फुटबाल की राजनीति और राजनीति में फुटबाल (व्यंग्य)

By अरुण अर्णव खरे | Dec 13, 2022

फुटबाल मेरा पसंदीदा खेल है। इसके दो कारण हैं। एक तो यही कि यह दुनिया का सबसे लोकप्रिय खेल है और दूसरा एक बार इंटरव्यू में पूछे जाने पर सबसे पसंदीदा खेल का नाम फुटबाल मुँह से निकल गया था।  हालाँकि उस समय मेरा सबसे पसंदीदा खेल राजनीति था लेकिन उस समय तक राजनीति को खेल का दर्जा नहीं मिल पाया था। तब राजनीति करने की चीज मानी जाती थी, खेलने की नहीं यद्यपि उस समय भी ये दोनों शब्द मुझे एक दूसरे के पर्यायवाची लगते थे। आज भी राजनीति को खेल का औपचारिक दर्जा नहीं मिला है लेकिन राजनीति में खेल करने की स्वीकार्यता कई गुना बढ़ गई है। फुटबाल जितना मैदान पर खेला जाता है उतना ही मैदान से बाहर रणनीतिक स्तर पर खेला जाता है। आज जब मैं तटस्थ भाव से सोचता हूँ तो पाता हूँ कि फुटबाल और राजनीति में बहुत सी समानताएँ तो हैं ही, विरोधाभास भी बहुत है लेकिन दोनों ही मैदान और मैदान से बाहर पूरी शिद्दत के साथ खेले जाते हैं।

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फुटबाल में गलत टैकलिंग करना फाउल माना जाता है जबकि राजनीति में विरोधी के साथ गलत हैंडलिंग नजरअंदाज की जाती है। जहाँ फुटबाल में "फाउल प्ले" के लिए येलो और रेड कॉर्ड्स हैं वहीं राजनीति में "फाउल-जुबाँ" के लिए कोई कॉर्ड नहीं है। जहाँ फुटबाल में रेड कॉर्ड के बाद खिलाड़ी को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है वहीं "अगली-जुबाँ" के लिए राजनीति में विधायकी या संसदीय-सीट पक्की समझी जाती है। फुटबाल में ऑफ साइड खिलाड़ी द्वारा किया गया गोल नहीं माना जाता लेकिन राजनीति में इस तरह का कोई नियम नहीं है। राजनीति में ऑफ साइड में खड़ा खिलाड़ी कोई भी खेला करने के लिए स्वतंत्र होता है।

फुटबाल में मैनेजर की अहम भूमिका होती है। वह विरोधी टीम के खेल के हिसाब से रणनीति बनाता है जबकि राजनीति में मैनेजर नहीं रखा जाता। राजनीति में आजकल पेशेवर स्ट्रेटजिस्ट या टैक्टिशियन नियुक्त किया जाता है जो सीट दर सीट जाति, धर्म, स्थानियता के हिसाब से रणनीति तय करता है। फुटबाल में मैनेजर कप्तान से भी ज्यादा पॉवरफुल होता है लेकिन राजनीति में यह कल्पना से परे है।

- अरुण अर्णव खरे

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