मोदी हैं कि मानते नहीं...ट्रंप 100% टैरिफ वाला बिल लाते रह गए, इधर जिगरी रूस से तेल के बाद अब क्या लाने की तैयारी में भारत?

By अभिनय आकाश | Aug 10, 2026

भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने की रणनीति और तेज कर दी है। खाड़ी देशों से ईंधन आपूर्ति बाधित होने के जोखिम को देखते हुए भारत एक तरफ रूस के 'आर्कटिक इलाके' से एलएनजी मंगाने और दूसरी तरफ वेनेजुएला के दो बड़े तेल ब्लॉकों का परिचालन अपने हाथ में लेने की तैयारी कर रहा है। रूस के उप-विदेश मंत्री आंद्रेई रुडेंको ने हाल ही में बताया है कि भारत आर्कटिक क्षेत्र में तेल-गैस विकास और नॉर्दर्न सी रूट में सहयोग बढ़ाने में गहरी रुचि दिखा रहा है। भारत और रूस के बीच 2029 तक सहयोग का कार्यक्रम तय है। दूसरी ओर, वेनेजुएला के नए कानून के तहत ओएनजीसी सैन क्रिस्टोबल और कारोबोबो 1 तेल ब्लॉकों के परिचालन नियंत्रण का समझौता करने जा रही है। अब तक वेनेजुएला से भारत को सीमित और सिर्फ पुराना फंसा लाभांश वसूलने के लिए ही कच्चा तेल मिल पा रहा था। नए प्रावधानों से ओएनजीसी को अमेरिकी पाबंदियों के कानूनी जोखिम के बिना सीधे कुओं के संचालन और नियमित तेल उत्पादन की पूरी छूट मिल गई है।

इसे भी पढ़ें: भारत बनेगा अगला सऊदी? 150 कुओं की खुदाई चालू कर रचने वाला है इतिहास

क्या इससे सच में गैस सस्ती हो सकती है?

हो सकता है, लेकिन यहाँ बारीक बातें मायने रखती हैं। रूसी गैस आने से सप्लायर्स के बीच कॉम्पिटिशन बढ़ सकता है और भारतीय खरीदारों को मोल-भाव करने की बेहतर ताकत मिल सकती है। अगर गैस सही कीमत पर मिलती है, तो नेचुरल गैस पर बहुत ज़्यादा निर्भर रहने वाले उद्योगों को फ़ायदा हो सकता है। इनमें फ़र्टिलाइज़र बनाने वाली कंपनियाँ, मैन्युफ़ैक्चरर्स, CNG ऑपरेटर्स और सिटी गैस नेटवर्क शामिल हो सकते हैं। लेकिन रूस के साथ डील का मतलब यह नहीं है कि भारतीय ग्राहकों के लिए गैस अपने-आप सस्ती हो जाएगी। फ़ाइनल कीमत कॉन्ट्रैक्ट, LNG की कीमतों, ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट, शिपिंग और इंश्योरेंस के साथ-साथ गैस को भारत लाने के लिए इस्तेमाल किए गए रूट पर निर्भर करेगी। दूसरे शब्दों में, रूसी गैस से मोल-भाव करने की भारत की स्थिति बेहतर हो सकती है, लेकिन सस्ती CNG या PNG की गारंटी नहीं है।

पश्चिम एशिया का संकट एक बड़ा सबक है

हाल की रुकावटों ने दिखाया है कि भारत क्यों अलग-अलग स्रोतों से सप्लाई पाने (डाइवर्सिफिकेशन) पर इतना ध्यान दे रहा है। सरकार का कहना है कि भारत अब लगभग 40 देशों से कच्चा तेल मंगाता है। पहले लगभग 55% कच्चा तेल 'स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़' के बाहर के रास्तों से आता था, लेकिन अब यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 70% हो गया है। नेचुरल गैस की सप्लाई में भी रुकावटें आई हैं। भारत ने पहले ही दूसरे सप्लायर्स और रास्तों का रुख किया है और नए स्रोतों से LNG कार्गो हासिल किए हैं। सरकार ने घरेलू PNG और CNG जैसे सेक्टरों को सप्लाई देने को प्राथमिकता दी है, जबकि कुछ इंडस्ट्रियल यूज़र्स के लिए सप्लाई कम कर दी है। इस अनुभव से गैस के लिए एक से ज़्यादा बड़े स्रोत होने की बात और मज़बूत होती है।

रूस से खरीदारी में अपने जोखिम हैं

यहीं पर भारत की एनर्जी स्ट्रैटेजी मुश्किल हो जाती है। रूसी एनर्जी पर ज़्यादा निर्भरता से भारतीय खरीदारों पर पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों और दूसरी जियोपॉलिटिकल पाबंदियों का असर पड़ सकता है। 7 अगस्त को अमेरिकी सीनेट ने दोनों पार्टियों के समर्थन वाला एक बिल पास किया। इससे रूसी तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लग सकता है, जिससे भारत और चीन जैसे बड़े खरीदार मुश्किल में पड़ सकते हैं। 86-11 वोटों से पास हुए इस कानून का नाम रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ओ. ग्राहम के सम्मान में 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ़ 2026' रखा गया है। अब यह बिल अमेरिकी हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव्स में जाएगा, जिसकी बैठक 31 अगस्त को फिर से शुरू होगी। भारत का मकसद डाइवर्सिफिकेशन है। रूस पर बहुत ज़्यादा निर्भर होने से उसी स्ट्रैटेजी को नुकसान पहुँचेगा।

प्रमुख खबरें

REI Expo 2026 से जैव ऊर्जा क्षेत्र में ₹2,800 करोड़ से ज्यादा के निवेश की उम्मीद: IBA

West Bengal: चुनाव हारने के बाद SIR पर अफवाह फैला रहा विपक्ष, Suvendu Adhikari का आरोप

LPU Protest Updates: एलपीयू में बवाल के बाद FIR और SIT, पांच छात्र भी जांच टीम में शामिल

Pitru Paksha में वर्जित सब्जियों के इस्तेमाल से लग सकता है पितृ दोष, सात्विक रखें थाली