By सुखी भारती | Oct 31, 2026
पिछले प्रसंग में हमने देखा कि रावण, कुंभकर्ण और विभीषण ने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त किए। रावण ने अपनी शक्ति के बल पर संसार को जीतने का निश्चय किया, जबकि विभीषण ने भगवान के चरणों की भक्ति माँगी। समय बीतने के साथ रावण का बल और ऐश्वर्य बढ़ता गया। लेकिन शक्ति के साथ उसके भीतर अहंकार भी बढ़ने लगा। धीरे-धीरे उसने अपने बल का उपयोग लोककल्याण के स्थान पर अत्याचार करने के लिए करना आरंभ कर दिया।
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तुलसीदासजी लिखते हैं—
अर्थात् रावण ने अपने बाहुबल से संसार को अपने वश में कर लिया। कोई भी स्वतंत्र नहीं रह गया था। अनेक राजा उसके अधीन होकर उसके आदेश के अनुसार शासन करने लगे थे।
रावण का अत्याचार केवल राजाओं और देवताओं तक सीमित नहीं रहा। उसके राक्षसों ने ऋषियों के आश्रमों, यज्ञों और धार्मिक अनुष्ठानों में बाधा डालनी आरंभ कर दी। वे अनेक प्रकार के रूप धारण करके लोगों को भयभीत करते और जहाँ धर्म का पालन होता, वहीं विघ्न उत्पन्न करते थे।
तुलसीदासजी इस स्थिति का वर्णन करते हुए कहते हैं—
अर्थात् राक्षस ऐसे कार्य करते थे जिनसे धर्म की जड़ कट जाए। वे वेदों के विरुद्ध आचरण करते और जहाँ गौ तथा ब्राह्मण दिखाई देते, वहाँ नगरों और गाँवों में आग लगा देते थे।
इस प्रकार धर्म और सदाचार का वातावरण बिगड़ने लगा। माता-पिता का सम्मान कम होने लगा, देवताओं और गुरुओं के प्रति श्रद्धा घटने लगी तथा साधु-संतों को भी कष्ट सहना पड़ने लगा। जहाँ भगवान की भक्ति, यज्ञ, तपस्या और ज्ञान की चर्चा होनी चाहिए थी, वहाँ भय और अत्याचार का वातावरण फैल गया।
तुलसीदासजी कहते हैं—
अर्थात् शुभ आचरण का अभाव हो गया। लोग देवता, ब्राह्मण और गुरु का सम्मान नहीं करते थे। हरिभक्ति, यज्ञ, तपस्या और ज्ञान की चर्चा तक सुनाई नहीं देती थी।
धर्म की इस दुर्दशा को देखकर पृथ्वी अत्यंत व्याकुल हो उठी। यहाँ तुलसीदासजी एक अत्यंत मार्मिक चित्र प्रस्तुत करते हैं। पृथ्वी पर पर्वत हैं, नदियाँ हैं, समुद्र हैं और असंख्य जीवों का भार है; फिर भी पृथ्वी को इनका भार उतना कष्टदायक नहीं लगता, जितना दूसरों का अनिष्ट करने वाले अधर्मी का भार लगता है।
पृथ्वी मन ही मन विचार करती है कि वह रावण के अत्याचारों को देख रही है, लेकिन उसके भय से कुछ कह भी नहीं सकती। अंततः जब अत्याचार असहनीय हो गए, तब उसने देवताओं और मुनियों के पास जाने का निश्चय किया।
अर्थात् पृथ्वी ने मन में विचार करके गौ का रूप धारण किया और वहाँ पहुँची जहाँ देवता तथा मुनि एकत्र थे। उसने रोते हुए अपना दुःख सुनाया, लेकिन तत्काल कोई भी उसकी समस्या का समाधान नहीं कर सका।
यह प्रसंग अत्यंत भावपूर्ण है। सनातन परंपरा में गौ को करुणा, पोषण और धर्म का प्रतीक माना गया है। पृथ्वी का गौ का रूप धारण करना उसकी असहाय अवस्था और करुण पुकार को सजीव बना देता है। वह समस्त प्राणियों को धारण करने वाली माता है, किंतु जब उसके ऊपर अधर्म का बोझ बढ़ गया, तब वह स्वयं सहायता की याचना करने लगी।
पृथ्वी की व्यथा सुनकर देवता, मुनि और गंधर्व एक साथ ब्रह्माजी के लोक में पहुँचे। उनके साथ गौ के रूप में पृथ्वी भी थी। सभी अत्यंत दुःखी थे। वे जानते थे कि रावण को ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त हैं और साधारण उपायों से उसका अत्याचार समाप्त करना संभव नहीं है।
