दुनिया को समझना होगा, भारत का 'न्यू नॉर्मल'

By डॉ. आशीष वशिष्ठ | May 15, 2025

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुद्ध पूर्णिमा दिन राष्ट्र के नाम अपने 22 मिनट के संबोधन में पाकिस्तान को स्पष्टत: चेता दिया कि अगर हमारे भारत की ओर आँख उठाकर भी देखा तो वो हश्र होगा क‍ि दुनिया याद करेगी। राष्ट्र के नाम संदेश के अगले दिन पीएम ने आदमपुर एयरबेस पहुंचकर जवानों का उत्साह और मनोबल बढ़ाया। आदमपुर में प्रधानमंत्री के साथ समवेत स्वर में जब जवानों ने भारत माता की जय का उद्घोष किया तो उस निनाद की गूंज और प्रतिध्वनि पाकिस्तान ही नहीं अखिल विश्व ने स्पष्ट तौर पर सुनी।

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भारत ने लड़ाई के मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि सिंधु जल संधि को स्थगित करने जैसा ऐतिहासिक और साहसी कदम भी उठाया। 1965, 1971 और 1999 कारगिल युद्ध और तमाम छोटी—बड़ी आतंकी घटनाओं में पाकिस्तान की स्पष्ट भूमिका के उपरांत सिंधु जल संधि स्थगित करने का साहस भारत दिखा नहीं पाया। बालाकोट और उसी स्ट्राइक, जम्मू कश्मीर में धारा 370 को खत्म करने जैसे बड़े कदम उठाने के बाद भी पाकिस्तान भारत को हल्के में लेता रहा। वास्तव में त्रुटि पाकिस्तान की नहीं, हमारी ही रही। हमारे देश के भीतर एक ऐसी मंडली हैं, जिनके हृदय में भारत से अधिक पाकिस्तान के लिये प्रेम, पक्षपात और दया भावना उछाल मारती है। यही मंडली हर आतंकी घटना के बाद भारत पाकिस्तान के विरुद्ध कड़े कदम उठाने का प्रपंच और स्वांग रचती है। प्रोपेगेंडा करने और नैरेटिव गढ़ने में इस मंडली को महारत प्राप्त है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी ये मंडली सक्रिय हो गई थी। वो अलग बात है कि इस बार यह अपना एजेंडा चलाने में सफल नहीं हुई। वहीं पाकिस्तान को सख्त सबक सिखाने की बजाय जुबानी जमा खर्च ज्यादा करने की जो परंपरा नेहरू—इंदिरा के शासन में फली फूली, 2014 में मोदी सरकार के गठन से पूर्व तक भारत उसी नीति का सिर झुकाकर अनुसरण करता रहा।

पहलगाम आतंकी हमले के बाद भी पाकिस्तान को प्रत्युत्तर में एयर स्ट्राइक से अधिक की उम्मीद नहीं थी। उसे लग रहा था भारत की सत्ता संभालने वालों में बड़े, प्रभावशाली और कठोर निर्णय लेने का राजनीतिक साहस नहीं है। लेकिन पाकिस्तान पता नहीं यह कैसे भूल गया कि पीएम मोदी खतरे उठाने और साहसी निर्णय लेने के लिए जाने जाते हैं। उनकी प्रसिद्धि, साख और लोकप्रियता की यूएसपी जोखिम उठाना ही तो है। पीएम मोदी की दृढ राजनीतिक इच्छा शक्ति का समर्थन पाकर हमारे वीर जवानों ने ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से भारत ने पाकिस्तान को उदाहरण के साथ अच्छे से समझा दिया है कि अब खेल बदल चुका है। खेल के खिलाड़ी बदल चुके हैं। भारत की सत्ता जिनके हाथों में हैं, उनका नारा नेशन फर्स्ट का है।

ऑपरेशन सिंदूर के रूप में भारत ने न केवल आतंक के पोषक और जनक पाकिस्तान को करारा उत्तर दिया, बल्कि एक नया सैन्य और रणनीतिक सिद्धांत स्थापित कर दिया। 7 से 10 मई के बीच चार दिनों तक चले इस सीमित, लेकिन तीव्र सैन्य अभियान ने न केवल पाकिस्तान को सैन्य रूप से झकझोर कर रख दिया, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की साख, क्षमता और इच्छाशक्ति का ऐसा प्रदर्शन किया जो दशकों में पहली बार देखा गया। ऑपरेशन सिंदूर से भारत ने यह स्पष्ट कर दिया कि आतंक के विरूद्ध अब वह चुप नहीं बैठेगा, घर के भीतर घुसकर मारेगा।

