भारत के सशक्त स्वास्थ्य मोर्चें का दुनिया ने लोहा माना

By ललित गर्ग | Mar 29, 2025

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘स्वस्थ भारत मिशन’ के तहत देश भर में चलाई जा रही विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं से देश में व्यापक पैमाने पर बदलाव ही नहीं, बल्कि आमूल-चूल परिवर्तन आया है। यह बात हम नहीं कह रहे, बल्कि पूरी दुनिया इस योजना का लोहा मान रही है। संयुक्त राष्ट्र ने भारत में विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं के तहत शिशु मृत्यु दर में कमी लाने की तारीफ की है। इतना ही नहीं यूएन ने प्रधानमंत्री मोदी की आयुष्मान भारत योजना को भी शानदार, अनूठी एवं प्रेरक बताया है। एक कार्यक्रम के दौरान विश्व निकाय ने ‘आयुष्मान भारत’ जैसी स्वास्थ्य पहलों का उदाहरण देते हुए शिशु मृत्यु दर में कमी लाने में भारत के प्रयासों और प्रगति की सराहना की तथा इसे ‘अनुकरणीय’ बताया। मोदी सरकार के ऐसे कामों एवं उपलब्धियों की आलोचना करने वालों को प्रशंसा भी करनी चाहिए, क्योंकि अच्छे काम के लिए प्रशंसा सरकारों को मूल्यवान महसूस कराती हैं और उन्हें अपने काम के प्रति अधिक वफ़ादार एवं जिम्मेदार बनाती हैं। अनेक शोध के अनुसार, जो देश एवं प्रांत अपनी सरकारों की उल्लेखनीय उपलब्धियों को मान्यता देते हैं, उनकी उत्पादकता और प्रदर्शन में अधिक वृद्धि देखी जाती है और दुनिया इसकी प्रशंसा करती है। प्रशंसा और आभार व्यक्त करने से समुदाय की भावना, जिम्मेदारी और राष्ट्र के लिये कुछ अधिक सशक्त करने का एक कारण मिलता है। ऐसे कारणों से नया भारत, विकसित भारत एवं सशक्त भारत का निर्माण होता है।

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इसका उल्लेख भी संयुक्त राष्ट्र एजेंसी ने विशेष रूप से किया है। यह स्वास्थ्य संबंधी विश्व की सबसे बड़ी योजना है। यह निर्धन परिवारों के लिए वरदान सिद्ध हुई है। आश्चर्य नहीं कि संयुक्त राष्ट्र एजेंसी ने कहा कि भारत ने रणनीतिक निवेश के माध्यम लाखों लोगों के जीवन को बचाने का काम किया है। आयुष्मान भारत योजना की उपयोगिता को देखकर ही हाल में 70 वर्ष की आयु के सभी बुजुर्गों को इस योजना के दायरे में लाया गया है। इसने दिखाया है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, साक्ष्य-आधारित रणनीतियों और निरंतर निवेश से शिशु मृत्यु दर में ही नहीं, बल्कि अन्य स्वास्थ्य चुनौतियों में पर्याप्त कमी लाई जा सकती है।

संयुक्त राष्ट्र अंतर-एजेंसी समूह की बाल मृत्युदर आकलन रिपोर्ट में भारत, नेपाल, सेनेगल, घाना व बुरुंडी का उदाहरण दिया गया। वर्ष 2000 से भारत ने पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्युदर में 70 व नवजात शिशुओं की मृत्युदर में 61 प्रतिशत की कमी हासिल की है। स्वास्थ्य कवरेज बढ़ाने, सशक्त स्वास्थ्य नीतियों एवं योजनाओं से मौजूदा स्थिति को सुधारने के लिए किए गए उपायों के कारण ऐसा संभव हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हर गर्भवती महिला मुफ्त प्रसव की हकदार है और शिशु देखभाल संस्थानों में मुफ्त परिवहन, दवाएं, निदान और आहार इसमें सहायता प्रदान करती है। भारत ने प्रसूति प्रतीक्षा गृहों, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य विंग, बीमार नवजात की देखभाल, मातृ देखभाल और जन्म दोष जांच के लिए बुनियादी ढांचे को मजबूत किया है। भारत ने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए दाइयों व कुशल प्रसव सहायकों के प्रशिक्षण और तैनाती को भी प्राथमिकता दी है। दुनिया भर में लगभग एक अरब बच्चे पहले से ही उच्च जोखिम वाले जलवायु खतरों का सामना कर रहे हैं और बच्चों के जलवायु जोखिम सूचकांक में भारत 26वें स्थान पर है। रिपोर्ट में पूर्वानुमान व्यक्त किया गया है कि जलवायु संकट बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा पर तथा पानी जैसे आवश्यक संसाधनों तक उनकी पहुंच पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। लेकिन भारत इन स्थितियों में स्वास्थ्य चुनौतियों को कम करने के लिये सशक्त योजनाओं एवं सोच के साथ तत्पर है।

