हिंसा के दौर में गांधी के सिद्धांतों की प्रासंगिकता

By योगेश कुमार गोयल | Jan 30, 2026

2 अक्तूबर 1869 को पोरबंदर में जन्मे महात्मा गांधी जीवन पर्यन्त देशवासियों के लिए आदर्श नायक बने रहे। देश के स्वतंत्रता संग्राम में उनके अविस्मरणीय योगदान से पूरी दुनिया सुपरिचित है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नायकों में से एक महात्मा गांधी का आज 78वां बलिदान दिवस है, जिनकी 30 जनवरी 1948 को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। अहिंसा की राह पर चलते हुए भारत को ब्रिटिश गुलामी से मुक्ति दिलाने वाले गांधी जी ने पूरी दुनिया को अपने विचारों से प्रभावित किया था। अपने अनुभवों के आधार पर उन्होंने कई किताबें लिखी, जो हमें आज भी जीवन की नई राह दिखाती हैं क्योंकि उनके ये अनुभव, उनके विचार आज भी उतने ही सार्थक हैं, जितने उस दौर में थे। सही मायनों में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी देश के करोड़ों युवाओं के पथ प्रदर्शक हैं। उनके जीवन के तीन महत्वपूर्ण सूत्र थे, जिनमें पहला था सामाजिक गंदगी दूर करने के लिए झाडू का सहारा। दूसरा, जाति-पाति और धर्म के बंधन से ऊपर उठकर सामूहिक प्रार्थना को बल देना। तीसरा, चरखा, जो आगे चलकर आत्मनिर्भरता और एकता का प्रतीक माना गया।

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महात्मा गांधी के विचारों में ऐसी शक्ति थी कि विरोधी भी उनकी तारीफ किए बगैर नहीं रह सकते थे। ऐसे कई किस्से भी सामने आते हैं, जिससे उनकी ईमानदारी, स्पष्टवादिता, सत्यनिष्ठा और शिष्टता की स्पष्ट झलक मिलती है। एक बार महात्मा गांधी सरोजिनी नायडू के साथ बैडमिंटन खेल रहे थे। सरोजिनी नायडू के दाएं हाथ में चोट लगी थी। यह देखकर गांधी जी ने भी अपने बाएं हाथ में ही रैकेट पकड़ लिया। सरोजिनी नायडू का ध्यान जब इस ओर गया तो वह खिलखिलाकर हंस पड़ी और कहने लगी, ‘आपको तो यह भी नहीं पता कि रैकेट कौनसे हाथ में पकड़ा जाता है?’ इस पर बापू ने जवाब दिया, ‘आपने भी तो अपने दाएं हाथ में चोट लगी होने के कारण बाएं हाथ में रैकेट पकड़ा हुआ है और मैं किसी की भी मजबूरी का फायदा नहीं उठाना चाहता। अगर आप मजबूरी के कारण दाएं हाथ से रैकेट पकड़कर नहीं खेल सकती तो मैं अपने दाएं हाथ का फायदा क्यों उठाऊं?’

जिस समय द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ, उस समय देश के अधिकांश नेता इस बात के पक्षधर थे कि देश को अंग्रेजों से आजाद कराने का अब बिल्कुल सही मौका है और इस स्वर्णिम अवसर का लाभ उठाते हुए उन्हें इस समय देश में बड़े पैमाने पर आन्दोलन छेड़ देना चाहिए। दरअसल उन सभी का मानना था कि अंग्रेज सरकार द्वितीय विश्व युद्ध में व्यस्त रहने के कारण भारतवासियों के इस आन्दोलन का सामना नहीं कर पाएगी और आखिरकार उसे उनके इस राष्ट्रव्यापी आन्दोलन के समक्ष सिर झुकाना ही पड़ेगा और इस प्रकार अंग्रेजों को भारत को स्वतंत्र करने पर बड़ी आसानी से विवश किया जा सकेगा। जब यही बात गांधी जी के सामने उठाई गई तो उन्होंने अंग्रेजों की मजबूरी से फायदा उठाने से इन्कार कर दिया। हालांकि उस दौरान अंग्रेजों के खिलाफ गांधी जी ने आन्दोलन तो जरूर चलाया लेकिन उनका वह आन्दोलन सामूहिक न होकर व्यक्तिगत स्तर पर किया गया आन्दोलन ही था।

- योगेश कुमार गोयल

(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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