Tipu Sultan Birth Anniversary: टीपू सुल्तान ने 18वीं सदी में मिसाइल बनाकर छुड़ाए थे अंग्रेजों के छक्के, जानिए रोचक बातें

By अनन्या मिश्रा | Nov 20, 2024

आज ही के दिन यानी की 20 नवंबर को 18वीं सदी के सबसे बड़े मुस्लिम शासक टीपू सुल्तान का जन्म हुआ था। टीपू सुल्तान भारतीय इतिहास के प्रमुख व्यक्तित्वों में से एक हैं। अपने पिता हैदर अली की मौत के बाद वह मैसूर के शासक के तौर पर उभरे थे। बहुत कम उम्र में ही उन्होंने युद्ध की सभी कलाएं सीख ली थीं और महज 18 साल की उम्र में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी गई लड़ाई में जीत हासिल की थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर टीपू सुल्तान के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में... 

कर्नाटक के देवनहल्ली में 20 नवंबर 1750 को टीपू सुल्तान का जन्म हुआ था। इनके पिता हैदर अली मैसूर के शासक थे और माता का नाम फातिमा फखरू निशा था। टीपू सुल्ताम का पूरा नाम फतेह अली साहब टीपू था। पिता हैदर अली की मौत के बाद उन्होंने मैसूर का शासन संभाला था।

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मिसाइल मैन

बता दें कि टीपू सुल्तान ने अपने शासनकाल में कई तरह के प्रयोग किए थे, जिसका फायदा उनकी जनता को मिला। इसी प्रयोग व बदलाव की वजह से उनको एक अलग राजा की उपाधि भी प्राप्त हुई थी। प्राप्त जानकारी के अनुसार, टीपू सुल्तान के पिता हैदर अली के शासनकाल में 50 से अधिक रॉकेटमैन थे, जिनका वह अपने सेना में बखूबी इस्तेमाल करते थे। इसीलिए इनको रॉकेटमैन कहा जाता था, क्योंकि यह रॉकेट चलाने में माहिर थे।

टीपू सुल्तान युद्ध के दौरान विरोधियों पर ऐसे निशाने लगाते थे, जिससे विरोधियों को काफी नुकसान झेलना पड़ता था। वहीं टीपू सुल्तान के शासनकाल में पहली बार लोहे के केस वाली मिसाइल रॉकेट भी बनाई गई थी। उन्होंने अपने शासनकाल में बांस से बने रॉकेट का आविष्कार किया था। यह रॉकेट हवा में करीब 200 मीटर की दूरी तय करता था। वहीं इस रॉकेट को उड़ाने के लिए 250 ग्राम बारूद का इस्तेमाल किया जाता था।

फिर बांस के बाद टीपू सुल्तान ने लोहे के इस्तेमाल से रॉकेट बनाना शुरूकर दिया। यह रॉकेट बांस वाले रॉकेट की तुलना में अधिक दूरी तय कर सकते थे और इनको उड़ाने के लिए ज्यादा बारूद का इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन यह रॉकेट विरोधियों को अधिक नुकसान पहुंचा पाते थे।

मंगलौर की संधि

टीपू सुल्तान से कई युद्धों में शिकस्त खाने के बाद मराठाओं और निजाम ने अंग्रेजों से संधि कर ली। ऐसे में टीपू ने भी अंग्रेजों को संधि प्रस्ताव दिया। वहीं अंग्रेजों को भी टीपू सुल्तान की शक्ति का एहसास था, इसलिए वह भी सुल्तान से संधि करना चाहते थे। दोनों पक्षों में वार्ता के बाद मार्च 1784 में 'मंगलौर की संधि' संपन्न हुई।

मृत्यु

प्राप्त जानकारी के अनुसार, चौथे एंग्लो-मैसूर युद्ध के दौरान हैदराबाद और मराठों के निजाम ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शाही बलों को अपना समर्थन दिया था। जिसके बाद टीपू सुल्तान की 04 मई 1799 को बड़ी धूर्तता के साथ हत्याकर दी गई।

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