Prabhasakshi NewsRoom: Vice-President Election के लिए मंच तैयार, नक्सलवाद विरोधी बनाम नक्सलवाद समर्थक के बीच होगा मुकाबला

By नीरज कुमार दुबे | Aug 23, 2025

भारत की आंतरिक सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक नक्सलवाद है। बीते दो दशकों में इसने न केवल मध्य भारत के आदिवासी बहुल क्षेत्रों को हिंसा की आग में झोंका है, बल्कि कई राज्यों की लोकतांत्रिक संस्थाओं को भी चुनौती दी है। नक्सलवाद के विरुद्ध लड़ाई में नीति-निर्माताओं, न्यायपालिका और संवैधानिक पदाधिकारियों की भूमिका निर्णायक रही है। इसलिए देश के उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए जो उम्मीदवार सामने आये हैं उनसे जुड़ी घटनाओं ने नक्सलवाद मुद्दे पर विमर्श को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। एक ओर एनडीए उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन हैं जिन्होंने नक्सलवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाने वाले महाराष्ट्र सरकार के कानून को राष्ट्रपति के पास भेजकर अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाई, दूसरी ओर न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी हैं जिन पर आरोप है कि उनकी न्यायिक दृष्टि ने नक्सलवाद के विरुद्ध छत्तीसगढ़ सरकार की लड़ाई को कमजोर किया।


हम आपको याद दिला दें कि साल 2011 में उच्चतम न्यायालय के तत्कालीन न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी की पीठ ने सलवा जुडूम पर फैसला सुनाया था। इस फैसले में आदिवासी युवाओं को ‘विशेष पुलिस अधिकारी’ बनाकर हथियार देने और उन्हें माओवादी विरोधी अभियानों में शामिल करने की प्रक्रिया को असंवैधानिक और अवैध घोषित किया गया था। फैसले के पीछे तर्क यह था कि राज्य हिंसा के माध्यम से हिंसा का प्रतिकार नहीं कर सकता और गरीब आदिवासियों को संघर्ष का मोहरा नहीं बनाया जा सकता। यह मानवीय दृष्टिकोण से सही प्रतीत होता है, परंतु व्यावहारिक स्तर पर इसने नक्सलवाद के विरुद्ध चल रहे राज्य के अभियान को कमजोर किया था। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का आरोप है कि यदि सलवा जुडूम को रोका नहीं गया होता तो 2020 तक नक्सलवाद का समूल नाश हो चुका होता। यहां प्रश्न उठता है कि क्या न्यायमूर्ति रेड्डी ने सुरक्षा की ज़रूरतों पर संवैधानिक आदर्शों को प्राथमिकता दी? और क्या उनकी यह दृष्टि ज़मीनी हकीकत से कटकर नक्सलियों को अप्रत्यक्ष लाभ पहुँचा गई? आलोचकों का मानना है कि इस निर्णय ने नक्सलवादियों को पुनर्गठित होने का समय दिया और सुरक्षा बलों के हाथ बाँध दिए।

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इसके विपरीत, महाराष्ट्र के राज्यपाल और अब उपराष्ट्रपति पद के एनडीए उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन का हालिया कदम नक्सलवाद-विरोधी संघर्ष को सशक्त करने की दिशा में देखा जा रहा है। उन्होंने महाराष्ट्र विशेष सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक 2024 को राष्ट्रपति के पास भेज दिया है। यह विधेयक शहरी क्षेत्रों में सक्रिय वामपंथी उग्रवादी संगठनों पर लगाम कसने का प्रयास करता है। हालांकि विपक्ष और नागरिक संगठनों ने इसे असहमति की आवाज़ दबाने का औजार बताया है, लेकिन तथ्य यह है कि शहरी नक्सल नेटवर्क, विचारधारा और लॉजिस्टिक सपोर्ट देकर ज़मीनी हिंसा को खाद-पानी देता है। सीपी राधाकृष्णन ने इस बिल को सीधे हस्ताक्षर कर लागू न कर, राष्ट्रपति के विचारार्थ भेजा। यह संवैधानिक प्रक्रिया का सम्मान भी है और नक्सलवाद के खिलाफ राज्य की गंभीरता का संकेत भी। यह कदम दर्शाता है कि वह राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर संवैधानिक दायरे में रहकर नक्सलवाद विरोधी नीति को मजबूत करना चाहते हैं।


देखा जाये तो भारत में नक्सलवाद के खिलाफ संघर्ष केवल सैन्य या पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं है; यह न्यायपालिका, विधायिका और संवैधानिक पदाधिकारियों की दृष्टि और निर्णयों से भी प्रभावित होता है। जहाँ एक ओर न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी का निर्णय व्यावहारिक स्तर पर नक्सलियों के लिए सहायक सिद्ध हुआ, वहीं सीपी राधाकृष्णन का कदम नक्सलवाद-विरोधी प्रयासों को राजनीतिक और संवैधानिक मजबूती देता है। यह दो उदाहरण हमें यह सिखाते हैं कि नक्सलवाद जैसी राष्ट्रीय चुनौती से निपटने में संवैधानिक आदर्श और सुरक्षा की ज़रूरतों के बीच संतुलन बनाना ही सबसे बड़ी कसौटी है।


बहरहाल, उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए सत्तारुढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की ओर से उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन और विपक्ष के उम्मीदवार बी सुदर्शन रेड्डी के बीच सीधे मुकाबले के लिए मंच तैयार हो चुका है। उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनाव नौ सितंबर को होगा। चुनाव के लिए ‘रिटर्निंग ऑफिसर’ के कार्यालय ने कहा है कि उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए दाखिल नामांकन पत्रों की जांच के बाद दोनों उम्मीदवारों के नामांकन पत्रों के सभी चार सेट सही पाए गए। हम आपको बता दें कि राज्यसभा के महासचिव उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए ‘रिटर्निंग ऑफिसर’ होते हैं। संविधान के अनुच्छेद 66 के अनुसार, उपराष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के सदस्यों से मिलकर बने निर्वाचक मंडल के सदस्यों द्वारा किया जाता है।

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