आत्महत्या करने वाले सभी छात्रों की सोचें

By अशोक मधुप | May 27, 2025

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने कोटा में हुई छात्रों की मौत पर सुनवाई की। इन पर चिंता जाहिर की। स्टूडेंट्स सुसाइड के मामलों को भी गंभीर बताया और राजस्थान सरकार को फटकार लगाई, जबकि अकेले कोटा ही नहीं देशभर के छात्रों की मौत पर कार्रवाई होनी चाहिए। इन मौत की जांच होनी चाहिए। देशभर के छात्रों की आत्महत्या और इनको रोकने पर विचार होना चाहिए।

चार मई को एनइइटी एग्जाम से कुछ ही घंटे पहले कोटा के हॉस्टल में 17 साल की छात्रा का शव मिला था। चार मई को ही, आईआईटी खड़गपुर में पढ़ने वाले 22 साल के स्टूडेंट ने हॉस्टल के कमरे में फांसी लगा ली थी। इन्हीं दोनों मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने छह मई को स्वतः संज्ञान लिया था।

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आईआईटी खड़गपुर सुसाइड को लेकर कोर्ट ने 14 मई को कहा था वो सिर्फ यह पता लगाने के लिए संज्ञान ले रहे हैं कि प्रशासन ने 'अमित कुमार एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य' मामले में जारी कोर्ट के निर्देशों का पालन कर एफआईआर दर्ज कराई है या नहीं। वहीं, कोटा में हुए सुसाइड को लेकर कोर्ट ने जवाब मांगा था कि एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की गई। जस्टिस जेबी पारदीवाला और आर महादेवन की बेंच ने ये सुनवाई की थी। इसी के साथ कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश भी दिया था कि मेंटल हेल्थ और सुसाइड प्रिवेंशन के लिए बनने वाली नेशनल टास्क फोर्स यानी एनटीएफ के गठन के लिए 20 लाख रुपए दो दिन में जमा कराएं।

बात पिछले सालों की करें, तो साल 2024 में कोटा में रहने वाले 17 स्टूडेंट्स ने सुसाइड किया था। पिछले साल जनवरी के महीने में 2 और फरवरी के महीने में 3 सुसाइड हुए थे। वहीं साल 2023 में कोटा में स्टूडेंट सुसाइड के कुल 26 मामले सामने आए थे।

एमपी सुसाइड प्रिवेंशन टास्क फोर्स के मेंबर और साइकेट्रिस्ट डॉ सत्यकांत त्रिवेदी ने कोटा में हो रहे स्टूडेंट सुसाइड को लेकर कहा, ‘किसी भी आत्महत्या का कोई एक कारण नहीं होता। वही एग्जाम सभी बच्चे दे रहे होते हैं। ऐसे में सुसाइड के लिए मिले-जुले फैक्टर्स जिम्मेदार होते हैं। इसमें जेनेटिक्स कारण, सामाजिक कारण, पियर प्रेशर, माता-पिता के एक्सपेक्टेशन्स, शिक्षा तंत्र सब शामिल है।

डॉ त्रिवेदी कहते हैं कि कहीं न कहीं हम बच्चों को ये सिखाने में नाकामयाब हो जाते हैं कि स्ट्रेस, रिजेक्शन या फेलियर से कैसे डील करना है। आज बच्चा ये मानने लगा है कि उसका एकेडमिक अचीवमेंट उसके एग्जिस्टेंस से भी बड़ा है। बच्चा तैयारी छोड़ने के लिए तैयार नहीं है, जीवन छोड़ने के लिए तैयार है। सोसायटी ने प्रतियोगी परीक्षाओं को बहुत ज्यादा महिमामंडित कर दिया है जिसकी वजह से बच्चा ये महसूस करता है कि मैं पूर्ण तभी हो सकूंगा जब कोई एग्जाम क्रैक कर लूंगा।