ब्रह्माजी ने सबकी स्थिति समझी। वे जानते थे कि इस संकट का अंतिम समाधान स्वयं भगवान विष्णु ही कर सकते हैं। उन्होंने पृथ्वी को धैर्य रखने के लिए कहा और भगवान के चरणों का स्मरण करने का उपदेश दिया।
तुलसीदासजी कहते हैं—
धरनि धरहि मन धीर कह बिरंचि हरिपद सुमिरु।
जानत जन की पीर प्रभु भंजिहि दारुन बिपति॥
अर्थात् ब्रह्माजी ने पृथ्वी से कहा कि वह धैर्य रखे और भगवान के चरणों का स्मरण करे। भगवान अपने भक्तों की पीड़ा जानते हैं और उनकी भयंकर विपत्ति को दूर करेंगे।
अब देवताओं के सामने प्रश्न था कि भगवान को कहाँ खोजा जाए। कोई कहता था कि वे बैकुंठ में हैं, तो कोई उन्हें क्षीरसागर में विराजमान मानता था। सभी भगवान की शरण लेना चाहते थे, किंतु उनके प्रकट होने के स्थान को लेकर विचार करने लगे।
इसी अवसर पर भगवान की सर्वव्यापकता का सिद्धांत सामने आता है। भगवान केवल किसी एक स्थान तक सीमित नहीं हैं। वे अपने भक्तों के हृदय में भी विराजते हैं। सच्चे प्रेम और भक्ति से पुकारने पर वे अपने भक्तों की पुकार अवश्य सुनते हैं।
तभी आकाश में गंभीर दिव्य वाणी सुनाई दी। उस वाणी ने देवताओं और पृथ्वी के हृदय से भय तथा संदेह दूर कर दिया। भगवान ने आश्वासन दिया कि वे देवताओं के हित के लिए मनुष्य रूप धारण करेंगे और सूर्यवंश में अवतार लेकर पृथ्वी का भार दूर करेंगे।
भगवान की वाणी थी—
जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा।
तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा॥
अंसन्ह सहित मनुज अवतारा।
लेहउँ दिनकर बंस उदारा॥
अर्थात् हे मुनियों, सिद्धों और देवताओं के स्वामी इंद्र! तुम भय मत करो। तुम सबके हित के लिए मैं मनुष्य का रूप धारण करूँगा और अपने अंशों सहित महान सूर्यवंश में अवतार लूँगा।
भगवान ने आगे बताया कि पूर्वकाल में कश्यप और अदिति की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्होंने उन्हें वरदान दिया था। अब वही कश्यप और अदिति अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के रूप में प्रकट हुए हैं। भगवान उन्हीं के घर अवतार लेंगे और रघुकुल की मर्यादा को गौरवान्वित करेंगे।
तिन्ह कें गृह अवतरिहउँ जाई।
रघुकुल तिलक सो चारिउ भाई॥
अर्थात् भगवान राजा दशरथ के घर अवतार लेंगे और चारों भाइयों के रूप में प्रकट होकर रघुकुल के गौरव को बढ़ाएँगे।
भगवान ने पृथ्वी का भार दूर करने और अधर्म का अंत करने का वचन दिया। उनकी आकाशवाणी सुनकर देवताओं के हृदय में शांति और आनंद छा गया। ब्रह्माजी ने पृथ्वी को आश्वस्त किया और देवताओं को निर्देश दिया कि वे वानर रूप धारण करके पृथ्वी पर जन्म लें, जिससे भगवान के कार्य में सहायता कर सकें।
इस प्रकार श्रीराम के अवतार की पृष्ठभूमि तैयार हुई। रावण के अत्याचारों से व्याकुल पृथ्वी की पुकार, देवताओं की प्रार्थना और भगवान का आश्वासन—ये सभी घटनाएँ एक ही सत्य की ओर संकेत करती हैं कि जब अधर्म अपनी सीमा पार कर देता है और धर्म की रक्षा कठिन हो जाती है, तब भगवान अपने भक्तों की रक्षा तथा धर्म की स्थापना के लिए अवतार लेते हैं।
रावण को अपनी शक्ति और वरदानों पर गर्व था। उसे विश्वास था कि संसार में कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। किंतु वह भूल गया कि ईश्वर की योजना के सामने अहंकार और अत्याचार की शक्ति स्थायी नहीं होती। जिस मनुष्य को उसने तुच्छ समझकर अपनी मृत्यु के भय से बाहर रखा था, उसी मनुष्य रूप में भगवान श्रीराम अवतरित होने वाले थे।
अब अयोध्या में राजा दशरथ के घर उस दिव्य अवतार का समय निकट आ रहा था, जिसकी प्रतीक्षा देवता, मुनि और स्वयं पृथ्वी कर रहे थे।
जय श्रीराम।
- सुखी भारती