मलयालम को ताकतवर बनाने का श्रेय लेने की होड़

By उमेश चतुर्वेदी | Mar 27, 2026

केरलम् में विधानसभा चुनावों के बीच मलयालम को राज्य की आधिकारिक भाषा का दर्जा मिलने का श्रेय लेने का सियासी खेल बढ़ता जा रहा है। राज्य का नाम केरलम् किया जाना और इसके हफ्तेभर बाद ही मलयालम को आधिकारिक भाषा की मंजूरी मिलना कुछ लोगों की नजर में भले ही संयोग हो, लेकिन ऐसा नहीं है। राज्य में विधानसभा चुनाव की रणभेरी बजने की औपचारिकता भर बाकी है। इस संदर्भ में राजनीतिक दलों द्वारा इन दोनों कदमों का श्रेय लेने की होड़ मचना स्वाभाविक है। लेकिन भाषा विधेयक को लेकर केरल की सीमाओं के बाहर सवाल भी उठने शुरू हो गए हैं। इसमें दो राय नहीं कि गैर हिंदीभाषी इलाके अपनी भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं को अपनी अस्मिता से जोड़कर देखते हैं। हिंदीभाषी राज्यों में अपनी हिंदी या स्थानीय भाषाओं को लेकर ऐसी सोच नहीं दिखती। 

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अब तक केरल में अंग्रेजी के साथ ही मलयालम को आधिकारिक भाषा के तौर पर प्रतिष्ठा रही है। लेकिन नए कानून के तहत सरकारी और सरकारी अनुदान प्राप्त स्कूलों में कक्षा 10 तक मलयालम को पहली भाषा के तौर पर अनिवार्य रूप से पढ़ाना जरूरी होगा। इसके साथ ही अदालती फैसलों और कार्यवाही भी अनिवार्य तौर पर मलयालम भाषा में अनूदित की जाएंगी। अब से राज्य विधानसभा में सभी बिल और अध्यादेश मलयालम में पेश किए जाएंगे। इसके साथ ही, अंग्रेजी में प्रकाशित महत्वपूर्ण केंद्रीय और राज्य कानूनों का भी मलयालम में अनुवाद होगा। नए कानून के तहत सूचना तकनीकी विभाग को मलयालम के प्रभावी इस्तेमाल के लिए ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर और इंस्ट्रूमेंट विकसित करने की जिम्मेदारी दी जा रही है। राज्य सचिवालय में मौजूदा पर्सनल एंड एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म्स (ऑफिशियल लैंग्वेज) विभाग का नाम बदलकर मलयालम भाषा विकास विभाग किया जा राह है। इन कदमों के साथ ही राज्य में मलयालम भाषा विकास निदेशालय भी गठित किया जाएगा।

भाषायी अस्मिता के लिहाज से देखें तो केरल का यह कदम बेहद क्रांतिकारी और भारतीय भाषाओं के हित में है। लेकिन कर्नाटक की आपत्तियों को भी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। यहां ध्यान दिया जाना चाहिए कि केरल के कासरगोड जिले में मलयालम की बजाय कन्नड़ भाषी लोग ज्यादा है। राज्य मे इसी तरह तमिल, तुलु, गुजराती और कोंकणीभाषी लोग भी हैं। उनकी अपनी भाषाओं में पढ़ाई वाले स्कूल भी हैं। हालांकि मलयालम भाषा कानून का विरोध तमिल मूल के लोगों ने तो नहीं किया है, लेकिन कर्नाटक के तर्कों में उनकी भी बातें एक तरह शामिल हैं।

कर्नाटक सरकार का तर्क है कि यह कानून केरल में रहने वाले कन्नड़ भाषी अल्पसंख्यकों की भाषाई अस्मिता के लिए खतरा है। यह कानून, कर्नाटक भाषियों के अधिकारों का उल्लंघन है। कर्नाटक सीमा क्षेत्र विकास प्राधिकरण का तर्क है है कि कासरगोड और केरल के दूसरे कन्नड़ भाषी क्षेत्रों में भाषाई अल्पसंख्यक छात्र अभी स्कूलों में कन्नड़ को पहली भाषा के तौर पर पढ़ते हैं। केरल में स्कूलों में हिंदी भी पढ़ाई जाती रही है। इसलिए माना जाता है कि केरल में हिंदीविरोधी माहौल नहीं है। लेकिन दिलचस्प यह है कि केरल के विद्वान भी इस कानून के पक्ष में तर्क देते वक्त केंद्र सरकार पर केरल में हिंदी थोपने का आरोप लगाने से नहीं हिचक रहे। दिलचस्प यह है कि ऐसा ही आरोप कर्नाटक की ओर से लगाया जा रहा है, बस वहां हिंदी की जगह मलयालम को थोपे जाने की बात हो रही है।

