By नीरज कुमार दुबे | Jan 10, 2026
महाराष्ट्र की राजनीति में लंबे समय से चली आ रही राकांपा की पारिवारिक और राजनीतिक फूट पर फिलहाल विराम के संकेत मिलते दिख रहे हैं। दरअसल, पुणे और पिंपरी चिंचवड नगर निगम चुनावों को ध्यान में रखते हुए राकांपा के दोनों गुटों ने संयुक्त घोषणापत्र जारी किया है। यह वही राकांपा है जो बीते डेढ़ वर्ष से दो हिस्सों में बंटी हुई थी और एक दूसरे के खिलाफ आक्रामक राजनीति कर रही थी। संयुक्त घोषणापत्र में गड्ढ़ा मुक्त सड़कें, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, नागरिक बुनियादी ढांचे को मजबूत करना, जल आपूर्ति, सफाई व्यवस्था और सार्वजनिक परिवहन जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दी गई है। यह घोषणापत्र स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित है लेकिन इसका राजनीतिक संदेश दूर तक जाता है।
घोषणापत्र जारी करने के मौके पर दोनों गुटों के नेताओं का एक साथ मंच साझा करना अपने आप में असाधारण दृश्य रहा। अजित पवार ने इस दौरान कहा कि परिवारिक तनाव समाप्त हो चुके हैं और दोनों पक्षों के कार्यकर्ता चाहते हैं कि पार्टी फिर से एकजुट हो। उन्होंने संकेत दिया कि फिलहाल नगर निगम चुनावों में साथ आने का निर्णय लिया गया है लेकिन भविष्य में राजनीतिक एकता की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। शरद पवार गुट की ओर से भी बयानबाजी का स्वर बदला हुआ नजर आया। तल्खी की जगह संयम और आक्रामकता की जगह राजनीतिक परिपक्वता दिखाई दी। इससे यह स्पष्ट हो गया कि यह केवल स्थानीय तालमेल नहीं बल्कि सोची समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।
इस घटनाक्रम ने न केवल महाराष्ट्र बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। क्योंकि राकांपा का एक गुट सत्तारुढ़ गठबंधन एनडीए में है जबकि दूसरा गुट विपक्षी गठबंधन इंडिया का हिस्सा माना जाता है। ऐसे में दोनों का साथ आना राजनीतिक समीकरणों को हिलाने वाला कदम है।
देखा जाये तो महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर यह साबित कर रही है कि यहां विचारधारा नहीं बल्कि सत्ता ही अंतिम सत्य है। राकांपा का विभाजन किसी वैचारिक मतभेद का परिणाम नहीं था बल्कि सत्ता के समीकरणों की उपज था। अब दोनों गुटों का एक मंच पर आना भी किसी आत्ममंथन का नहीं बल्कि सत्ता की मजबूरी का नतीजा है। संयुक्त घोषणापत्र स्थानीय विकास के नाम पर जारी किया गया है लेकिन इसका असली मकसद कार्यकर्ताओं को यह संकेत देना है कि पवार परिवार की सियासी दरार भर रही है। यह संदेश जितना नीचे तक जाएगा, उतना ही तेजी से राजनीतिक गणित बदलेगा।
यदि राकांपा के दोनों गुट पूरी तरह से एक हो जाते हैं तो इसका पहला और सीधा असर महाराष्ट्र की राजनीति पर पड़ेगा। अजित पवार का एनडीए के साथ रहना तब अर्थहीन हो जाएगा जब पार्टी की कमान फिर से एकजुट होकर शरद पवार के प्रभाव क्षेत्र में लौटेगी। विपक्षी गठबंधन इंडिया के लिए यह घटनाक्रम जीवनदान जैसा हो सकता है। महाराष्ट्र जैसे निर्णायक राज्य में यदि राकांपा एकजुट होकर विपक्षी खेमे में मजबूती से खड़ी होती है तो यह न केवल विधानसभा बल्कि लोकसभा स्तर पर भी भाजपा के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी बिखराव रही है और पवारों का साथ आना इस कमजोरी पर मरहम बन सकता है। हालांकि अजित पवार पार्टी की कमान चाचा शरद पवार को वापस सौंपेंगे इसकी संभावना नगण्य ही है।
लेकिन यह तस्वीर का एक ही पहलू है। दूसरा पहलू उतना ही खतरनाक है। यदि राकांपा की एकता केवल नगर निगम और सीमित राजनीतिक सौदे तक सिमटी रहती है तो इससे विपक्षी गठबंधन इंडिया की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचेगा। जनता पहले ही अवसरवादी राजनीति से त्रस्त है और ऐसे प्रयोग उस अविश्वास को और गहरा करेंगे।
एनडीए के लिए यह स्थिति असहज करने वाली है। जिस अजित पवार को सत्ता संतुलन के लिए साथ लिया गया था वही यदि परिवारिक एकता के नाम पर अलग दिशा में चले जाते हैं तो यह गठबंधन की कमजोरी उजागर करेगा। यह संदेश जाएगा कि सत्ता के लिए बनाए गए गठबंधन टिकाऊ नहीं होते।
बहरहाल, राकांपा का यह संयुक्त कदम महाराष्ट्र की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत है। यह अध्याय एकता, विश्वास और स्थायित्व की ओर जाएगा या फिर अवसरवाद और अस्थायी समझौतों की कहानी बनेगा, यह आने वाले चुनाव तय करेंगे। लेकिन इतना तय है कि पवार परिवार की हर चाल पूरे राजनीतिक शतरंज को हिला देने की ताकत रखती है।
-नीरज कुमार दुबे