Prabhasakshi NewsRoom: Shinde की Shivsena को सत्ता से दूर रखने के लिए Maharashtra में BJP और Congress ने कर लिया गठबंधन

अंबरनाथ को शिवसेना का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। यही क्षेत्र शिंदे परिवार की राजनीतिक पकड़ का प्रतीक रहा है। ऐसे में यहां शिवसेना को सत्ता से बाहर करना केवल स्थानीय राजनीति की घटना नहीं रह जाती, बल्कि यह एक बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
महाराष्ट्र की राजनीति में अंबरनाथ नगर परिषद से जो तस्वीर उभरी है, उसने सत्तासीन गठबंधनों की नैतिकता और वैचारिक शुचिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हम आपको बता दें कि अंबरनाथ नगर परिषद चुनाव के बाद भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने मिलकर “अंबरनाथ विकास अगाड़ी” का गठन किया और शिवसेना शिंदे गुट को सत्ता से बाहर कर दिया। उल्लेखनीय है कि चुनाव परिणामों में शिवसेना शिंदे गुट सबसे बड़े दल के रूप में उभरा था और उसके पार्षदों की संख्या किसी भी अन्य दल से अधिक थी। इसके बावजूद भाजपा और कांग्रेस ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के कुछ पार्षदों के समर्थन से बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया। इस गठबंधन के जरिए नगर परिषद पर नियंत्रण हासिल कर लिया गया और शिवसेना को सत्ता से दूर कर दिया गया।
हम आपको बता दें कि अंबरनाथ को शिवसेना का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। यही क्षेत्र शिंदे परिवार की राजनीतिक पकड़ का प्रतीक रहा है। ऐसे में यहां शिवसेना को सत्ता से बाहर करना केवल स्थानीय राजनीति की घटना नहीं रह जाती, बल्कि यह एक बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा और कांग्रेस ने इस गठबंधन को विकास के नाम पर उचित ठहराया है। उनका दावा है कि नगर परिषद को स्थिर और निष्पक्ष प्रशासन देने के लिए यह कदम जरूरी था। वहीं शिवसेना शिंदे गुट ने इस गठबंधन को अवसरवादी, अनैतिक और जनादेश का अपमान बताया है। इसके साथ ही इस घटनाक्रम ने महायुति के भीतर छिपे तनाव को सतह पर ला दिया है और यह स्पष्ट कर दिया है कि सत्ता के गणित के सामने वैचारिक मित्रता अब गौण होती जा रही है।
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देखा जाये तो अंबरनाथ का यह गठबंधन केवल एक नगर परिषद की कहानी नहीं है। यह उस राजनीति का जीवंत दस्तावेज है जहां सत्ता सर्वोच्च है और सिद्धांत एक इस्तेमाल होने वाला औजार बन चुके हैं। वैसे भारतीय राजनीति में यह पहली बार नहीं है जब विरोधी दलों ने हाथ मिलाया हो, लेकिन अंबरनाथ का मामला इसलिए ज्यादा चर्चा में है क्योंकि यहां न केवल वैचारिक विरोध को कुचला गया, बल्कि सहयोगी दल को खुलेआम धोखा दिया गया। भाजपा जिसने वर्षों तक कांग्रेस को भ्रष्टाचार और कुशासन का प्रतीक बताया, उसी कांग्रेस के साथ वह एक ही मेज पर बैठ गयी। दूसरी ओर कांग्रेस जिसने भाजपा को लोकतंत्र के लिए खतरा कहा, वही कांग्रेस सत्ता की खातिर उसी भाजपा की बैसाखी बन गयी। यह गठबंधन बताता है कि राजनीति अब विचारधारा की नहीं, बल्कि अंकगणित की हो चुकी है। जहां बहुमत मिलता है, वहां नैतिकता अपने आप दरकिनार हो जाती है।
भाजपा के लिए यह कदम विशेष रूप से सवालों के घेरे में है। महाराष्ट्र में सत्ता बनाए रखने के लिए उसने पहले शिवसेना को तोड़ा, फिर उसी शिवसेना के शिंदे गुट को साथ लिया और अब जब मौका मिला तो उसी सहयोगी को हाशिये पर धकेल दिया। कांग्रेस की भूमिका भी कम चिंताजनक नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर लगातार कमजोर होती कांग्रेस अब स्थानीय सत्ता के छोटे द्वीपों में जीवन तलाश रही है। भाजपा के साथ हाथ मिलाकर उसने यह स्वीकार कर लिया है कि उसके लिए वैचारिक संघर्ष अब प्राथमिक नहीं रहा। सत्ता में हिस्सेदारी ही उसकी नई राजनीति बन चुकी है।
शिवसेना शिंदे गुट के लिए यह घटनाक्रम एक चेतावनी है। केवल सत्ता में होना संगठन की मजबूती का प्रमाण नहीं होता। अंबरनाथ में सबसे बड़ा दल होने के बावजूद सत्ता से बाहर हो जाना यह दिखाता है कि राजनीतिक भरोसा केवल संख्या से नहीं चलता। सहयोगियों पर अत्यधिक निर्भरता अंततः राजनीतिक अकेलेपन में बदल जाती है।
देखा जाये तो इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा नुकसान जनता को होता है। मतदाता यह देखकर भ्रमित होता है कि जिन दलों को उसने एक दूसरे के विकल्प के रूप में चुना था, वही दल सत्ता के लिए एक हो सकते हैं। इससे लोकतंत्र में विश्वास कमजोर होता है और राजनीति के प्रति निराशा बढ़ती है। अंबरनाथ का गठबंधन महाराष्ट्र की राजनीति के भविष्य का संकेत है। आने वाले समय में नगर निगमों, जिला परिषदों और यहां तक कि विधानसभा स्तर पर भी ऐसे अप्राकृतिक गठजोड़ देखने को मिल सकते हैं।
यह घटना साफ कहती है कि महाराष्ट्र की राजनीति अब स्थायी मित्र और स्थायी शत्रु के सिद्धांत से बहुत आगे निकल चुकी है। यहां अब केवल एक नियम बचा है— सत्ता मिले, चाहे किसी के साथ भी जाना पड़े। अंबरनाथ में जो हुआ, वह एक नगर परिषद का फैसला नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति का बदलता स्वरूप है।
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