केरल सरकार ने हालांकि सफाई दी है कि जिनकी मातृभाषा तमिल, कन्नड़, तुलु या कोंकणी है, उनके लिए भी कानून में प्रावधान हैं। इस कानून में इस बात की चर्चा है कि राज्य के भाषायी अल्पसंख्यक अपनी भाषा में राज्य सचिवालय, विभागों और स्थानीय सरकारी कार्यालयों से पत्राचार कर सकेंगे। इसके साथ ही, मलयालम के अलावा दूसरी मातृभाषा वाले छात्रों को नेशनल एजुकेशन प्रोग्राम में शामिल भाषाओं में पढ़ाई कर सकेंगे। इसी तरह दूसरे राज्यों या विदेश से आने वाले छात्रों को नौंवी, दसवीं और हायर सेकेंडरी स्तर पर मलयालम की परीक्षा देने से छूट मिलेगी। 

मलयालम को आधिकारिक भाषा बनाने का स्थानीय नागरिक स्वागत तो कर रहे हैं, लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि इस कानून के नाम से ही अलगाववादी और वर्चस्ववादी झलक मिलती है।, केरल के बौद्धिकों के एक वर्ग का कहना है कि बेहतर होता है कि इस कानून का नाम ‘मलयालम भाषा एक्ट 2025’ की जगह ‘केरल स्टेट लैंग्वेज एक्ट 2025’ होता। इससे समावेशी संदेश जाता। यहां के बौद्धिकों का तर्क है कि इस विधेयक में मलयालम की जगह बेहतर होता कि राज्य में प्रयोग में लाई जाने वाली तमिल,कन्नड़, कोंकणी, तुलु और गुजराती का भी जिक्र होता। केरल में जंगलों और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों की अपनी भाषाएं भी हैं। वे मलयालम का इस्तेमाल कम करते हैं। इसलिए एक वर्ग का मानना है कि उनकी भाषाओं की अस्मिता की रक्षा का बोध भी इस कानून में होना चाहिए था।

बेशक केरल के विधानसभा चुनाव में मलयालम को आधिकारिक दर्जा मिलना बड़ा मुद्दा होगा। राज्य की राजनीति में प्रभावी दखल देने की ताक में बैठी भाजपा, कांग्रेस और वाममोर्चा, सभी इसका श्रेय लेने की कोशिश करेंगे। लेकिन यहां के बौद्धिक समाज की चिंता है कि इस विधेयक से राज्य में एक भाषा के वर्चस्व का भाव पैदा हो सकता है। ऐसा लगता है कि जिन लोगों की भाषा मलयालम नहीं है, उनकी प्रशासनिक और शासन से जुड़ी चिंताओं को अंग्रेजी के जरिए हल किया जा सकता है। लेकिन केरल के बौद्धिक मानते हैं कि राज्य के बहुसंख्यक समुदाय की भाषा से इतर वाले लोगों की समस्याओं का समाधान अंग्रेज़ी के ज़रिए नहीं हो सकते। इसलिए भाषा विकास विभाग और निदेशालय को सिर्फ़ मलयालम भाषा तक सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि केरल की सभी भाषाओं के लिए होना होगा। केरल में मांग उठ रही है कि वहां के सिविल सर्विस सुधार विभाग को मलयालम भाषा विकास विभाग के रूप में बदल दिया जाना चाहिए। कानून में इस विभाग के पुनर्गठन और मलयालम भाषा व कास निदेशालय बनाने का प्रावधान है। यहां के भाषाशास्त्री इसे स्वागत योग्य कदम बता तो रहे हैं। लेकिन, इसमें मलयालम के साथ दूसरी भाषा समूहों का भी प्रतिनिधित्व देने का सुझाव दे रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि भाषा का काम जोड़ना है, तोड़ना नहीं। शायद यही वजह है कि मलयालम भाषा कानून के स्वागत के साथ ही दूसरी भाषाओं को तवज्जो देने की मांग हो रही है। 

मातृभाषा से इतर समूहों से आने वाले लोग किसी भी भाषा को अवसरों और जरूरत के लिहाज से सीखते हैं। सीखने की इस प्रक्रिया में मजबूरी की बजाय उत्साह जुड़ जाता है तो भाषाएं समृद्ध होती हैं और वे सौहार्द का प्रतीक बनती हैं। आधिकारिक भाषा बनने के बाद मलयालम भी उसी तरह उम्मीद की भाषा बने, शायद यही केरल के बौद्धिक चाहते हैं। मलयालमभाषियों की इस सोच से हिंदीभाषी विद्वानों, राजनेताओं और प्रशासनिक तंत्र को प्रेरित होना चाहिए। 

-उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

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