इस तरह सीमा पार धकेले जा रहे Bangladeshi Infiltrators, बंगाल की धरती से तेजी से कम होते जा रहे हैं घुसपैठिये

By नीरज कुमार दुबे | Jun 02, 2026

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद से लेकर उत्तर 24 परगना तक और दिल्ली से लेकर असम तक अब एक ही संदेश गूंज रहा है कि भारत अब घुसपैठियों की शरणस्थली नहीं बनेगा। बंगाल की धरती पर वर्षों से जिस अवैध घुसपैठ को राजनीतिक संरक्षण देकर वोट बैंक की खेती की गई, अब उस पर निर्णायक प्रहार शुरू हो चुका है। मुर्शिदाबाद के रानीनगर सीमा बिंदु से सत्रह बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजा जाना भारत की सुरक्षा और अस्मिता की रक्षा के प्रति कठोर संकल्प का प्रमाण है।

देखा जाये तो यह वही बंगाल है जहां कभी घुसपैठियों को राजनीतिक संरक्षण दिया जाता था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। मुख्यमंत्री शुभेन्दु अधिकारी की सरकार ने साफ कर दिया है कि बंगाल की जमीन पर केवल भारतीयों का अधिकार होगा। उनकी घोषित नीति डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट अब धरातल पर दिखाई देने लगी है। होल्डिंग सेंटर बनाए जा रहे हैं, सीमाओं पर निगरानी बढ़ रही है और अवैध घुसपैठियों को पहचान कर वापस भेजा जा रहा है। यही कारण है कि सैकड़ों बांग्लादेशी खुद ही सीमा चौकियों पर पहुंचकर वापस लौटने की गुहार लगा रहे हैं। उन्हें समझ में आ चुका है कि अब बंगाल में छिपकर रहना आसान नहीं होगा।

जो लोग वर्षों से भारत की उदारता का दुरुपयोग कर यहां अवैध तरीके से बसे, भारतीय संसाधनों पर कब्जा किया, मजदूरी छीनी और कई मामलों में सुरक्षा के लिए खतरा बने, उन्हें अब स्पष्ट चेतावनी है भारत की सीमा कोई खुला दरवाजा नहीं है। यदि कोई अवैध रूप से भारत में घुसने की कोशिश करेगा तो उसे वापस धकेला जाएगा। यह केवल कानूनी नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद केंद्र की मोदी सरकार ने जिस सख्त नीति को अपनाया, उसने पूरे देश में संदेश दिया कि घुसपैठ अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। राज्यों को निर्देश दिए गए, सीमा सुरक्षा बल को खुली कार्रवाई का अधिकार मिला और अब परिणाम सामने हैं।

हम आपको बता दें कि मुर्शिदाबाद जिले में एक सौ पच्चीस किलोमीटर लंबी सीमा पर बाड़ लगाने का कार्य तेज कर दिया गया है। प्रशासन का लक्ष्य है कि एक सौ पांच किलोमीटर क्षेत्र को जल्द पूरी तरह सुरक्षित कर दिया जाए। भूतगाड़ी इलाके में सीमा सुरक्षा बल का नया शिविर बनाने का विरोध कुछ किसानों ने किया, लेकिन प्रशासन ने साफ कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है। उचित मुआवजे के आश्वासन के बाद विरोध समाप्त हो गया। यह दर्शाता है कि अब सरकार सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए किसी भी स्तर तक जाने को तैयार है।

उधर, बांग्लादेश की ओर से आपत्तियां जरूर उठाई जा रही हैं। ढाका इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बता रहा है, लेकिन भारत का भी स्पष्ट तर्क है कि वर्षों से हजारों सत्यापन अनुरोध लंबित पड़े हैं। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि दो हजार आठ सौ बासठ से अधिक मामलों में बांग्लादेश ने अब तक पहचान की पुष्टि नहीं की। ऐसे में भारत कब तक अवैध घुसपैठियों का बोझ उठाता रहेगा। देश की सुरक्षा और जनसांख्यिक संतुलन बनाए रखना हर सरकार का दायित्व है।

वहीं कुछ मानवाधिकार संगठन इस कार्रवाई पर सवाल उठा रहे हैं और प्रक्रिया को कठोर बता रहे हैं। निश्चित रूप से किसी भी भारतीय नागरिक के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए और अदालतों ने जहां जरूरी समझा वहां हस्तक्षेप भी किया। लेकिन इन अलग अलग मामलों की आड़ लेकर पूरे अभियान को बदनाम करना गलत है। सच्चाई यह है कि दशकों तक चली ढील और राजनीतिक तुष्टीकरण ने बंगाल सहित कई सीमावर्ती इलाकों की सामाजिक और जनसांख्यिक स्थिति को बदल दिया। यही कारण है कि आज आम नागरिक भी सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह लगातार चेतावनी देते रहे हैं कि अनियंत्रित घुसपैठ देश की सुरक्षा, रोजगार और सामाजिक संतुलन के लिए बड़ा खतरा है। अब बंगाल में शुभेन्दु अधिकारी की सरकार उसी संकल्प को जमीन पर उतारती दिखाई दे रही है। यह राष्ट्र रक्षा का अभियान बन चुका है। जो लोग भारत की सीमाओं को कमजोर समझते थे, उन्हें अब समझ लेना चाहिए कि नया भारत घुसपैठियों के लिए नरम नहीं है।

बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए यह अंतिम संदेश है कि भारत में अवैध रूप से रहने के दिन अब समाप्त हो चुके हैं। या तो कानून का सम्मान कर स्वेच्छा से लौट जाइए, वरना प्रशासन और सुरक्षा बल आपको खोजकर सीमा के पार पहुंचा देंगे। बंगाल अब घुसपैठ का गलियारा नहीं बल्कि राष्ट्र सुरक्षा की अग्रिम चौकी बनने की ओर बढ़ चुका है।

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