By रेनू तिवारी | Jan 16, 2026
अमेरिका और चीन के बीच की दुश्मनी वर्तमान में 'शीत युद्ध 2.0' (Cold War 2.0) का रूप ले चुकी है। स्थिति के अनुसार, यह विवाद अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि तकनीक, जासूसी और सैन्य शक्ति के वर्चस्व की जंग बन गया है।वैश्विक व्यापारिक परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव लाते हुए संयुक्त राज्य अमेरिका और ताइवान ने बृहस्पतिवार को एक व्यापक व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की "व्यापार असंतुलन दूर करने" की नीति के तहत किया गया यह समझौता एशिया-प्रशांत क्षेत्र में आर्थिक समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है।
अमेरिका और ताइवान ने एक बड़े व्यापार समझौते पर सहमति जताई, जिसके तहत ताइवान की वस्तुओं पर शुल्क में कटौती की जाएगी और बदले में ताइवान अमेरिका में 250 अरब अमेरिकी डॉलर के नए निवेश करेगा। यह समझौता उन हालिया व्यापार सौदों में शामिल है जो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने किए हैं। इससे पहले उन्होंने यूरोपीय संघ और जापान के साथ भी ऐसे समझौते किए थे। ये सभी समझौते ट्रंप द्वारा पिछले साल अप्रैल में व्यापार असंतुलन दूर करने के लिए पेश की गई व्यापक शुल्क योजना के बाद किए गए हैं।
ट्रंप ने दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन के साथ रिश्तों को स्थिर करने के उद्देश्य से एक साल के व्यापारिक संघर्ष-विराम (ट्रेड ट्रूस) पर भी सहमति जताई। शुरुआत में ट्रंप ने ताइवान से आने वाले सामान पर 32 प्रतिशत शुल्क तय किया था, जिसे बाद में घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया गया। नए समझौते के तहत अब शुल्क दर को और कम करके 15 प्रतिशत कर दिया गया है जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के अन्य व्यापारिक साझेदारों जैसे जापान और दक्षिण कोरिया पर लगाए गए शुल्क के बराबर है।
निवेश: ताइवान की कंपनियाँ (विशेषकर TSMC) अमेरिका में उन्नत सेमीकंडक्टर और AI क्षेत्र में $250 अरब का प्रत्यक्ष निवेश करेंगी। साथ ही, ताइवान सरकार $250 अरब की क्रेडिट गारंटी भी देगी (कुल $500 अरब का प्रभाव)
शुल्क कटौती: अमेरिका ने ताइवानी सामानों पर आयात शुल्क (Tariff) को 20% से घटाकर 15% कर दिया है।
चीन की प्रतिक्रिया: चीन ने इस समझौते को अमेरिका द्वारा ताइवान का "आर्थिक शोषण" करार दिया है।
अमेरिकी वाणिज्य मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि ताइवान के साथ यह समझौता एक “आर्थिक साझेदारी” स्थापित करेगा, जिसके तहत घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए अमेरिका में कई “विश्व स्तरीय” औद्योगिक पार्क बनाए जाएंगे। वाणिज्य मंत्रालय ने इसे एक ‘‘ऐतिहासिक व्यापार समझौता’’ करार दिया और कहा कि इससे अमेरिका के सेमीकंडक्टर क्षेत्र को गति मिलेगी। ताइवान की सरकार ने एक बयान में इस समझौते के प्रमुख बिंदुओं की पुष्टि करते हुए कहा कि इससे दोनों देशों के बीच ‘रणनीतिक सहयोग’ और गहरा होगा।
यह इस दुश्मनी का सबसे संवेदनशील और खतरनाक हिस्सा है।
ताइवान मुद्दा: चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और बलपूर्वक विलय की धमकी देता रहता है। वहीं, अमेरिका ने ताइवान को $250 अरब के निवेश और सैन्य सुरक्षा का भरोसा दिया है, जिससे चीन बुरी तरह चिढ़ा हुआ है।
साउथ चाइना सी: चीन इस पूरे समुद्री क्षेत्र पर अपना दावा करता है, जबकि अमेरिका 'फ्रीडम ऑफ नेविगेशन' के नाम पर वहां अपने युद्धपोत भेजता रहता है।
आधुनिक युग में जो चिप (Semiconductors) पर नियंत्रण रखेगा, वही दुनिया पर राज करेगा।
चिप प्रतिबंध: अमेरिका ने चीन को उन्नत एआई (AI) चिप्स और उपकरण बेचने पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं ताकि चीन की सैन्य और तकनीकी प्रगति को रोका जा सके।
हुवावे और टिकटॉक: सुरक्षा और जासूसी के खतरों का हवाला देकर अमेरिका ने चीनी टेक कंपनियों पर नकेल कसी हुई है।
हाल के वर्षों में 'स्पाई बलून' (जासूसी गुब्बारे) और साइबर हमलों की घटनाओं ने दोनों देशों के बीच भरोसे को पूरी तरह खत्म कर दिया है। अमेरिका का दावा है कि चीन उसकी महत्वपूर्ण बुनियादी संरचनाओं (Power grids, Water systems) पर साइबर हमलों की फिराक में रहता है।