By सुखी भारती | Oct 23, 2026
पिछले प्रसंग में हमने देखा कि किस प्रकार राजा प्रतापभानु कपटमुनि के छल में फँसकर ब्राह्मणों के शाप का भागी बना। जिस प्रतापभानु ने अपने पराक्रम से पृथ्वी पर विजय प्राप्त की थी, उसी का जीवन एक षड्यंत्र के कारण समाप्त हो गया। ब्राह्मणों के शाप के प्रभाव से अगले जन्म में वही राजा रावण बना। उसके साथ उसका भाई, मंत्री और राज्य के दूसरे लोग भी राक्षस योनि में उत्पन्न हुए। यहीं से श्रीरामचरितमानस में रावण के जन्म और उसके परिवार की कथा आगे बढ़ती है।
काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा।
भयउ निसाचर सहित समाजा॥
दस सिर ताहि बीस भुजदंडा।
रावन नाम बीर बरिबंडा॥
अर्थात् हे मुनि! समय आने पर वही राजा प्रतापभानु अपने परिवार और साथियों सहित राक्षस के रूप में उत्पन्न हुआ। उसके दस सिर और बीस भुजाएँ थीं। उसका नाम रावण पड़ा, जो अत्यंत बलवान और पराक्रमी था।
इस चौपाई में तुलसीदासजी केवल रावण के जन्म का वर्णन नहीं करते, बल्कि उस कथा की परिणति भी दिखाते हैं जिसमें प्रतापभानु के कर्म, शत्रु का छल और ब्राह्मणों का शाप एक साथ जुड़ जाते हैं। मनुष्य का जीवन कब किस दिशा में बदल जाए, यह कोई नहीं जान सकता। इसलिए शक्ति और वैभव के साथ विवेक का होना भी आवश्यक है।
रावण का जन्म महर्षि पुलस्त्य के पवित्र वंश में हुआ था। उसके पिता विश्रवा ऋषि थे और माता कैकसी थीं। इस प्रकार उसका जन्म ऐसे कुल में हुआ जहाँ ज्ञान, तपस्या और आध्यात्मिक साधना का महत्त्व था। किंतु आगे चलकर रावण ने अपने ज्ञान और शक्ति का उपयोग जिस मार्ग पर किया, उसने उसके जीवन को विनाश की ओर पहुँचा दिया।
तुलसीदासजी रावण के साथ उसके भाइयों के जन्म का भी उल्लेख करते हैं। प्रतापभानु का छोटा भाई अरिमर्दन अगले जन्म में कुंभकर्ण बना। उसके मंत्री धर्मरुचि ने विभीषण के रूप में जन्म लिया। राजा के दूसरे पुत्र और सेवक भी राक्षस योनि में उत्पन्न हुए।
इस संबंध में मानस की चौपाई है—
भूप अनुज अरिमर्दन नामा।
भयउ सो कुंभकरन बलधामा॥
सचिव जो रहा धरमरुचि जासू।
भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू॥
अर्थात् राजा का छोटा भाई अरिमर्दन बलशाली कुंभकर्ण हुआ और धर्मरुचि नाम का मंत्री रावण का छोटा भाई विभीषण बना।
यहाँ एक विशेष बात समझने योग्य है। एक ही परिवार में जन्म लेने वाले व्यक्तियों का स्वभाव और जीवन-दृष्टि एक समान होना आवश्यक नहीं है। रावण ने अपनी शक्ति के बल पर संसार को जीतने की इच्छा की, कुंभकर्ण असाधारण बल का स्वामी बना और विभीषण के हृदय में भगवान विष्णु के प्रति भक्ति जाग्रत रही।
गोस्वामीजी विभीषण के विषय में कहते हैं—
नाम बिभीषन जेहि जग जाना।
बिष्नुभगत बिग्यान निधाना॥
अर्थात् संसार में वह विभीषण के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वह भगवान विष्णु का भक्त और ज्ञान-विज्ञान का भंडार था।
