पाकिस्तान विरोधी पॉल कपूर को ट्रंप ने दक्षिण एशिया का प्रभारी बनाकर इस्लामाबाद को झटका दे दिया

By नीरज कुमार दुबे | Oct 09, 2025

अमेरिकी विदेश मंत्रालय में दक्षिण और मध्य एशियाई मामलों के लिए भारतीय मूल के प्रोफेसर एस. पॉल कपूर की नियुक्ति न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि भारत के लिए एक बड़ी रणनीतिक राहत के रूप में देखी जा रही है। पॉल कपूर, जो लंबे समय से दक्षिण एशियाई सुरक्षा, परमाणु नीति और आतंकवाद पर अपने कठोर विश्लेषणों के लिए जाने जाते हैं, अब उस पद पर आसीन हुए हैं जहाँ से अमेरिका की भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश के प्रति नीतियाँ तय होती हैं।

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कौन हैं पॉल कपूर और क्यों भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं? यदि इस पर चर्चा करें तो आपको बता दें कि नई दिल्ली में जन्मे पॉल कपूर भारतीय पिता और अमेरिकी माता के पुत्र हैं। उन्होंने शिकागो विश्वविद्यालय से पीएचडी की है और लंबे समय से अमेरिकी नौसेना के पोस्टग्रेजुएट स्कूल तथा स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के हूवर इंस्टीट्यूशन से जुड़े हुए हैं। वह उन कुछ विद्वानों में से हैं जिन्होंने दक्षिण एशिया की सामरिक राजनीति पर गहरी अकादमिक और व्यावहारिक समझ बनाई है।

उनकी पुस्तकों Jihad as Grand Strategy और Dangerous Deterrent: Nuclear Weapons Proliferation and Conflict in South Asia में पाकिस्तान की नीतियों को उन्होंने “राज्य प्रायोजित उग्रवाद” कहा है, न कि अस्थिरता की परिणति। यह दृष्टिकोण अमेरिका के भीतर पाकिस्तान के प्रति एक कठोर रुख की वकालत करता है। कपूर का यह विश्लेषण भारत के लिए राहतकारी है, क्योंकि अब दक्षिण एशिया मामलों में निर्णय-प्रक्रिया ऐसे व्यक्ति के हाथों में है जो पाकिस्तान की “दोहरी नीति” को अच्छी तरह समझते हैं।

इससे पहले कपूर ट्रम्प प्रशासन के नीति नियोजन विभाग में काम कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने “इंडो-पैसिफिक रणनीति” के निर्माण में भूमिका निभाई थी। यानी वह न केवल एक अकादमिक हैं, बल्कि नीति-निर्माण की मशीनरी से भी भली-भाँति परिचित हैं। उनकी नियुक्ति से यह स्पष्ट संकेत जाता है कि अमेरिका अब दक्षिण एशिया को केवल पाकिस्तान या अफगानिस्तान के संदर्भ में नहीं, बल्कि भारत-केंद्रित दृष्टि से देखना चाहता है।

कपूर की नियुक्ति भारत के लिए राहत क्यों है? यदि इस पर चर्चा करें तो हमें यह देखना होगा कि पॉल कपूर का विचार है कि पाकिस्तान का आतंकवादी ढाँचा कोई आकस्मिक तत्व नहीं, बल्कि उसकी “राष्ट्रीय रणनीति” का अभिन्न हिस्सा है। इसका सीधा अर्थ है कि वे अमेरिका के भीतर पाकिस्तान के प्रति किसी “नरमी” के पक्षधर नहीं हैं। उनकी सोच के अनुसार, जब तक इस्लामाबाद आतंकवाद को नीतिगत औज़ार के रूप में इस्तेमाल करता रहेगा, तब तक दक्षिण एशिया में स्थायी शांति असंभव है।

