प्रधानमंत्री मोदी का लालकिले से 'विकसित भारत' का संकल्प

By अशोक भाटिया | Aug 17, 2026

ऐतिहासिक लालकिले की प्राचीर केवल पत्थरों की एक संरचना नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के उतार-चढ़ाव, उसकी आकांक्षाओं, उसकी नियति और उसके सामूहिक संकल्पों की मूक गवाह रही है। हर वर्ष 15 अगस्त को इस प्राचीर से देश के प्रधानमंत्री जब राष्ट्र को संबोधित करते हैं, तो वह केवल एक औपचारिक भाषण नहीं होता, बल्कि वह आने वाले समय के लिए देश का नीतिगत और वैचारिक रोडमैप होता है। स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी ऐतिहासिक प्राचीर से वर्ष 2047 तक भारत को एक 'विकसित राष्ट्र' बनाने का जो अटूट संकल्प दोहराया है, वह देश की समकालीन राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज के लिए एक युगांतकारी मोड़ है। 'विकसित भारत' का यह विजन महज़ एक राजनीतिक नारा नहीं है, बल्कि यह 140 करोड़ नागरिकों की सामूहिक चेतना को जगाने और उन्हें राष्ट्र निर्माण के एक महायज्ञ में आहुति देने के लिए प्रेरित करने वाला एक व्यापक राष्ट्रीय दर्शन है। जब हम इस विराट संकल्प की बात करते हैं, तो हमें इसके ऐतिहासिक संदर्भ और प्रासंगिकता को गहराई से समझना होगा। भारत ने लगभग दो सदियों तक औपनिवेशिक दासता और आर्थिक शोषण का दंश झेला है। 1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ, तब हमारी अर्थव्यवस्था जर्जर थी, साक्षरता दर दयनीय थी और अकाल तथा गरीबी जैसी बुनियादी चुनौतियां हमारे सामने थीं। शुरुआती दशकों में भारत का मुख्य ध्यान आत्मनिर्भरता और बुनियादी अस्तित्व की रक्षा पर था। हमने खाद्यान्न संकट से निपटने के लिए हरित क्रांति की, अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए सैन्य तंत्र को मजबूत किया और धीरे-धीरे एक ठोस औद्योगिक आधार तैयार किया। आज, स्वतंत्रता के इस दौर में, भारत उस स्थिति से बहुत आगे निकल चुका है और अब हम केवल एक अस्तित्व बनाए रखने वाले देश नहीं हैं, बल्कि हम वैश्विक पटल पर एक नई दिशा तय करने वाले राष्ट्र बन चुके हैं। यह संकल्प इस बात का प्रतीक है कि अब भारत अपनी विकासशील छवि के खोल को तोड़कर वैश्विक शक्तियों की अग्रिम पंक्ति में खड़े होने के लिए पूरी तरह तैयार है। 2047 का वर्ष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमारी स्वतंत्रता का शताब्दी वर्ष होगा, और कोई भी राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने पर दुनिया के सामने अपनी सफलता का क्या प्रमाण प्रस्तुत करता है, यही उसका वास्तविक ऐतिहासिक मूल्यांकन होता है।

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आर्थिक मोर्चे पर, भारत आज दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और शीर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं की ओर अग्रसर है। लेकिन विकसित देश बनने के लिए हमें केवल सकल घरेलू उत्पाद के आकार को ही नहीं बढ़ाना है, बल्कि प्रति व्यक्ति आय और नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में भी गुणात्मक सुधार करना होगा। इसके लिए विनिर्माण और आत्मनिर्भरता पर विशेष बल देना आवश्यक है। 'मेक इन इंडिया' अभियान के तहत भारत आज मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग, रक्षा उत्पादन और इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में एक वैश्विक केंद्र के रूप में उभर रहा है। रक्षा क्षेत्र में, जहां कभी हम पूरी तरह आयातों पर निर्भर थे, आज हम स्वदेशी अत्याधुनिक सैन्य उपकरणों का निर्माण कर रहे हैं और उनका निर्यात भी बढ़ा रहे हैं। भारतीय कॉर्पोरेट जगत को अब वैश्विक कंपनियों की तर्ज पर अपनी क्षमता का विस्तार करना होगा ताकि भारतीय ब्रांड दुनिया भर के बाजारों में अग्रणी भूमिका निभा सकें। इसके साथ ही, देश के बुनियादी ढांचे का कायाकल्प किया जा रहा है। आधुनिक रेलवे, एक्सप्रेसवे का विस्तृत नेटवर्क, जलमार्गों का विकास और हवाई अड्डों का आधुनिकीकरण देश की लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने और व्यापार को सुगम बनाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। एक मजबूत और आधुनिक बुनियादी ढांचा ही विकसित भारत की ठोस नींव बनेगा, जो देश के औद्योगिक विकास को नई गति प्रदान करेगा।

