By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | May 17, 2025
अभी दो चार दिन पहले ही भारत, भूटान, नेपाल और चीन के चुनिंदा ग्लेशियलोजिस्टों ने समुद्र तल से करीब 5100 मीटर उंचे याला ग्लेशियर के मौत की अनोखी शोकसभा का आयोजन कर दुनिया के देषो को ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभाव के प्रति सावचेत करने का प्रयास किया है। हांलाकि किसी ग्लेशियर की मौत की विधिवत घोषणा और मातम सभा के आयोजन का यह कोई पहला मौका नहीं है। पिछले सात सालों में यह तीसरा मौका है जब ग्लेशियर की मौत की शोक सभा का आयोजन और उस स्थल पर पट्टिका लगाने का काम हुआ है। इससे पहले 2019 में आइसलैण्ड के ओक और 2021 में मैक्सिको के ओयोलोको ग्लेषियर के मौत की शोकसभा का आयोजन किया जा चुका है। ग्लोबल वार्मिंग दुनिया को किस दिशा में ले जा रही है और किस तरह के प्रभाव हमें पिछले सालों से लगातार देखने को मिल रहे हैं उनमें से ग्लेशियरों के नष्ट होना तो केवल और केवल एक पक्ष मात्र है। जबकि ग्लोबल वार्मिंग के चलते ग्लेशियरों के पिघलने के बारे में विशेषज्ञ वैज्ञानिक लगातार सावचेत करते रहे हैं।
दरअसल जिस तरह का ग्लोबल वार्मिंग का असर देखा जा रहा है उससे यह माना जा रहा है कि लाख प्रयासों के बावजूद 9 लाख ट्रिलियन टन बर्फ के पिघलने की संभावना वैज्ञानिकों द्वारा बार बार की जा रही है। मौसम में हर दूसरे तीसरे दिन बदलाव और चरम मौसम के हालात गंभीर है। रेगिस्तान का विस्तार हो रहा है तो सूखे की संभावनाएं अधिक हो गई है। बीमारियों के नित नए वेरियंट सामने आ रहे हैं तो कीटाणुओं की सक्रियता और उनका असर साफ देखा जा सकता है। ऐसे में एक और दुनिया के देशों को ढुलमिल नीति त्यागकर ठोस प्रयास करने होंगे। गैरसरकारी संगठनों को भी आगे आना होगा। इसके साथ ही वैज्ञानिकों को भी एक बात ध्यान रखनी चाहिए कि केवल आय बढ़ाने के लिए इस तरह के प्रयास नहीं करने चाहिए। गैरसरकारी संगठनों की ऐसें हालातों में और अधिक्र सक्रियता के साथ अभियान चलाने होंगे। ग्लेशियरों के पिघलने का संकट आने वाले समय में और अधिक गंभीर होगा क्योंकि जिस तरह से कांक्रिट के जंगल, अत्यधिक भू जल का दोहन पंखे कूलर के स्थान पर एयर कण्डीशरों का बढता प्रयोग, और इलेक्ट्रोनिक उत्पादों के कारण हालत दिन प्रतिदिन खराब होते जा रहे हैं। हालात यही रहे तो ग्लेशियरों की बर्फ पिघलेगी ही पिघलेगी साथ ही अनेक समस्याएं और अधिक नकारात्मक प्रभाव डालेगी।
- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा