By अशोक भाटिया | Sep 21, 2026
उत्तर प्रदेश की राजनीति को देश के सत्ता मार्ग का सबसे बड़ा प्रवेश द्वार माना जाता है। यहाँ का हर चुनावी समर राजनीतिक सिद्धांतों, सामाजिक इंजीनियरिंग और रणनीतिक पैंतरों की एक नई प्रयोगशाला बन जाता है। इस समय सूबे की सियासत 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट से पूरी तरह गर्म हो चुकी है। इस बार का विमर्श लोक-कल्याणकारी नीतियों या पारंपरिक विकास मॉडलों पर कम, बल्कि समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के "बदलते वैचारिक और प्रतीकात्मक रंगों" पर ज्यादा केंद्रित है। कभी लाल टोपी और हरे झंडे के पर्याय रहे अखिलेश यादव के इस नए राजनीतिक कलेवर ने उत्तर प्रदेश के पूरे राजनीतिक परिदृश्य को एक नई बहस में झोंक दिया है। उनके इस नए तेवर को जहां विपक्षी दल चुनावी अवसरवाद और "गिरगिट की तरह रंग बदलने" की संज्ञा दे रहे हैं, वहीं सपा के रणनीतिकार इसे बहुजन और वंचित समाज को एकजुट करने की एक व्यापक 'हाइब्रिड सोशल इंजीनियरिंग' के रूप में देख रहे हैं। ऐसे में यह सवाल मौजूं हो जाता है कि 2027 के महासमर से पहले अखिलेश यादव का यह नया रूप किसी गहरे वैचारिक परिवर्तन का संकेत है या सत्ता तक पहुँचने का महज एक तात्कालिक और व्यावहारिक शॉर्टकट?
इस पूरे विवाद के केंद्र में सबसे पहला और चौंकाने वाला बदलाव समाजवादी पार्टी के आधिकारिक चुनाव प्रचार रथ पर देखने को मिला है। अखिलेश यादव ने 2027 की चुनावी यात्राओं के लिए जो नया रथ तैयार करवाया है, उसकी मुख्य रंग-योजना में इस बार 'भगवा' और पीत आभा को सबसे प्रमुखता से स्थान दिया गया है। 2022 के विधानसभा चुनाव में जहाँ सपा का रथ पूरी तरह लाल और हरे रंग के पारंपरिक समाजवादी रंग में रंगा था, वहीं इस बार भाजपा के सबसे मजबूत वैचारिक प्रतीक यानी 'भगवा रंग' का यह सीधा प्रवेश राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान कर रहा है। इस रथ के माध्यम से सपा एक बेहद चतुर और बहुस्तरीय संदेश देने की कोशिश कर रही है। एक तरफ रथ पर भगवा पृष्ठभूमि के साथ बाबासाहेब आंबेडकर, डॉ. राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव और चौधरी चरण सिंह जैसे महापुरुषों की तस्वीरें हैं, जो सामाजिक न्याय के समेकित एजेंडे को दर्शाती हैं। दूसरी तरफ, भगवा रंग का उपयोग कर अखिलेश यादव भाजपा के उस आख्यान को कुंद करना चाहते हैं जो सपा को बहुसंख्यक विरोधी या एक वर्ग विशेष की पार्टी के रूप में चित्रित करता रहा है। यह 'सॉफ्ट हिंदुत्व' और 'सोशल जस्टिस' का एक ऐसा अनूठा मिश्रण है, जिसके माध्यम से सपा सवर्णों (विशेषकर सत्तारूढ़ व्यवस्था से असंतुष्ट ब्राह्मणों और राजपूतों) तथा गैर-यादव पिछड़ों को यह विश्वास दिलाना चाहती है कि समाजवादी पार्टी अब किसी एक जाति या धर्म की बपौती नहीं है बल्कि वह बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक भावनाओं का भी उतना ही सम्मान करती है।
इस पूरे 'कलर गेम' का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि अखिलेश यादव इस प्रक्रिया में अपने कोर वोट बैंक यानी अल्पसंख्यकों को खोने का जोखिम भी उठा रहे हैं या कम से कम ऐसा विपक्ष को लगता है। जब मायावती यह सवाल उठाती हैं कि "क्या सपा का मुसलमानों से भरोसा उठ गया है?", तो वे वास्तव में मुस्लिम मतदाताओं के भीतर एक असुरक्षा की भावना पैदा करने का प्रयास कर रही होती हैं। लेकिन अखिलेश यादव की इस रणनीति के पीछे एक गहरा गणित है। उन्हें पता है कि उत्तर प्रदेश का अल्पसंख्यक मतदाता वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा को हराने में सक्षम सबसे मजबूत विकल्प के साथ ही जाएगा, और वह विकल्प फिलहाल सपा ही है। इसलिए, मुस्लिम मतों के बिखरने का खतरा कम देखते हुए अखिलेश अपनी पूरी ऊर्जा उस बहुसंख्यक और दलित आबादी को जोड़ने में लगा रहे हैं जो अब तक उनसे दूर रही थी। यह एक बड़ा राजनीतिक जुआ है, जिसमें यदि वे सफल रहे तो भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय का एक नया अध्याय लिखा जाएगा, और यदि विफल रहे तो पार्टी अपने पारंपरिक आधार से भी हाथ धो सकती है।
देखा जाय तो राजनीति में 'रंगों का बदलना' कोई नई बात नहीं है। विचारधाराएं समय के साथ अपनी प्रासंगिकता और व्यावहारिकता के अनुसार खुद को ढालती आई हैं। अखिलेश यादव का यह नया अवतार इस बात का प्रमाण है कि वे अब जूनियर यादव या एक विरासत संभालने वाले नेता की छवि से बाहर निकलकर खुद को उत्तर प्रदेश के एक सर्वमान्य और परिपक्व जननेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। उनका यह बहुरंगी दृष्टिकोण भारतीय लोकतंत्र के उस व्यावहारिक रूप को दिखाता है जहाँ चुनाव जीतने के लिए प्रतीकों का विलय और वैचारिक सीमाओं का लचीला होना अनिवार्य शर्त बन जाता है। क्या जनता उनके इस 'नीले-भगवा-लाल-हरे' इंद्रधनुषी गठबंधन को स्वीकार करेगी या इसे केवल एक चुनावी छलावा मानकर खारिज कर देगी, इसका फैसला 2027 के मतपेटियों से ही होगा। लेकिन एक बात तो तय है कि अखिलेश यादव के इन बदलते रंगों ने उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव को बेहद दिलचस्प, पेचीदा और अप्रत्याशित बना दिया है, जिसने विरोधियों को अपनी रणनीतियाँ नए सिरे से तैयार करने पर मजबूर कर दिया है।
- अशोक भाटिया
वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार