Explained- US Visa Fee Hike | ट्रंप प्रशासन का H-1B वीज़ा फ़ीस $1,00,000 करने का प्रस्ताव: भारतीय पेशेवरों पर क्या होगा असर?

By रेनू तिवारी | Aug 25, 2026

ट्रंप प्रशासन ने नए H-1B वीज़ा के लिए 1,03,265 डॉलर (लगभग 95.71 लाख रुपये) की भारी शुल्क बढ़ोतरी को स्थायी बनाने का प्रस्ताव रखा है। यह फैसला अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेशी कर्मचारियों की हायरिंग को बेहद खर्चीला बना सकता है, जिसका सबसे बड़ा झटका भारतीय आईटी पेशेवरों और कंपनियों को लगने की संभावना है। अमेरिकी होमलैंड सिक्योरिटी विभाग ने नए H-1B वीज़ा के लिए 1,03,265 डॉलर की फ़ीस का प्रस्ताव दिया है। यह प्रस्ताव राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पिछले साल शुरू की गई 1,00,000 डॉलर की फ़ीस के बाद आया है, जिसे एक फ़ेडरल जज ने रोक दिया था और जो अभी भी कानूनी चुनौतियों में फंसी हुई है।

नए नियम पर अब 30 दिनों तक जनता की राय ली जाएगी और साल के अंत तक इसे अंतिम रूप दिया जा सकता है।

H-1B प्रोग्राम अमेरिकी कंपनियों को टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, शिक्षा और रिसर्च जैसे खास क्षेत्रों में विदेशी वर्करों को हायर करने की अनुमति देता है। अमेरिका हर साल 65,000 रेगुलर H-1B वीज़ा जारी करता है, साथ ही एडवांस्ड डिग्री वाले वर्करों के लिए अतिरिक्त 20,000 वीज़ा भी जारी करता है।

भारतीय पेशेवरों पर इसका सबसे ज़्यादा असर पड़ने की संभावना है। AFP के आधिकारिक डेटा से पता चलता है कि वित्त वर्ष 2025 में H-1B वर्करों में भारतीयों की हिस्सेदारी लगभग 70% थी, इसके बाद चीनी नागरिकों की हिस्सेदारी 12% थी।

हालांकि, प्रस्तावित फ़ीस उन विदेशी नागरिकों पर लागू नहीं होगी जो पहले से ही स्टूडेंट वीज़ा पर अमेरिका में हैं, या मौजूदा H-1B वीज़ा के रिन्यूअल पर भी लागू नहीं होगी। फिर भी, इस फ़ीस की वजह से अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेशों से सीधे कुशल भारतीय वर्करों को हायर करना काफ़ी महंगा हो सकता है।

ट्रंप के पिछले आदेश से पहले, H-1B से जुड़ी फ़ीस आम तौर पर 2,000 डॉलर से 5,000 डॉलर के बीच होती थी। इसलिए, प्रस्तावित 1,03,265 डॉलर का शुल्क एक बहुत बड़ी बढ़ोतरी होगी। ट्रंप का कहना है कि H-1B सिस्टम में सुधार की ज़रूरत है

प्रशासन का तर्क है कि H-1B प्रोग्राम का गलत इस्तेमाल उन कंपनियों ने किया है जो अमेरिकी कर्मचारियों की जगह सस्ते विदेशी कर्मचारियों को रखना चाहती हैं। नए प्रस्ताव के अनुसार, ज़्यादा फ़ीस की वजह से एम्प्लॉयर H-1B कर्मचारियों को चुनने के बजाय योग्य अमेरिकी उम्मीदवारों को चुनना पसंद कर सकते हैं।

हालांकि, बिज़नेस ग्रुप्स का तर्क है कि यह प्रोग्राम अमेरिकी कंपनियों को कर्मचारियों की कमी को पूरा करने और दुनिया भर से बहुत कुशल पेशेवरों को काम पर रखने में मदद करता है।

प्रस्तावित फ़ीस को आगे भी कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। जून में एक फ़ेडरल जज ने पहले लगाए गए 1,00,000 डॉलर के चार्ज पर रोक लगा दी थी और कहा था कि प्रशासन ने अपनी अधिकार-सीमा से बाहर जाकर यह फ़ैसला लिया है। इस फ़ीस को लेकर अन्य कानूनी मामले अभी भी चल रहे हैं।

ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह चार्ज कोई टैक्स नहीं है और विदेशी नागरिकों के प्रवेश को सीमित करने का राष्ट्रपति का अधिकार इसके दायरे में आता है।

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