उससे जलता रहता था। दूसरा प्रयोग उसने अपनी पत्नी पर किया, और देखा कि वह रोज रात बटन दबाकर अपने मायके का खाना मँगवाती थी। वैज्ञानिक को धक्का लगा। लेकिन उसने सोचा, "यह सब मानव स्वभाव है। बटन का दोष नहीं।"

धीरे-धीरे बटन का दायरा बढ़ता गया। लोग इसका इस्तेमाल हर काम में करने लगे। अब इंसान को बोलने की जरूरत नहीं रही। बटन ने उनकी आवाज भी छीन ली। जब कोई खुश होता है, तो वह बटन दबाकर इमोजी भेज देता है। जब दुखी होता है, तो आँसू वाली इमोजी। वैज्ञानिक ने देखा कि लोगों के चेहरे पर भाव खत्म हो गए हैं। सब कुछ बटन के हवाले हो गया है।

एक दिन वैज्ञानिक ने सोचा कि अब वह बटन के प्रयोग को रोक देगा। उसने एक बड़ा बटन बनाया, जिसे दबाते ही सारे बटन बंद हो जाएँ। उसने बटन दबाया, और सारी दुनिया ठहर गई। लोग अपनी कुर्सियों से उठे, इधर-उधर देखने लगे। बच्चों ने फिर से गली में खेलना शुरू कर दिया। पतियों ने अपनी पत्नियों से सीधे बात की। पड़ोसियों ने मिलकर चाय पी।

यह देखकर वैज्ञानिक को संतोष हुआ। उसने सोचा कि बटन ने भले ही दुनिया को आलसी बना दिया हो, लेकिन इसने उन्हें सच्चाई का आईना भी दिखाया। वह खुशी-खुशी अपने आविष्कार को देखने लगा।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

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