पहलगाम घटना के बाद भारत ने बातें नहीं की, डोजियर सौंपने की तैयार नहीं की, सीधे घर में घुसकर मारा, सीधे एक्शन लिया। पाकिस्तान के अंदर घुसकर 15 से अधिक आतंकियों और सेना से जुड़े ठिकानों को नष्ट भ्रष्ट कर दिया। भारत ने केवल आतंकी ठिकानों पर नहीं, उनके ड्रोन कंट्रोल सेंटर और एयरबेस तक को निशाना बनाया। ये दिखाने के लिए कि अगर आवश्यकता पड़ी, तो भारत सीधे उनके सीने तक पहुंच सकता है। ऑपरेशन सिंदूर का उद्देश्य बहुत स्पष्ट था- आतंक का ढांचा तोड़ना, अपनी सैन्य ताकत दिखाना, शत्रु को पुन: सोचने के लिए विवश करना और विश्व को यह बताना कि यह परिवर्तित भारत है। और यह परिवर्तित भारत अब नई सुरक्षा नीति पर चल रहा है।

यह बदला हुआ भारत है, भारत के इस बदले हुए मिजाज और कड़े निर्णय लेने के साहस को पाकिस्तान समझने से चूक गया। जिसका परिणाम अखिल विश्व के समक्ष है। भारत ने घर में घुसकर जब चाहा, जहां चाहा, वहां हमला किया। आतंकी खत्म किये, आतंक के ठिकाने ध्वस्त किये और पाकिस्तान के सैन्य हमलों को अपाहिज और पंगु बना डाला। भारतीय सेना और हमारे डिफेंस सिस्टम की श्रेष्ठता और सटीकता ने पाकिस्तान ही नहीं उसके सहयोगियों और हितैषी अमेरिका, चीन और तुर्की के जेट फाइटर, ड्रोन्स, एयर डिफेंस सिस्टम और आयुध की निम्न गुणवत्ता को अनावृत कर डाला।

पाकिस्तान में फलने फूलने वाले आतंकियों को कड़ी सीख देने के लिए अच्छी तरह चिंतन—मंथन के बाद ऑपरेशन सिंदूर संचालित हुआ। इसे स्वैच्छिक युद्ध में परिवर्तित नहीं होने दिया गया, लेकिन आतंक को कठोर उत्तर भी दे दिया गया। भारत ने ये दिखा दिया कि अब युद्ध का अर्थ केवल बम-विस्फोट और सीमा लांघना नहीं होता। अब लड़ाई सोच-समझकर, सीमित परिधि में और स्पष्ट उद्देश्य के साथ लड़ी जाती है।

ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम ने विश्व समुदाय को स्पष्ट तौर पर बता दिया है कि अब हम किसी और के आश्रित नहीं है। ना अमेरिका की ओर देखा, ना रूस से पूछा और ना ही संयुक्त राष्ट्र से कोई सहायता मांगी। जो करना था, स्वयं उसकी कार्य योजना बनाई, और स्वयं ही उसे धरती पर उतारा। ये वही भारत है जो कभी हमलों के बाद बयान देता था और अंतरराष्ट्रीय सहायता की प्रतीक्षा करता था। लेकिन इस बार भारत ने ये दिखा दिया कि अब हम अपने निर्णय स्वयं लेते हैं और अपनी लड़ाई स्वयं अपने सामर्थ्य से लड़ते हैं। यह भारत की रणनीतिक आत्मनिर्भरता का स्पष्ट संकेत है, यानी अब हम दूसरों की सहमति या सहायता पर नहीं, अपनी सोच, शक्ति, सामर्थ्य और साधनों पर विश्वास करते हैं।

ऑपरेशन सिंदूर का उद्देश्य ना राष्ट्र पर आधिपत्य की कामना थी, ना किसी सरकार गिराने या परिवर्तन की। एकमात्र बात विश्व को बतानी थी कि यदि भारत पर आक्रमण हुआ, तो उत्तर अवश्य मिलेगा और ऐसा मिलेगा कि पुन: सोचने पर विवश कर देगा। अब भारत की लड़ाई का ढंग परिवर्तित हो गया है। यह केवल अस्त्र—शस्त्र नहीं दिखाता, यह बताता है कि कब, कहां और कैसे उनका प्रयोग करना है। यह एक नया भारत है- जो केवल निनाद नहीं उठाता, अब प्रभाव और धमक भी दिखाता है। अब भारत प्रतिक्रिया में नहीं चलता, कर्मण्यता पर विश्वास करता है और नई दिशा तय करता है। यह परिवर्तन केवल एक रणनीति नहीं है, ये मानसिकता का परिवर्तन है। इसलिए पीएम मोदी ने आदमपुर एयर बेस में कहा कि, 'ऑपरेशन सिंदूर' भारत का 'न्यू नॉर्मल' है। यही मानसिक परिवर्तन भारत का 'न्यू नॉर्मल' है। और इस 'न्यू नॉर्मल' को अखिल विश्व जितनी जल्दी समझेगा, वो उसके और शेष दुनिया के लिए हितकारी, सुखप्रद और शांतिप्रद होगा।

- डॉ. आशीष वशिष्ठ

(राजनीतिक विश्लेषक और स्तंभकार)

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