भारत में दर्शन का आधार है ‘संवाद’ (पुस्तक समीक्षा)

भारत में दर्शन का आधार है ‘संवाद’ (पुस्तक समीक्षा)

ऋग्वेद के 10वें मंडल का 191वां सूक्त ऋग्वेदका अंतिम सूक्त है। इस सूक्त में सबकी अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले अग्निदेव की प्रार्थना, जो आपसी मतभेदों को भुलाकर सुसंगठित होने के लिए की गयी है। आप परस्पर एक होकर रहें, परस्पर मिलकर प्रेम से वार्तालाप करें।

सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम् । 

देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ॥2॥ 

समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम् l 

समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि ॥3॥ 

समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः । 

समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥4॥

ऋग्वेद के 10वें मंडल का यह 191वां सूक्त ऋग्वेदका अंतिम सूक्त है। इस सूक्त में सबकी अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले अग्निदेव की प्रार्थना, जो आपसी मतभेदों को भुलाकर सुसंगठित होने के लिए की गयी है। आप परस्पर एक होकर रहें, परस्पर मिलकर प्रेम से वार्तालाप करें। समान मन होकर ज्ञान प्राप्त करें। जिस प्रकार श्रेष्ठजन एकमत होकर ज्ञानार्जन करते हुए ईश्वर की उपासना करते हैं, उसी प्रकार आप भी एकमत होकर एवं विरोध त्याग करके अपना काम करें। हम सबकी प्रार्थना एकसमान हो, भेद-भाव से रहित परस्पर मिलकर रहें, अंतःकरण मन-चित्त-विचार समान हों। मैं सबके हित के लिए समान मन्त्रों को अभिमंत्रित करके हवि प्रदान करता हूँ। तुम सबके संकल्प एकसमान हों, तुम्हारे हृदय एकसमान हों और मन एकसमान हों, जिससे तुम्हारा कार्य परस्पर पूर्णरूप से संगठित हों।

सुप्रसिद्ध संवाद-शास्त्री प्रो. कुठियाला की पुस्तक ‘संवाद के स्वराज’ की प्रस्तावना सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं कलाधर्मी डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने लिखी है। उनकी प्रस्तावना में एक जगह लिखा है- “सभ्यता, संस्कृति, दर्शन के विकास में संवाद की महत्वपूर्ण भूमिका है”। जब यह पंक्ति मैं पढ़ता हूँ तो मुझे संवाद की भारतीय परम्परा स्मरण हो उठती है। विश्व की सबसे अनूठी और अनुकरणीय संस्कृति को जब मैं देखता हूँ तो ध्यान आता है कि इसका विकास तो संवाद के आधार पर ही हुआ है।

हमारी परंपरा में है ‘संवाद का स्वराज’। यह संवाद ही तो है तो समाज को दिशा देता है। हमारे ग्रंथ क्या हैं? संवाद से उपजा दर्शन। एक ने प्रश्न पूछे और दूसरे ने उनके उत्तर दिए और एक दर्शन की उत्पत्ति हो गई।

अर्जुन ने प्रश्न पूछे, श्री कृष्ण ने उत्तर दिए- तब गीता महात्म हमें प्राप्त हुआ। 

यक्ष ने प्रश्न पूछे, धर्मराज ने उत्तर दिए। हमें जीवन का सार प्राप्त हुआ।

जिन्हें हम संचार क्षेत्र का अधिष्ठाता मानते हैं, ऐसे देवर्षि नारद ने जब महाराज युधिष्ठर से सवाल किये, तो युधिष्ठर के जवाबों से हमें ‘सुशासन के सूत्र’ प्राप्त होते हैं।

जब बालक नचिकेता यमराज से प्रश्न पूछता है, तब हमें ‘जीवन और मृत्यु’ का रहस्य पता चलता है।

जनक की सभा में ब्रह्मज्ञानी याज्ञवल्क्य से जब ब्रह्मवादिनी गार्गी प्रश्न पूछती हैं तब संसार के सामने अनेक समाधान प्रस्तुत होते हैं। शास्त्रार्थ के अंत में जब गार्गी अपनी पराजय स्वीकार कर लेती हैं, तब प्रश्न पूछने की महत्ता समझाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं– ‘गार्गी तुम इसी प्रकार प्रश्न पूछने से संकोच न करो, क्योंकि प्रश्न पूछे जाते हैं तो ही उत्तर सामने आते हैं, जिनसे यह संसार लाभान्वित होता है।

यह है संवाद के प्रति भारतीय दृष्टि। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति भारतीय दृष्टि।

हम कुम्भ मेलों की मूल परम्परा को देखें तो वहां भी हमें ‘संवाद का स्वराज’ दिखाई देगा। वर्षभर देशभर में भ्रमण करते हुए समाज की रीति-कुरीतियों का अनुभव करने वाले विभिन्न मत-संप्रदाय के विद्वान जन कुम्भ मेला में एकत्र आते हैं और अपने अनुभवों को साझा करते हैं। विभिन्न विचारों/अनुभवों के आधार पर समाज के लिए आगे का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

ओजस्वी वाणी और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी श्रद्देय मुकुल कानिटकर एक बार घर आये थे। तब मेरा बालक कुछ तो भी प्रश्न पूछ रहा था तो मैंने उसे डपट दिया कि क्या बेकार के प्रश्न पूछ रहा था? तब क्या हुआ होगा? मुकुल जी ने मुझे ही डपट दिया। बोले- “बालक को संवाद करने दो। वह संवाद नहीं करेगा तो उसे समाधान कैसे मिलेगा?''

संवाद का उद्देश्य समाधान होना चाहिए। लोक हित होना चाहिए। नये ज्ञान का सृजन होना चाहिए। लेकिन पाश्चात्य विचार के प्रभाव में आकर संवाद की यह परम्परा अपना हेतु खो बैठी है। उद्देश्यविहीन हो गई है। हम समाधान के लिए संवाद नहीं कर रहे। स्वयं को सिद्ध करने के लिए कुतर्क कर रहे हैं। अपनी-अपनी हांक रहे हैं। संवाद की इतनी महान परम्परा को हमें वाक्-युद्ध बना दिया है। बहस अब जीतने के लिए होने लगी हैं। ऐसे में जब संवाद अपना अर्थ खो बैठा है तब सभी बहसें निरर्थक ही होनी हैं। मार्ग कुछ नहीं निकलना। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देश विरोधी नारों में बिलकुल भी नहीं हैं। समाज को सांप्रदायिक एवं जातीय आधार पर विभाजित करने वाले स्वरों में भी किंचित भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो समाज को एक साथ लाने में हैं। आज जब हम भारत की स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं तब क्या हमें ध्यान नहीं आता कि हमारे लिए स्वतंत्रता के क्या मायने हैं? स्वतंत्रता के पथ पर जो भी चले थे, उनका लक्ष्य एक सशक्त राष्ट्र के रूप में भारत का निर्माण करना था। तब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का लक्ष्य क्या होना चाहिए? क्या भारत को चिकन नेक से मरोड़कर तोड़ देना अभिव्यक्ति की स्वतंत्र है?

सच में, आज ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भारतीय दृष्टि’ पर बात करना अधिक प्रासंगिक हो जाता है। देश के कोने-कोने में संवाद की भारतीय परम्परा पर विमर्श होना चाहिए। ‘संवाद के स्वराज’ तक हम सबके मन पहुँचने चाहिए। तब हम संवाद के उस उद्देश्य तक पहुँच पाएंगे, जिसकी कल्पना ऋग्वेद में की गई है।

-लोकेन्द्र सिंह

(सहायक प्राध्यापक-माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल)