By कमलेश पांडे | Sep 21, 2026
प्रतिवर्ष 21 सितंबर को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस केवल एक तारीख या रस्म नहीं है, बल्कि दुनिया भर में पसरती अशांति के बीच एक गंभीर आत्मचिंतन का अवसर है। ऐसे समय में जब संघर्ष, वैमनस्यता और अशांति हर ओर पैर पसार रहे हैं, इस दिन का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस पर हर तरफ फैलती अशांति के मुख्य मायने इस प्रकार हैं:-
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अशांति का फैलना हमें यह याद दिलाता है कि केवल "युद्ध का न होना ही शांति नहीं है।" अप्रत्यक्ष/छिपी हुई अशांति- जब तक आर्थिक असमानता, सामाजिक भेदभाव, भुखमरी, और अन्याय मौजूद हैं, तब तक समाज में एक 'अदृश्य अशांति' बनी रहती है। यह दिवस इस बात पर बल देता है कि वास्तविक शांति केवल हथियारों को रोकने से नहीं, बल्कि समाज में न्याय, समानता और मानवाधिकारों की रक्षा से आएगी।
दुनिया भर के देश हर साल खरबों डॉलर हथियार खरीदने और रक्षा बजट बढ़ाने में खर्च कर रहे हैं, जबकि भुखमरी, जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी चिंताओं के लिए संसाधनों की कमी बताई जाती है। बढ़ती अशांति यह स्पष्ट करती है कि मानवता ने अपनी प्राथमिकताएं गलत तय कर ली हैं—हम सुरक्षा के नाम पर विनाश की तैयारी में अधिक निवेश कर रहे हैं।
आधुनिक दौर की अशांति केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया, फेक न्यूज, और नफरत भरे भाषणों ने आम लोगों के दिलों-दिमाग में अशांति पैदा कर दी है। डिजिटल मीडिया का इस्तेमाल समाज को जोड़ने के बजाय ध्रुवीकरण और नफरत फैलाने के लिए हो रहा है।
जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न संकट (जैसे सूखा, बाढ़, और संसाधनों की कमी) भी अशांति की एक बड़ी वजह बन रहे हैं। पानी, जमीन और बुनियादी संसाधनों के लिए बढ़ते संघर्ष यह दिखाते हैं कि प्रकृति के साथ अन्याय भी इंसानों के बीच शांति को खत्म कर रहा है।
बढ़ती अशांति के इस माहौल में 21 सितंबर हमें यह याद दिलाता है कि शांति कोई एक दिन का उत्सव या निष्क्रिय विचार नहीं है, बल्कि यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। व्यक्तिगत स्तर पर- शांति की शुरुआत स्वयं और अपने परिवार/समाज के प्रति करुणा और सहनशीलता से होती है। वैश्विक स्तर पर- संवाद, कूटनीति, और सह-अस्तित्व की भावना को फिर से जगाने की आवश्यकता है। अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस पर फैलती अशांति वास्तव में पूरी दुनिया के लिए एक 'वेक-अप कॉल' (चेतावनी) है कि यदि हमने संवाद और सहिष्णुता का रास्ता नहीं चुना, तो प्रगति के तमाम दावे अर्थहीन हो जाएंगे।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक