मीडिया के विद्यार्थियों के लिए मार्गदर्शक का काम करेगी यह पुस्तक (पुस्तक समीक्षा)

By सुविज्ञ वत्स | Jan 15, 2022

देश में प्रिंट मीडिया का महत्व पुरातन काल से है। लिखे हुए शब्दों और विचारों को आम पाठक काफी अहमियत देते हैं। आज 21वीं सदी में भले ही पत्रकारिता के क्षेत्र में बड़ा बदलाव दिख रहा हो और डिजिटल मीडिया पर समाचारों का बेहतर प्रस्तुतीकरण हो रहा हो, इसके बावजूद दैनिक समाचार पत्रों का अस्तित्व बना हुआ है। छपे हुए शब्दों पर आमजन का भरोसा कहीं अधिक होता है। इसकी प्रामाणिकता को कोई नकार नहीं सकता। यह बात शिद्दत से कही जाती है कि दैनिक समाचार पत्रों की भाषा शैली बहुत सरल और बोधगम्य होनी चाहिए ताकि कम पढ़ा लिखा व्यक्ति भी खबरों को पढ़ कर फौरन समझ सके। लचर भाषा में लिखी गई खबर पाठक के मन में खीझ भी पैदा करती है। भाषा मजबूत होगी तो समाचार पढ़ने का आनंद दोगुना हो जाएगा। इन्हीं विषयों को उठाते हुए वरिष्ठ पत्रकार आदर्श प्रकाश सिंह ने एक पुस्तक लिखी है जिसका नाम है−'सही भाषा सरल सम्पादन'।

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जैसा कि पुस्तक के नाम से ही स्पष्ट है, लेखक ने समाचार पत्रों की भाषा को सुधारने और सशक्त बनाने पर काफी जोर दिया है। आजकल दैनिक पत्रों में भाषाई अशुद्धियां खूब देखी जा रही हैं। डेस्क पर काम करने वाले पत्रकारों की जिम्मेदारी होती है कि वे इसे सम्पादित कर दुरुस्त करें। लेखक ने अपनी पुस्तक में डेस्क के कामकाज को बेहतर ढंग से समझाया है। आदर्श जी ने नवभारत टाइम्स, राजस्थान पत्रिका, दैनिक जागरण, जनसत्ता एक्सप्रेस, अमर उजाला और नई दुनिया जैसे प्रमुख मीडिया संस्थानों में डेस्क पर ही काम किया है। लिहाजा, उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता में अपने 36 साल के अनुभव को इस पुस्तक के माध्यम से बांटने की कोशिश की है। इस पुस्तक को उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने वर्ष 2020 के लिए 'बाबूराव विष्णु पराड़कर पुरस्कार' से सम्मानित किया है।  


लेखक को नब्बे के दशक में नवभारत टाइम्स के प्रधान सम्पादक राजेन्द्र माथुर की एक सलाह इतनी भा गई कि उन्होंने अपने कॅरियर में इसे एक मंत्र के रूप में अपना लिया। नवभारत टाइम्स, लखनउ में सम्पादकीय विभाग की एक बैठक के दौरान माथुर साहब ने कहा था कि 'समाचारों की भाषा आइसक्रीम की तरह होनी चाहिए।' उनका आशय था कि जिस तरह आइसक्रीम खाने पर यह फौरन हमारे गले से नीचे उतर जाती है, उसी तरह खबर ऐसे लिखी जाए कि वह तुरंत पढ़ने वाले के दिलो दिमाग में उतर जाए। लेखक ने पहले अध्याय में माथुर साहब की इस सलाह का उल्लेख किया है। यह दिखाता है कि यशस्वी सम्पादक राजेन्द्र माथुर के प्रति उनके मन में कितना सम्मान है। उनकी सीख ने लेखक को हमेशा सरल और चुस्त सम्पादन के लिए प्रेरित किया है। आदर्श जी लिखते हैं−  'किसी समाचार में अनावश्यक यानी फालतू के शब्दों का प्रयोग करके अखबार की जगह बर्बाद नहीं करनी चाहिए।

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समाचार पत्र में शीर्षक लगाना एक कला है। इसे खबरों का प्राण भी कहा जाता है। लेखक ने उदाहरण के तौर पर कुछ चुटीले शीर्षकों का संग्रह करके अपनी पुस्तक में जगह दी है। इसके अलावा वाक्य छोटा करने, व्याकरण और वर्तनी की अशुद्धियां, प्रूफ की गलतियां, समाचारों में अंग्रेजी शब्दों की भरमार क्यों जैसे मुद्दे भी उठाए गए हैं। 'अनुवाद बनाता है सम्पूर्ण पत्रकार', इस अध्याय में यह बताया गया है कि पत्रकारों को अनुवाद के काम में निपुण होना आवश्यक है। देश में पत्रकारिता की शिक्षा देने वाले कई संस्थान और विश्वविद्यालय हैं लेकिन वहां युवाओं को व्यावहारिक प्रशिक्षण नहीं दिया जा रहा है। लेखन शैली कैसे सुधारी जाए, भाषाई गलतियों पर विराम कैसे लगे, इसे बताने की जरूरत है। यह सब काम बेहतर सम्पादन के ही अंग हैं। इस दृष्टि से यह पुस्तक मीडिया के क्षेत्र में कदम रखने वाले युवाओं के लिए मार्गदर्शक का काम करेगी। पुस्तक में अखबारों के डिजाइनिंग पक्ष को भी उभारा गया है। प्रिंट मीडिया के विद्यार्थी इस पुस्तक से काफी कुछ सीख सकते हैं। लेखक ने कई उदाहरण देकर यह समझाने का प्रयास किया है कि भाषाई गलतियों से अखबार की प्रतिष्ठा को चोट पहुंचती है। इसलिए इसे रोका जाना चाहिए। इस पुस्तक का संदेश यही है कि डेस्क के पत्रकार को काफी संजीदगी से काम करना चाहिए। लेखक ने कई मीडिया संस्थानों में अतिथि शिक्षक के रूप में पढ़ाया है। वहां उन्हें यह अनुभव हुआ कि छात्र−छात्राओं का लेखन बहुत कमजोर है। वाक्य रचना काफी लचर है। हिन्दी भाषा के प्रति उनकी समझ को और सुधारने की जरूरत है। इसी नाते उन्होंने ऐसी पुस्तक लिखने का विचार किया जो युवाओं को हिन्दी पत्रकारिता में प्रशिक्षित कर सके। आदर्श जी ने अपने लंबे अनुभव का निचोड़ इस पुस्तक के माध्यम से नई पीढ़ी के समक्ष रखा है। उन्हें विश्वास है कि यह पुस्तक मीडिया के विद्यार्थियों को पसंद आएगी और वे इससे लाभ उठाएंगे।


पुस्तक का नाम- सही भाषा सरल सम्पादन

लेखक- आदर्श प्रकाश सिंह

प्रकाशक- के एल पचौरी प्रकाशन

डी-8 इन्द्र पुरी, लोनी गाजियाबाद

पेज संख्या- 120

मूल्य- रुपये 250

समीक्षक - सुविज्ञ वत्स

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