देश में आत्महत्या के हर साल आने वाले मामलों में छात्रों की संख्या सबसे ज्यादा होती है। आंकड़ों की बात करें तो साल 2021 में 13,089 छात्रों ने आत्महत्या की थी, जबकि, साल 2022 में 13,044 छात्रों ने आत्महत्या की। वहीं 2018 से 2020 के दौरान कुल 33,020 छात्रों ने आत्महत्या कर ली। भारत युवाओं का देश है। यहां की 60 फीसदी से ज्यादा आबादी युवा है, लेकिन, अब इसी देश में हर 40 मिनट में एक युवा अपनी जान दे रहा है। ये आंकड़े स्टूडेंट सुसाइड- एन एपिडेमिक स्वीपिंग इंडिया रिपोर्ट की ओर से जारी किए गए हैं। दरअसल, देश में हर दिन 35 से ज्यादा छात्र आत्महत्या कर रहे हैं। साल 2018 से 2022 तक देश में 59,153 छात्रों ने आत्महत्या कर ली।

स्टूडेंट सुसाइड- एन एपिडेमिक स्वीपिंग इंडिया रिपोर्ट, आईसी थ्री की साला कॉन्फ्रेंस में साझा की गई। इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है। आईसी− 3 एक नॉन-प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन है जो पूरी दुनिया में शिक्षा के क्षेत्र में काम करती है।

इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में जहां आत्महत्या की दर हर साल दो फीसदी की दर से बढ़ रही है, वहीं छात्रों में आत्महत्या की दर चार फीसदी की दर से हर साल बढ़ रही है। यानी देश में आत्महत्या के जितने मामले हर साल आते हैं, उनमें छात्रों की संख्या सबसे ज्यादा होती है। आंकड़ों की बात करें तो साल 2021 में 13,089 छात्रों ने आत्महत्या कर ली थी, जबकि, साल 2022 में 13,044 छात्रों ने आत्महत्या की। वहीं 2018 से 2020 के दौरान कुल 33,020 छात्रों ने आत्महत्या की।

छात्रों की आत्महत्या के अलग-अलग मामलों में अलग-अलग वजहें हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में सिर्फ एक वजह है। ये वजह है मेंटल हेल्थ। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में 15 से 24 साल का हर सात में से एक आदमी खराब मेंटल हेल्थ की समस्या से जूझ रहा है।

सबसे बड़ी बात तो ये है कि लोग अपनी मेंटल हेल्थ की समस्या को गंभीरता से नहीं लेते, यूनिसेफ के इस सर्वे में ही जितने लोगों ने भाग लिया, उसमें से सिर्फ 41 फीसदी लोग ही अपनी मानसिक समस्या के समाधान के लिए काउंसलर के पास गए। यानी 59 फीसदी लोगों ने इस समस्या को जैसे का तैसा छोड़ दिया।

देश को चाहिए कि वरिष्ठ मनोवैज्ञानिकों की कोई प्रदेश स्तर पर ऐसी कोई संस्था बनाए तो तकनीकि शिक्षा के लिए कोचिंग करने वालों और तकनीकि शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्र−छात्राओं के मानसिक स्तर की समय-समय पर जांच करे। उनकी कोंसलिंग करे। उनकी समस्याओं पर विचार कर छात्र−छात्राओं का सही मार्ग दर्शन करे, ताकि वह आत्महत्या न कर, विपरीत परिस्थिति से संघर्ष करना सीखें। उन्हें जीवन जीने की कला सिखाई जाए। अगर विशेषज्ञ समझें तो कोचिंग करने वाले और तकनीकि शिक्षा प्राप्त करने वाले युवाओं को मेडिटेशन या ध्यान से भी जोड़ा जा सकता है। इससे युवाओं में विषय के प्रति एकाग्रता बढ़ेगी। चिंतन शक्ति का विकास होगा। निगेटिव विचार कम होंगे। ये मेडिटेशन या ध्यान उन्हें पूरे जीवन के लिए नई ऊर्जा प्रदान करेगा।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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