यह प्रसंग हमें बताता है कि जन्म और कुल मनुष्य को एक पहचान अवश्य देते हैं, लेकिन उसके विचार, कर्म और भक्ति ही उसके वास्तविक चरित्र को प्रकट करते हैं। जिस परिवार में रावण जैसा अहंकारी राजा उत्पन्न हुआ, उसी परिवार में विभीषण जैसा भक्त भी हुआ, जिसने आगे चलकर धर्म का पक्ष ग्रहण किया।
तुलसीदासजी यह भी स्पष्ट करते हैं कि पुलस्त्य ऋषि के पवित्र वंश में जन्म लेने के बाद भी ब्राह्मणों के शाप के कारण ये सभी पापमय स्वभाव वाले बन गए। इस प्रकार कथा हमें वंश की श्रेष्ठता और व्यक्तिगत आचरण के बीच का अंतर समझाती है।
समय बीतने के साथ रावण, कुंभकर्ण और विभीषण तीनों भाइयों के मन में महान शक्ति प्राप्त करने की इच्छा जागी। उन्होंने निश्चय किया कि वे कठोर तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न करेंगे और उनसे वरदान प्राप्त करेंगे। तीनों भाई तपस्या में लीन हो गए। उनकी तपस्या अत्यंत कठिन थी, जिसकी महिमा का वर्णन करना भी सरल नहीं था।
मानस में कहा गया है—
कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई।
परम उग्र नहिं बरनि सो जाई॥
गयउ निकट तप देखि बिधाता।
मागहु बर प्रसन्न मैं ताता॥
अर्थात् तीनों भाइयों ने अनेक प्रकार की अत्यंत कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या देखकर ब्रह्माजी उनके निकट आए और प्रसन्न होकर बोले—हे पुत्रों! तुम मुझसे अपना इच्छित वरदान माँगो।
अब तीनों भाइयों के सामने अपनी-अपनी इच्छा प्रकट करने का अवसर था। रावण ने अपनी बुद्धि और तपस्या का उपयोग ऐसी शक्ति प्राप्त करने के लिए करना चाहा, जिससे संसार में कोई उसका वध न कर सके। उसके मन में देवताओं, दानवों और दूसरी शक्तिशाली जातियों से अजेय बनने की इच्छा थी।
रावण ने ब्रह्माजी से ऐसा वर माँगा कि देवता, दानव और अनेक शक्तिशाली प्राणी उसका वध न कर सकें। उसने मनुष्य और वानर को तुच्छ समझकर उनसे अपनी मृत्यु की संभावना पर ध्यान नहीं दिया। उसकी दृष्टि में वे इतने दुर्बल थे कि उनसे भय करने की कोई आवश्यकता नहीं थी।
मानस में रावण की प्रार्थना इस प्रकार आती है—
करि बिनती पद गहि दससीसा।
बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा॥
हम काहू के मरहिं न मारें।
बानर मनुज जाति दुइ बारें॥
अर्थात् दस सिर वाले रावण ने ब्रह्माजी के चरण पकड़कर प्रार्थना की कि उसे ऐसा वर मिले जिससे कोई उसका वध न कर सके, केवल वानर और मनुष्य को उसने अपनी मृत्यु के अपवाद के रूप में स्वीकार किया।
रावण की यही भूल आगे चलकर उसके विनाश का कारण बनी। जिस मनुष्य को उसने तुच्छ समझा, उसी मनुष्य रूप में भगवान श्रीराम ने अवतार लेकर उसके अहंकार का अंत किया। रावण अपने वरदान को अपनी अजेयता का प्रमाण समझ बैठा, जबकि विधि का विधान कुछ और ही था।
