By Ankit Jaiswal | Feb 06, 2026
तनावपूर्ण माहौल के बीच अमेरिका और ईरान के रिश्तों में फिर हलचल तेज हो गई है। बता दें कि जब दोनों देशों के अधिकारी युद्ध टालने के प्रयास में बातचीत कर रहे थे, उसी दौरान ट्रंप प्रशासन के भीतर यह साफ नहीं था कि अगर सैन्य कार्रवाई होती है तो उसका असली मकसद क्या होगा। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अभी तक यह तय नहीं किया है कि ईरान के खिलाफ किसी संभावित हमले से वह क्या हासिल करना चाहते हैं।
गौरतलब है कि ट्रंप ने हाल के बयानों में ईरान में सत्ता परिवर्तन की संभावना से इनकार नहीं किया है, लेकिन मौजूद जानकारी के अनुसार प्रशासन के भीतर न तो कोई स्पष्ट रोडमैप है और न ही इस बात पर सहमति कि सैन्य कार्रवाई के बाद अमेरिका की भूमिका क्या होगी। खुद ट्रंप ने एक टीवी इंटरव्यू में ईरान के सर्वोच्च नेता को लेकर कहा था कि उन्हें “बेहद चिंतित होना चाहिए”, जिससे बयानबाजी और तेज हो गई।
ट्रंप का दावा है कि जून में अमेरिकी हमलों के बाद भी ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को दोबारा खड़ा करने की कोशिश कर रहा था। उनके मुताबिक अमेरिका को नए परमाणु ठिकाने की जानकारी मिल गई थी और ईरान को सख्त चेतावनी दी गई थी। हालांकि ट्रंप ने अब तक सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं किया है कि उनका लक्ष्य ईरानी शासन को गिराना है, उसे कमजोर करना है या केवल परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों पर नई पाबंदियां लगवाना है।
इसी बीच विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने साफ किया कि अमेरिका केवल परमाणु मुद्दे तक सीमित बातचीत नहीं चाहता। उनका कहना है कि बैलिस्टिक मिसाइलों की रेंज, क्षेत्र में ईरान के समर्थित गुटों और देश के भीतर मानवाधिकार हालात पर भी चर्चा जरूरी है। हालांकि ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण है और वह मिसाइल क्षमता या क्षेत्रीय समर्थन पर कोई बातचीत नहीं करेगा।
शुक्रवार को ओमान की मध्यस्थता में मस्कट में अप्रत्यक्ष बातचीत हुई, जहां ओमानी विदेश मंत्री ने अलग-अलग ईरानी और अमेरिकी प्रतिनिधियों से मुलाकात की। ईरान ने इन वार्ताओं को सिर्फ परमाणु मुद्दे तक सीमित बताया है। अमेरिका की ओर से कहा गया कि राष्ट्रपति के पास कई विकल्प हैं, लेकिन उन्हें सार्वजनिक करना उनकी रणनीति का हिस्सा नहीं है।
पिछले कुछ हफ्तों में ट्रंप के रुख में लगातार बदलाव देखने को मिला है। पहले उन्होंने ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के समर्थन में सैन्य कार्रवाई की धमकी दी थी, फिर दावा किया कि ईरान ने दमन रोक दिया है और अब बातचीत का रास्ता अपनाया जा रहा है। इससे यह सवाल और गहरा गया है कि अगर बातचीत विफल होती है तो अमेरिका किस स्तर तक जाएगा।
मौजूदा हालात में अमेरिकी सेना ने पश्चिम एशिया में अपनी मौजूदगी बढ़ा दी है। एयरक्राफ्ट कैरियर अब्राहम लिंकन और उसके साथ कई युद्धपोत ईरान की मारक दूरी के करीब पहुंच रहे हैं। इसके अलावा लड़ाकू विमान, वायु रक्षा प्रणालियां और लंबी दूरी की मिसाइलें भी क्षेत्र में तैनात की गई हैं। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह कदम मौजूदा तनाव के मद्देनजर है, न कि किसी तय हमले की तैयारी।
तनाव के बीच हाल ही में एक ईरानी ड्रोन को अमेरिकी सेना ने मार गिराया, जो कैरियर की ओर आक्रामक तरीके से बढ़ रहा था। वहीं होरमुज जलडमरूमध्य में ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड पर एक अमेरिकी व्यापारी जहाज को डराने का आरोप भी लगा है। हालांकि दोनों मामलों में स्थिति बिगड़ने से पहले संभाल ली गई।
क्षेत्रीय सहयोगी देश, खासकर खाड़ी राष्ट्र और इज़राइल भी फिलहाल अमेरिका को संयम बरतने की सलाह दे रहे हैं। सऊदी अरब ने साफ किया है कि वह ईरान पर किसी हमले के लिए अपने हवाई क्षेत्र या सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल की अनुमति नहीं देगा। ऐसे में बातचीत, सैन्य दबाव और राजनीतिक संदेशों के बीच ट्रंप प्रशासन की ईरान नीति अभी भी कई सवालों के घेरे में है और आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि अमेरिका किस दिशा में आगे बढ़ता है और हालात किस मोड़ पर पहुंचते हैं।