By नीरज कुमार दुबे | Sep 26, 2026
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले ही वैश्विक मंच पर अपनी ताकत और प्रभाव का प्रदर्शन करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हों, लेकिन उनकी हालिया कूटनीतिक सक्रियता ने एक अलग तस्वीर सामने रखी है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में आक्रामक भाषण से लेकर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ शिखर वार्ता तक ट्रंप ने दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश की कि अमेरिका अब भी वैश्विक फैसलों का सबसे बड़ा केंद्र है। लेकिन घटनाक्रमों को करीब से देखें तो सवाल उठता है कि क्या ट्रंप की धमकियों और दबाव की राजनीति वास्तव में अपेक्षित नतीजे दे पा रही है?
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ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र के मंच से ईरान को बेहद कड़ी चेतावनी दी और परमाणु समझौते को लेकर दबाव बढ़ाने का संकेत दिया। लेकिन यही वह बिंदु है जहां उनकी ‘अधिकतम दबाव’ वाली रणनीति की सीमा दिखाई देती है। सैन्य ताकत का प्रदर्शन करना एक बात है और उस ताकत के जरिए स्थायी राजनीतिक समाधान हासिल करना दूसरी बात है। करीब सात महीने से जारी टकराव ने इस अंतर को और स्पष्ट कर दिया है।
ट्रंप की मुश्किल केवल ईरान तक सीमित नहीं है। रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त कराने में भी अमेरिकी राष्ट्रपति की कोशिशों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। जबकि ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार के दौरान वादा किया था कि यदि वह चुने जाते हैं तो एक सप्ताह के अंदर रूस और यूक्रेन का युद्ध समाप्त करा देंगे।
सबसे दिलचस्प तस्वीर चीन के मोर्चे पर दिखाई देती है। ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में चीन पर शुल्क और आर्थिक दबाव को अपनी रणनीति का प्रमुख हथियार बनाया था। लेकिन शी जिनपिंग के साथ हालिया मुलाकात में उनका रुख पहले की तुलना में कहीं अधिक संतुलित दिखाई दिया। बातचीत का सबसे ठोस परिणाम व्यापारिक संघर्षविराम को कुछ और समय के लिए बढ़ाना रहा। दूसरी ओर, चीन दुर्लभ खनिजों जैसे महत्वपूर्ण संसाधनों पर अपनी पकड़ के जरिए अमेरिकी दबाव का जवाब देने की क्षमता दिखा चुका है। यही वह मोर्चा है जहां ट्रंप की ‘दबाव डालो और परिणाम हासिल करो’ वाली नीति को वास्तविक आर्थिक ताकत की परीक्षा से गुजरना पड़ रहा है। चीन के साथ टकराव में अमेरिका जितना दबाव बना सकता है, बीजिंग के पास भी उतने ही महत्वपूर्ण रणनीतिक विकल्प मौजूद हैं। ताइवान का मुद्दा इस रिश्ते की सबसे संवेदनशील गांठ बना हुआ है और इस पर चीन की स्थिति में कोई बुनियादी बदलाव दिखाई नहीं देता।
साथ ही ट्रंप की कूटनीतिक मुश्किलों का एक और संकेत उनके पारंपरिक सहयोगियों के बदलते रवैये में दिखाई देता है। यूरोप और एशिया के कई सहयोगी अमेरिका के ईरान संबंधी सैन्य रुख से दूरी बनाए हुए हैं। इसका अर्थ यह है कि अमेरिका अपने मित्र देशों को भी अपनी रणनीति के साथ पूरी तरह खड़ा करने में संघर्ष कर रहा है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का वैश्विक राजनीति में ‘जंगल के कानून’ की वापसी के खतरे का उल्लेख और ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा का सैन्य शक्ति की बजाय सहयोग पर जोर देना इसी बदलते माहौल की ओर संकेत करता है।
ग्रीनलैंड का मामला भी ट्रंप की कूटनीति की सीमाएं दिखाता है। ट्रंप ने कभी इस विशाल आर्कटिक द्वीप पर अमेरिकी नियंत्रण की बात तक कही थी और जरूरत पड़ने पर बल प्रयोग का संकेत दिया था। बाद में डेनमार्क के साथ सैन्य उपस्थिति बढ़ाने की दिशा में समझ जरूर बनी, लेकिन यह उनकी शुरुआती मांग से काफी अलग थी। यानी बयानबाजी और वास्तविक कूटनीतिक उपलब्धि के बीच का अंतर यहां भी सामने आया।
उधर, भारत, कनाडा, यूरोप, चीन, ईरान और रूस जैसे देशों का अमेरिकी दबाव के सामने पहले की तुलना में अधिक स्वतंत्र रुख अपनाना भी महत्वपूर्ण संकेत है। इसका मतलब यह नहीं कि अमेरिका का वैश्विक प्रभाव समाप्त हो गया है, बल्कि यह जरूर दर्शाता है कि केवल धमकी, शुल्क और सैन्य शक्ति के सहारे हर देश को अपनी शर्तों पर चलाना संभव नहीं है। ट्रंप के लिए यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका में मध्यावधि चुनाव नजदीक हैं। विदेश नीति की सफलता का दावा तभी राजनीतिक पूंजी में बदल सकता है जब उसका असर वास्तविक परिणामों में दिखाई दे। ईरान में निर्णायक समाधान, यूक्रेन में प्रगति, चीन के साथ स्थिर संबंध और सहयोगियों का भरोसा, इन सभी मोर्चों पर अभी तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
साथ ही संयुक्त राष्ट्र में ट्रंप का यह कहना कि उन्हें खुद नहीं पता कि उनके पास कितनी शक्ति है और “देखते हैं” कि दुनिया उनकी बात मानती है या नहीं, अनजाने में उनकी मौजूदा कूटनीतिक चुनौती का सार बन गया। अमेरिका के पास अब भी विशाल सैन्य, आर्थिक और तकनीकी शक्ति है, लेकिन वैश्विक राजनीति में शक्ति का अर्थ केवल आदेश देने की क्षमता नहीं, बल्कि दूसरों को अपने साथ लेकर चलने की क्षमता भी है। फिलहाल ट्रंप की कूटनीति की सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि क्या वह दबाव की राजनीति से आगे बढ़कर ऐसे ठोस समझौते करा सकते हैं, जिन्हें अमेरिका के प्रतिद्वंद्वी ही नहीं, उसके सहयोगी भी स्वीकार करें।
-नीरज कुमार दुबे