वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले से उठा सवाल, क्या ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों को ताक पर रख दिया है?

By नीरज कुमार दुबे | Jan 03, 2026

अमेरिका ने वेनेजुएला पर सैन्य आक्रमण कर उसके राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को गिरफ्तार करने का दावा किया है। यह अंतरराष्ट्रीय जगत में एक संवेदनशील और ऐतिहासिक घटनाक्रम है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि अमेरिका ने वेनेजुएला के खिलाफ बड़े पैमाने पर हवाई और सैन्य हमले किये हैं। ट्रंप ने कहा है कि मादुरो और उनकी पत्नी को हिरासत में लिया गया है तथा देश से निकाल दिया गया है और वे अगली कानूनी प्रक्रिया के लिये अमेरिका ले जाये गये हैं। इस कार्रवाई को ट्रंप ने अपनी योजना के मुताबिक सफल बताया है तथा इसे वेनेजुएला में लोकतंत्र की बहाली की दिशा में एक निर्णायक कदम बताया है। हालांकि हमले के विवरण और ठोस प्रमाण अभी तक सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं कराये गये हैं।


वहीं वेनेजुएला सरकार ने इसे अमेरिकी सैन्य आक्रमण तथा आंतरिक संप्रभुता का उल्लंघन बताया है। साथ ही वेनेजुएला में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की गयी है तथा नागरिकों से व्यापक विरोध और प्रतिरोध की अपील की गयी है। इस बीच, विश्व समुदाय के कई देश इस घटना पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं, कुछ ने इसे कूटनीति की आवश्यकता बताया है जबकि रूस, चीन तथा अन्य ने कड़ी निंदा की है।

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देखा जाये तो डोनाल्ड ट्रंप द्वारा वेनेजुएला पर की गयी सैन्य कार्रवाई तथा एक संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्रपति की गिरफ्तारी का दावा विश्व व्यवस्था के लिये एक भयंकर झटका है। यह केवल एक सैन्य और राजनीतिक घटना नहीं है बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय कानून, कूटनीति और विश्वशांति के मूल सिद्धांतों पर सीधा प्रहार है। जब किसी देश का नेता बिना संयुक्त राष्ट्र के अनुरोध, बिना स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय विधिक अधिकरण के निर्देश और बिना अन्तरराष्ट्रीय समुदाय की सहमति के किसी दूसरे देश में सैन्य हस्तक्षेप कर उसके सर्वोच्च नागरिक नेतृत्व को हटा देता है तो यह कृत्य न केवल उन मूलभूत मानकों का उल्लंघन है जिन पर आधुनिक विश्व राजनीति टिकी हुई है बल्कि यह नए वैश्विक संकटों के लिये एक मिसाल भी स्थापित करता है।


पहला सवाल यह है कि क्या ट्रंप का कदम जायज है? क्या ऐसा किसी भी न्यायिक या राजनीतिक मानक पर सही ठहराया जा सकता है? देखा जाये तो संप्रभुता किसी भी वैश्विक समझ का मूल आधार है और किसी भी देश की आंतरिक व्यवस्थाओं के प्रति बाहरी हस्तक्षेप को तभी वैध ठहराया जा सकता है जब वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के भीतर व्यापक बहुमत द्वारा अनुमोदित हो या जब प्रत्यक्ष एवं सुनिश्चित मानवाधिकार संकट हो। नरसंहार या बड़े पैमाने पर युद्ध अपराध की स्थितियों में अंतरराष्ट्रीय समुदाय से ऐसी स्वीकृति मिल सकती है लेकिन वेनेजुएला में ऐसे कोई हालात नहीं थे। वेनेजुएला की परिस्थिति चाहे जितनी भी विवादास्पद और जटिल रही हो, अमेरिका का यह एकतरफा सैन्य निर्णय अंतरराष्ट्रीय क़ानून तथा संयुक्त राष्ट्र चार्टर के मूल सिद्धांतों के सीधे विपरीत है। इसे केवल एक देश के भीतर मानवीय संकट या राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के समाधान के रूप में पेश करना नास्तिकता के समान है। ट्रंप प्रशासन के पास यदि मादुरो के खिलाफ वाकई मजबूत सबूत थे तो उन्हें अंतरराष्ट्रीय न्यायालय या किसी बहुपक्षीय मंच पर प्रस्तुत किया जाना चाहिये था न कि अपने देश की सैन्य ताकत का उपयोग कर सीधे हस्तक्षेप करना चाहिए था।