मोदी सरकार की प्रभावी स्वास्थ्य योजनाओं के बावजूद अब भी स्वास्थ्य के मोर्चें पर बहुत कुछ किया जाना बाकी है। बड़ी हकीकत यह भी है कि एक बड़ी संख्या में लोग सरकारी अस्पतालों में मजबूरी में ही उपचार कराना पसंद करते हैं। छोटे शहरों और गांवों में न केवल डॉक्टरों, स्वास्थ्य कर्मियों की कमी है, बल्कि अस्पतालों और मेडिकल उपकरणों की भी। इसके चलते इन क्षेत्रों के लोग शहरों के बड़े अस्पतालों की ओर दौड़ लगाते हैं, जहां निजी क्षेत्र के अस्पतालों के मुकाबले सरकारी अस्पताल बहुत पीछे नजर आते हैं। यह सही है कि बीते कुछ वर्षों में अनेक नए मेडिकल कॉलेज खुले हैं, लेकिन सरकार के सामने बड़ी समस्या है कि इन मेडिकल कॉलेजों से निकले डॉक्टर ग्रामीण इलाकों में सेवाएं देने के लिए तैयार नहीं होते। सरकारी अस्पतालों को सशक्त एवं सर्वसुविधायुक्त किया गया है लेकिन समय के साथ उपचार महंगा होता जा रहा है। यदि किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति को निजी अस्पताल में उपचार कराना पड़ता है तो वह कर्जे में डूब जाता है। इसका एक कारण यह भी है कि अपने यहां स्वास्थ्य बीमा का उतना चलन नहीं, जितना आवश्यक है। सरकारें इससे अनभिज्ञ नहीं हो सकतीं कि अधिक आयु के लोगों के लिए स्वास्थ्य बीमा महंगा होता जाता है और इसके बाद भी उसमें अच्छा-खासा जीएसटी लगता है। सरकार को अधिक प्रभावी स्वास्थ्य परिणामों के लिये स्वास्थ्य सेवाओं एवं दवाओं को जीएसटी से मुक्त करना चाहिए। 

बच्चों की बढ़ती आबादी के साथ नित नई चुनौतियाँ भी बढ़ेंगी। इसलिए इन चुनौतियों से निपटने के लिए बच्चों और युवाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और कौशल विकास में अधिक निवेश करना बहुत जरूरी है। जलवायु परिवर्तन से जुड़े खतरों से बहुत अधिक गर्मी, बाढ़, जंगल में आग और चक्रवात जैसी घटनाओं में आठ गुना वृद्धि होने का अनुमान है और इनका सीधा असर बच्चों पर पड़ेगा। निश्चित ही मोदी सरकार इन चुनौतियों से लड़ने में सक्षम है। एक अच्छा लीडर किसी चीज का ब्लेम थोड़ा ज्यादा लेता है और क्रेडिट लेने के मामले में पीछे रहता है। दरअसल, दीर्घकालिक दृष्टिकोण के बिना कोई भी कार्रवाई स्थायी परिवर्तन लाने में विफल ही रहेगी। इतिहास अक्सर किसी आदमी से ऐसा काम करवा देता है, जिसकी उम्मीद नहीं होती। और जब राष्ट्र की आवश्यकता का प्रतीक कोई आदमी बनता है तब भले ही उसकी प्रशंसा क्यों न हो, उसका कद स्वतः बढ़ जाता है। मोदी ने इस युग को वह दिया जिसकी उसे जरूरत है, वह नहीं जिसकी कि वह प्रशंसा करे। 

जीवन को परिभाषित करने तक ही प्रधानमंत्री मोदी उपदेश नहीं देते, अपितु उन्होंने भारत के जीवन को बदलने एवं जीवनस्तर को ऊंचा उठाने के कार्यक्रम दिये हैं जिनमें बूढ़े, बच्चे, महिलाएं, युवा सब होते हैं, वे उनसे सीधा सम्पर्क करते हैं एवं उन्हें दिशाबोध देते हैं। अब संयुक्त राष्ट्र ने मोदी के कार्यों एवं योजनाओं को अनुकरणीय एवं अनूठा माना है तो इससे देश का सीना तना है, गर्व से ऊंचा हुआ है। आपने ”साल“ का वृक्ष देखा होगा- काफी ऊंचा! “शील” का वृक्ष भी देखें- जो जितना ऊंचा है उससे ज्यादा गहरा है। आखिर इस गहराई को मापने वाले संयुक्त राष्ट्र का आभार। जो भी कोई मूल्य स्थापित करता है, जो भी कोई पात्रता पैदा करता है, जो भी कोई सृजन करता है, जो देश का गौरव बढ़ाता है, जो देश की ज्वलंत समस्याओं एवं त्रासदियों से मुक्ति दिलाता है, जो गीतों मंे गाया जाता है, उसे सलाम। मोदी के मजबूत इरादों एवं मनोबल को सलाम।

- ललित गर्ग

लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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