By उमेश चतुर्वेदी | Mar 24, 2026
ईरान पर अमेरिकी और इजरायली कार्रवाई के बाद पेट्रोलियम पदार्थों के आयात में ना सिर्फ भारत, बल्कि पूरी दुनिया को कई तरह की परेशानियों और रूकावटों का सामना करना पड़ रहा है। अगर खाड़ी संकट जल्द नहीं थमा तो पहले से ही करीब अस्सी अरब डॉलर सालाना खर्च करने वाले भारत की ऊर्जा क्षेत्र की चुनौतियां और बढ़ सकती हैं। पेट्रोलियम कारोबार पर निगाह रखने वाले वैश्विक संस्थानों को आशंका है कि अगर ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध लंबा खिंचा और इससे कच्चे तेल की कीमतों में प्रति बैरल दस डॉलर की भी बढ़ोत्तरी हुई तो भारत का पेट्रोलियम आयात खर्च पंद्रह हजार करोड़ डॉलर सालाना बढ़ सकता है। पेट्रोलियम आयात पर होने वाली इस बढ़ोतरी के चलते भारत पर नए सिरे से आर्थिक दबाव बढ़ेगा । ऐसे में जरूरी है कि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को लेकर नए सिरे से विचार करे और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की तलाश की दिशा में ना सिर्फ आगे बढ़े, बल्कि शोध और विकास पर भी जोर लगाए।
भारत के संदर्भ में देखें, तो रसोई गैस के मोर्चे में देश ने पिछले दस वर्षों में बड़ी क्रांति को देखा है। देश के रसोई घरों में पीएनजी यानी पाइप्ड नेचुरल गैस और एलपीजी यानी लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस की खपत बढ़ी है। मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, देश में प्राकृतिक गैस की रोजाना खपत करीब 189 मिलियन घन मीटर है। लेकिन घरेलू उत्पादन महज 97.5 मिलियन घन मीटर रोजाना ही है। करीब साठ फीसद गैस बाहर से आयात ही करना पड़ता है। देश में करीब 33 लाख एलपीजी कनेक्शन हैं। इनमें दस लाख 33 हजार कनेक्शन प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत दिए गए हैं। इन कनेक्शनों पर सालाना 312 लाख टन गैस खर्च होती है। इस खर्च होने वाली गैस का साठ फीसद हिस्सा आयात किया जाता है। जाहिर है कि देश का बड़ा गैस खर्च भी आयात पर ही निर्भर है। इसमें दो राय नहीं कि आधुनिक दुनिया की ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत पेट्रोलियम पदार्थ ही हैं, जिसमें डीजल, पेट्रोल और गैस तीनों ही शामिल हैं। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार देश की ऊर्जा स्रोत के रूप में सबसे ज्यादा खपत डीजल की है, जो कुल पेट्रोलियम खर्च का करीब करीब 38.5 फीसद है। इसके बाद पेट्रोल का नंबर आता है, जिसकी कुल ऊर्जा स्रोत के खपत में करीब 18 प्रतिशत की भागीदारी है, जबकि तीसरे नंबर पर करीब चौदह फीसद हिस्सेदारी के साथ प्राकृतिक गैस है। भारत सरकार के पेट्रोलियम मंत्रालय के मार्च 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार देश में रोजाना करीब 87 करोड़ लीटर पेट्रोल की खपत होती है। जबकि देश में इसका उत्पादन महज 9.65 करोड़ लीटर ही होता है। देश की कुल पेट्रोलियम खपत का करीब 87 फीसद हिस्सा आयात करना पड़ता है। कुल एलपीजी खर्च का 60 फीसद हिस्सा आयात से पूरा किया जाता है।
भारत में पारंपरिक रूप से लकड़ी के चूल्हे पर खाना पकाने का चलन रहा है। जिसके लिए जलावन पारंपरिक तौर पर फसलों के साथ ही पेड़ों और जंगलों से मिलता रहा है। लेकिन उन्हें बाद में स्वास्थ्य के लिए खराब माना जाने लगा। अब बदले हालात में जरूरी है कि पारंपरिक चूल्हों को विकसित करके उनकी ओर भी लौटा जाए। इसके लिए ऐसे उन्नत चूल्हे बनाए जाएं, जिससे धुआं कम से कम निकले और उनसे ऊर्जा ज्यादा मिले। अगर ऐसा हुआ तो देश सालाना तौर पर होने वाले 312 लाख टन एलपीजी के खपत को कम करके भारी मात्रा में आयात खर्च बचा सकता है। भारत में बिजली उत्पादन में भी प्राकृतिक गैस का खूब इस्तेमाल होता है। इस पर भी लगाम लगाने के लिए देश को वैकल्पिक उपाय खोजने होंगे। वैसे सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा की ओर देश ने तेजी से कदम बढ़ाए हैं। लेकिन अब इन कदमों को और तेजी से विकल्पों की दिशा में बढ़ाना होगा। भारत में सदानीरा नदियां हैं, समुद्र का भी बड़ा किनारा है। उस ओर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। समुद्री लहरों के जरिए भी बिजली बनाने पर शोध हो रहा है, इस दिशा में भी तेजी लाई जानी चाहिए। तभी जाकर हम आने वाले दिनों में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का ज्यादा इस्तेमाल कर सकेंगे, तब हम आयात के भारी-भरकम खर्च से बचेंगे और दुनिया को पर्यावरण अनुकूल बना सकेंगे।
-उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं