Mohammad Rafi Death Anniversary: फकीर की नकल से 'Shahenshah-e-Tarannum' बनने की अनसुनी कहानी

By अनन्या मिश्रा | Jul 31, 2026

हिंदी सिनेमा को एवरग्रीन गाने देने वाले मोहम्मद रफी का 31 जुलाई को निधन हो गया था। आज भी लोग उनके गानों को सुनना और गुनगुनाना पसंद करते हैं। रफी के नाम करीब 26 हजार गाने गाए जाने का रिकॉर्ड है। उनको 'शहंशाह-ए-तरन्नुम' भी कहा जाता था। रफी ने अपने गांव में फकीर के गानों की नकल करके गाना गाना सीखा था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर मोहम्मद रफी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...

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9 साल के रफी नाई बन चुके थे। साल 1933 में संगीतकार पंडित जीवनलाल नाई की दुकान पहुंचे। यहां पर उन्होंने रफी को गुनगुनाते देखा और रेडियो चैनल के ऑडिशन के लिए बुला लिया। जिसके बाद जीवनलाल ने उनको गायिकी की ट्रेनिंग दी और इस तरह से वह रेडियो में गानों को अपनी आवाज देने लगे।

बत्ती जाने से फेमस हुए रफी

वहीं साल 1937 में जब स्टेज पर बिजली न होने से पॉपुलर सिंगर कुंदनलाल सहगल ने गाने से मना कर दिया। तब 13 साल के रफी ने अपनी आवाज से समां बांध दिया। दर्शकों में बैठे सहगल भी रफी से काफी प्रभावित हुए। फिर प्रोड्यूसर और नजीर ने 100 रुपए और टिकट भेजकर रफी को मुंबई बुला लिया। इसके बाद रफी ने पहली बार 'पहले आप के लिए हिदुंस्तान के हम हैं' का गाना रिकॉर्ड किया। साल बीता और मोहम्मद रफी के गाने देशभर में मशहूर होने लगे। फिल्म बैजू बावरा के फिल्म के गानों के बाद मोहम्मद रफी स्टार बन गए और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

मृत्यु

वहीं 31 जुलाई 1980 को हार्ट अटैक से 55 साल की उम्र में मोहम्मद रफी का निधन हो गया।

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