तकनीक और नवाचार के इस युग में जो देश अग्रणी रहेगा, वही दुनिया के भविष्य को दिशा देगा। भारत ने डिजिटल क्षेत्र में जो क्रांति की है, उसने दुनिया के विकसित देशों को भी अचंभित किया है। हमारा डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल लेनदेन की व्यवस्था आज वैश्विक स्तर पर एक मिसाल बन चुकी है। भारत ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं है, बल्कि वह विश्व को सस्ती, सुरक्षित और समावेशी तकनीक देने वाला प्रदाता भी है। विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में बढ़ता निवेश इस विजन को और स्पष्ट करता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर मिशन, क्वांटम कंप्यूटिंग, अंतरिक्ष अनुसंधान और ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में भारत का बढ़ता कदम यह दर्शाता है कि हम भविष्य की तकनीकों के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर और संप्रभु होना विकसित भारत की एक अनिवार्य शर्त है, जो हमें वैश्विक मंच पर एक अद्वितीय पहचान दिलाएगी।

संकल्प जितना विराट होता है, उसकी राह की चुनौतियां भी उतनी ही कठिन होती हैं। विकसित भारत के मार्ग में कई आंतरिक और बाह्य चुनौतियां हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। देश की आर्थिक प्रगति के साथ-साथ क्षेत्रीय और सामाजिक असमानता को पाटना एक बड़ी चुनौती है। विकास का लाभ समाज के हर वर्ग और देश के हर कोने तक समान रूप से पहुंचना चाहिए। इसके अलावा, भारत को पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच एक कुशल संतुलन बनाना होगा। जलवायु परिवर्तन के खतरों को देखते हुए नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाना और सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करना युद्धस्तर पर आवश्यक है। प्रशासनिक स्तर पर, हमारी व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिक-अनुकूल बनना होगा, क्योंकि लालफीताशाही और भ्रष्टाचार विकास की गति को धीमा करते हैं। वैश्विक मोर्चे पर, वर्तमान समय की भू-राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक व्यवधान भी हमारे सामने चुनौतियां खड़ी करते हैं, जिनसे निपटने के लिए भारत को अपनी कूटनीतिक कुशलता और आंतरिक आर्थिक सुदृढ़ता को निरंतर मजबूत बनाए रखना होगा।

इस पूरे महायज्ञ में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका देश के नागरिकों की है। कोई भी देश केवल सरकार की नीतियों, बजट या घोषणाओं से विकसित नहीं बनता। सरकार मार्ग प्रशस्त कर सकती है, बुनियादी ढांचा दे सकती है, लेकिन उस पर चलकर देश को आगे ले जाने का काम नागरिकों के सामूहिक प्रयासों से ही संभव होता है। विकसित भारत का संकल्प तब तक अधूरा है जब तक देश का हर नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सजग नहीं होता। चाहे वह करों का ईमानदारी से भुगतान करना हो, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना हो, पर्यावरण को बचाना हो, या फिर अपने-अपने कार्यक्षेत्र में पूर्ण ईमानदारी और उत्कृष्टता के साथ योगदान देना हो—ये सभी नागरिक प्रयास मिलकर एक विशाल राष्ट्रीय शक्ति का निर्माण करते हैं। जब देश के नागरिक 'राष्ट्र प्रथम' की भावना को अपने जीवन का मूल मंत्र बना लेंगे, तो भारत की प्रगति को कोई रोक नहीं पाएगा।

निष्कर्षतः विकसित भारत का संकल्प केवल आर्थिक आंकड़ों या ऊंची इमारतों तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ एक ऐसे भारत का निर्माण करना है जो आर्थिक रूप से समृद्ध हो, तकनीकी रूप से अग्रणी हो, सामाजिक रूप से समरस और न्यायपूर्ण हो, और सांस्कृतिक रूप से अपनी समृद्ध जड़ों से जुड़ा हुआ हो। यह एक ऐसे भारत का सपना है जहां हर नागरिक को समान अवसर, उत्कृष्ट शिक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा मिले। लालकिले की प्राचीर से गूंजा यह संकल्प देश के लिए एक महान आह्वान है। आने वाले दो दशक भारत के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष होने जा रहे हैं। यदि हम सब मिलकर पूरी निष्ठा और राष्ट्रीय गौरव की भावना के साथ इस संकल्प के प्रति समर्पित हो जाएं, तो निश्चित रूप से वर्ष 2047 में जब भारत अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी मना रहा होगा, तब वह विश्व पटल पर एक परम वैभवशाली, समर्थ और विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित होगा।

अशोक भाटिया,

वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार

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