भारत के दृष्टिकोण से यह अत्यंत अनुकूल है, क्योंकि बीते वर्षों में अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों में कई बार ऐसे संकेत मिले थे कि वॉशिंगटन इस्लामाबाद को फिर से रणनीतिक महत्व देने लगा है—खासकर अफगान मोर्चे पर। कपूर की उपस्थिति इस संतुलन को भारत की ओर झुका सकती है।

दूसरी ओर, 21 अमेरिकी सांसदों ने राष्ट्रपति ट्रम्प को पत्र लिखकर भारत के साथ संबंध सुधारने की खुली वकालत की है। यह पत्र ऐसे समय आया है जब अमेरिकी व्यापार नीतियों से दोनों देशों के बीच मतभेद गहराते जा रहे हैं। इन सांसदों में भारतीय मूल के रो खन्ना, प्रमिला जयपाल, राजा कृष्णमूर्ति, श्री थानेदार और सुहास सुब्रमण्यम जैसे नेता शामिल हैं, जो अमेरिकी राजनीति में ‘सामोसा कॉकस’ के रूप में जाने जाते हैं।

इन सांसदों ने पत्र में चेतावनी दी है कि भारत पर दंडात्मक शुल्क लगाने की नीति न केवल दोनों देशों के उद्योगों को नुकसान पहुँचा रही है, बल्कि इससे भारत को चीन और रूस जैसे “अमेरिका-विरोधी” देशों के करीब धकेला जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत क्वाड समूह (अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, भारत) का अहम स्तंभ है और इंडो-पैसिफिक में चीन के बढ़ते प्रभाव का सबसे मज़बूत संतुलन है।

पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि भारत-अमेरिका का व्यापार दोनों देशों में लाखों नौकरियों को सहारा देता है और कई अमेरिकी कंपनियाँ भारत पर निर्भर हैं— चाहे वह सेमीकंडक्टर उत्पादन हो, स्वास्थ्य सेवा हो या ऊर्जा क्षेत्र। सांसदों का कहना है कि “यह टैरिफ नीति अमेरिका के अपने उपभोक्ताओं के लिए भी महँगी साबित हो रही है और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अमेरिकी उद्योग को कमजोर कर रही है।”

देखा जाये तो कपूर की नियुक्ति और अमेरिकी सांसदों की चिट्ठी, दोनों घटनाएँ एक साथ यह संकेत देती हैं कि अमेरिकी प्रतिष्ठान के भीतर भारत को लेकर सहमति बन रही है कि नई दिल्ली अब केवल “सहयोगी” नहीं, बल्कि “रणनीतिक अनिवार्यता” बन चुकी है। ट्रम्प प्रशासन की अब तक की नीति, जो कभी चीन पर कठोर और भारत पर अनिश्चित रही, शायद कपूर जैसे विशेषज्ञ के आने से अधिक संतुलित और भारत-पक्षीय हो सकती है। वहीं 21 सांसदों की पहल यह दर्शाती है कि भारतीय-अमेरिकी समुदाय अब अमेरिकी नीति-निर्माण पर प्रभाव डालने की स्थिति में आ चुका है।

देखा जाये तो दक्षिण एशिया की जटिल राजनीति में पॉल कपूर का आगमन एक नया मोड़ है। वह ऐसे व्यक्ति हैं जो भारत की चिंताओं को न केवल समझते हैं, बल्कि उन्हें अमेरिकी रणनीति में केंद्रीय स्थान देने की क्षमता रखते हैं। साथ ही, अमेरिकी कांग्रेस में उठी भारत समर्थक आवाज़ें यह दर्शाती हैं कि वॉशिंगटन में भी अब यह समझ बन रही है कि भारत के बिना एशिया में स्थिरता की कल्पना असंभव है।

बहरहाल, कपूर की नियुक्ति और सांसदों की पहल, दोनों मिलकर यह संकेत देती हैं कि भारत-अमेरिका संबंध शायद एक नए “रणनीतिक पुनर्जागरण” के मुहाने पर हैं। यदि इसे सही दिशा में ले जाया गया, तो यह साझेदारी न केवल एशिया, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन को भी परिभाषित करेगी।

-नीरज कुमार दुबे

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