दूसरा सवाल यह है कि क्या कूटनीति की दुनिया में इस कदम को उचित कहा जा सकता है? देखा जाये तो कूटनीति वैचारिक मतभेदों, राजनीतिक तनावों तथा सत्ता के संघर्षों को बातचीत, समझौते और मध्यस्थता के ज़रिये सुलझाने की कला है। कूटनीति कभी प्रत्यक्ष हिंसात्मक उपायों को प्रोत्साहित नहीं करती। यदि अमेरिका को वास्तव में वेनेजुएला की वर्तमान प्रणाली में विसंगतियाँ और समस्यायें दिखतीं थीं तो उसके लिये संयुक्त राष्ट्र, ओएएस या किसी अन्य बहुपक्षीय संगठन के साथ मिलकर दबाव बनाना अधिक न्यायोचित और प्रभावी विकल्प होता। इसलिए ट्रंप प्रशासन का यह कदम कूटनीति की भावना का उल्लंघन है और यह उन सभी प्रयासों को भी बेअसर करता है जो शांति, संयम और सामूहिक समाधान की ओर इंगित करते हैं। जब राजनयिक रास्ता खुला रहता है तो हवाई हमले, बमबारी और अस्थिरता फैलाने वाले कदम किसी भी सभ्य कूटनीतिक प्रणाली का अंग नहीं बन सकते।


अब तीसरा सवाल यह है कि आगे वेनेजुएला का क्या होगा? देखा जाये तो उस देश का एक अस्थिर भविष्य बेहद संभावित है। हिंसात्मक कार्रवाई के परिणामस्वरूप वेनेजुएला के भीतर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ और भी भयावह हो सकती हैं। यह देश पहले ही आर्थिक मंदी, मुद्रास्फीति तथा सामाजिक असंतोष का शिकार है, ऐसे में एक बाहरी सैन्य हमले से जनता का मनोबल गिर सकता है, नागरिक प्रतिरोध भड़क सकता है तथा आंतरिक संघर्ष और अधिक गहरा हो सकता है। इसके अलावा यह कदम लैटिन अमेरिका में क्षेत्रीय स्थिरता को भी दहला सकता है और पड़ोसी देशों को संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबद्धता पर पुनर्विचार करने को मजबूर कर सकता है।


चौथा सवाल अंतरराष्ट्रीय सामरिक प्रभावों से संबंधित है। देखा जाये तो डोनाल्ड ट्रंप की यह नीति, वैश्विक सामरिक संतुलन पर लंबी अवधि में गंभीर प्रभाव डाल सकती है। ट्रंप द्वारा ईरान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करते हुए धमकी देना और अब वेनेजुएला पर प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप जैसे कदम यह संकेत देते हैं कि अमेरिका एक ऐसा वैश्विक प्रहरी बनने की इच्छा रखता है जो अपने हितों को थोपने के लिये सैन्य बल का उपयोग करता है यह विश्व को दोध्रुवीकृत कर सकता है। निश्चित ही यह सब अमेरिका की विरोधी शक्तियों को एकजुट करने का काम करेगा। रूस, चीन और अन्य राष्ट्र पहले ही अमेरिका के इस कदम की निंदा कर चुके हैं तथा इसे सामरिक आक्रमण बता रहे हैं। देखा जाये तो वैश्विक सुरक्षा तंत्र पहले से ही तनावों और विभाजनों से जूझ रहा है, ऐसे में एक प्रमुख सुपरपावर द्वारा एक संप्रभु राष्ट्र के खिलाफ हमला करना वैश्विक शासन और सहयोग के लिये एक गंभीर प्रश्न छोड़ता है।


देखा जाये तो अंतरराष्ट्रीय न्याय और मानवाधिकार का सम्मान केवल शब्दों में नहीं होना चाहिए बल्कि उसे कार्यनीतिक फैसलों और कार्रवाईयों में भी प्राथमिकता दी जानी चाहिये। एक अनियंत्रित और एकतरफा सैन्य कार्रवाई का समर्थन करना दीर्घकालीन वैश्विक स्थिरता, शांति तथा न्याय की भावना के खिलाफ होगा। ट्रंप के इस निर्णय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मनमाने ढंग से सेना, हथियार तथा सैन्य बल की धमकी का प्रयोग अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और सहयोग को कमजोर करता है तथा विश्व समुदाय के विश्वास को तोड़ता है। इसलिए वर्तमान परिस्थिति में वैश्विक समुदाय को संयम, संवाद और न्यायिक प्रक्रिया की ओर लौटना चाहिए तभी हम एक बेहतर, अधिक सुरक्षित और अधिक न्यायसंगत विश्व की कल्पना कर सकते हैं।


-नीरज कुमार दुबे

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