भगवान श्रीविष्णु की शक्ति से ही संचालित है संपूर्ण विश्व

By शुभा दुबे | Mar 08, 2025

यह संपूर्ण विश्व भगवान श्रीविष्णु की शक्ति से ही संचालित है। वे निर्गुण भी हैं और सगुण भी। वे अपने चार हाथों में क्रमशः शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करते हैं। जो भी किरीट और कुण्डलों से विभूषित, पीताम्बरधारी, वनमाला तथा कौस्तुभमणि को धारण करने वाले, सुंदर कमलों के समान नेत्र वाले भगवान श्रीविष्णु का ध्यान करता है वह भव बन्धन से मुक्त हो जाता है।

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पद्मपुराण में वर्णन मिलता है कि भगवान श्रीविष्णु ही परमार्थ तत्व हैं। वे ही ब्रह्मा और शिव सहित सृष्टि के आदि कारण हैं। वे ही नारायण, वासुदेव, परमात्मा, अच्युत, कृष्ण, शाश्वत, शिव, ईश्वर तथा हिरण्यगर्भ आदि अनेक नामों से पुकारे जाते हैं। नर अर्थात् जीवों के समुदाय को नार कहते हैं। संपूर्ण जीवों के आश्रय होने के कारण भगवान श्रीविष्णु ही नारायण कहे जाते हैं। कल्प के प्रारम्भ में एकमात्र सर्वव्यापी भगवान नारायण ही थे। वे ही संपूर्ण जगत की सृष्टि करके सबका पालन करते हैं और अंत में सबका संहार करते हैं। इसीलिए भगवान श्रीविष्णु का नाम हरि है। मत्स्य, कूर्म, वाराह, वामन, हयग्रीव तथा श्रीराम−कृष्णादि भगवान श्रीविष्णु के ही अवतार हैं।

भगवान श्रीविष्णु अत्यंत दयालु हैं। वे अकारण ही जीवों पर करुणा वृष्टि करते हैं। उनकी शरण में जाने पर परम कल्याण हो जाता है। जो भक्त भगवान श्रीविष्णु के नामों का कीर्तन, स्मरण, उनका दर्शन, वंदन, गुणों का श्रवण और उनका पूजन करता है, उसके सभी पाप विनष्ट हो जाते हैं। यद्यपि भगवान श्रीविष्णु के अनन्त गुण हैं, तथापि उनमें भक्तवत्सलता का गुण सर्वोपरि है। चारों प्रकार के भक्त जिस भावना से उनकी उपासना करते हैं, वे उनकी उस भावना को परिपूर्ण करते हैं। ध्रुव, प्रहलाद, अजामिल, द्रौपदी, गणिका आदि अनेक भक्तों का उनकी कृपा से उद्धार हुआ। भक्त वत्सल भगवान को भक्तों का कल्याण करने में यदि विलम्ब हो जाये तो भगवान उसे अपनी भूल मानते हैं और उसके लिए क्षमा याचना करते हैं।

जो मनुष्य भगवान विष्णु के निम्नांकित पचपन नामों का जप करता है, वह मंत्रजप आदि के फल का भागी होता है तथा तीर्थों में पूजन आदि के अक्षय पुण्य को प्राप्त करता है। पुष्कर में पुण्डरीकाक्ष, गया में गदाधर, चित्रकूट में राघव, प्रभास में दैत्यसूदन, जयन्ती में जय, हस्तिनापुर में जयन्त, वर्धमान में वाराह, काश्मीर में चक्रपाणि, कुब्जाभ में जनार्दन, मथुरा में केशवदेव, कुब्जाम्रक में हृषीकेश, गंगाद्वार में जटाधर, शालग्राम में महायोग, गोवर्धनगिरि पर हरि, पिण्डारक में चतुर्बाहु, शंखोद्धार में शंखी, कुरुक्षेत्र में वामन, यमुना में त्रिविक्रम, शोणतीर्थ में विश्वेश्वर, पूर्वसागर में कपिल, महासागर में विष्णु, गंगासागर संगम में वनमाल, किष्किन्धा में रैवतकदेव, काशीतट में महायोग, विरजा में रिपुंजय, विशाखयूप में अजित, नेपाल में लोकभावन, द्वारका में कृष्ण, मन्दराचल में मधुसूदन, लोकाकुल में रिपुहर, शालग्राम में हरि का स्मरण करें।

पुरुषवट में पुरुष, विमलतीर्थ में जगत्प्रभु, सैन्धवारण्य में अनन्त, दण्डकारण्य में शांर्गधारी, उत्पलवर्तक में शौरि, नर्मदा में श्रीपति, रैवतकगिरि पर दामोद, नन्दा में जलशायी, सिन्धुसागर में गोपीश्वर, माहेन्द्रतीर्थ में अच्युत, सह्याद्रि पर देव देवेश्वर, मागधवन में बैकुण्ठ, विन्ध्यगिरि पर सर्वपापहारी और हृदय में आत्मा विराजमान हैं। ये अपने नाम का जप करने वाले साधकों को भोग तथा मोक्ष देने वाले हैं।

प्रत्येक वटवृक्ष पर कुबेर का, प्रत्येक चौराहे पर शिव का, प्रत्येक पर्वत पर राम का तथा सर्वत्र मधुसूदन का स्मरण करें। धरती और आकाश में नरका, वसिष्ठती में गरुडध्वज का तथा सर्वत्र भगवान वासुदेव का स्मरण करने वाला पुरुष भोग एवं मोक्ष का भागी होता है। भगवान विष्णु के इन नामों का जप करके मनुष्य सब कुछ पा सकता है। उपर्युक्त क्षेत्र में जो जप, श्राद्ध, दान और तर्पण किया जाता है, वह सब कोटिगुना हो जाता है। जिसकी वहां मृत्यु होती है, वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है।

-शुभा दुबे

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