इसके बाद कुंभकर्ण की बारी आई। उसका शरीर विशाल था और उसकी भूख भी असाधारण थी। यदि उसे अपनी इच्छा के अनुसार वरदान मिल जाता, तो उसके लिए संसार में भारी विनाश उत्पन्न करना संभव था। ब्रह्माजी ने उसकी प्रकृति और संभावित परिणाम को देखते हुए देवी सरस्वती की प्रेरणा से उसकी बुद्धि फेर दी। परिणामस्वरूप कुंभकर्ण ने छह महीने तक सोने का वर माँग लिया।
इस प्रसंग में तुलसीदासजी बताते हैं कि कुंभकर्ण के स्वभाव और उसकी शक्ति के कारण उसके वरदान का परिणाम संसार के लिए भयावह हो सकता था। इसलिए उसकी बुद्धि बदल गई और वह अपनी इच्छा के वास्तविक परिणाम को समझ नहीं पाया।
अब विभीषण की बारी आई। उसके दोनों भाइयों की इच्छाओं से भिन्न, उसके हृदय में भगवान के चरणों के प्रति अनुराग था। उसने सांसारिक शक्ति, राज्य या अजेयता की अपेक्षा भगवान की भक्ति माँगी।
मानस का दोहा है—
गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु।
तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु॥
अर्थात् ब्रह्माजी विभीषण के पास गए और उससे भी वर माँगने को कहा। विभीषण ने भगवान के निर्मल चरणकमलों के प्रति निष्कपट प्रेम और भक्ति माँगी।
यहाँ तीनों भाइयों के जीवन की दिशा स्पष्ट हो जाती है। रावण ने शक्ति माँगी, कुंभकर्ण को निद्रा का वर प्राप्त हुआ और विभीषण ने भक्ति को अपना लक्ष्य बनाया। तीनों एक ही परिवार के सदस्य थे, तीनों ने तपस्या की, किंतु उनकी इच्छाएँ अलग-अलग थीं। यही अंतर आगे चलकर उनके कर्मों और भाग्य में भी दिखाई देता है।
रावण ने वरदान प्राप्त करके अपनी शक्ति का विस्तार किया और धीरे-धीरे उसके भीतर अहंकार बढ़ता गया। वह स्वयं को संसार का सबसे शक्तिशाली शासक समझने लगा। कुंभकर्ण अपनी असाधारण शक्ति और लंबी निद्रा के कारण प्रसिद्ध हुआ। दूसरी ओर विभीषण ने अपने हृदय में धर्म और भक्ति को स्थान दिया।
इस प्रकार रावण के जन्म और उसके भाइयों की तपस्या का प्रसंग केवल एक प्राचीन कथा नहीं, बल्कि जीवन के लिए गहरा संदेश भी है। तपस्या से शक्ति प्राप्त हो सकती है, ज्ञान से सामर्थ्य बढ़ सकता है और वरदान से मनुष्य को असाधारण अवसर मिल सकते हैं; किंतु यदि इन सबके साथ विवेक, मर्यादा और धर्म न हों, तो वही सामर्थ्य विनाश का कारण बन जाता है।
रावण का जीवन इसका उदाहरण है। उसने तपस्या की, वरदान प्राप्त किए और विशाल साम्राज्य स्थापित किया, लेकिन अपने अहंकार पर विजय नहीं पा सका। विभीषण ने इसके विपरीत भक्ति को चुना और कठिन परिस्थितियों में भी धर्म का साथ नहीं छोड़ा।
यहीं से श्रीरामचरितमानस की कथा हमें आगे उस प्रसंग की ओर ले जाती है, जहाँ रावण अपने बल और वरदानों के मद में संसार को चुनौती देने लगता है। देवता और ऋषि उसके अत्याचारों से व्याकुल हो उठते हैं। अंततः वही परिस्थितियाँ भगवान श्रीराम के अवतार की पृष्ठभूमि तैयार करती हैं, ताकि अधर्म का अंत हो और धर्म की पुनः स्थापना हो सके।
जय श्रीराम।
- सुखी भारती