वर्षों तक भारत पर लगाया दांव, अब चीन के धुन पर नाचने पर अचानक क्यों मजबूर हुआ अमेरिका, ट्रंप के डबलगेम ने कैसे बढ़ाई दिल्ली की टेंशन?

By अभिनय आकाश | May 14, 2026

21 फरवरी 1972 का दिन अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और चीन के संस्थापक माओ से तुंग बीजिंग में हाथ मिलाते, मुस्कुराते नजर आए थे। अमेरिका से पहली बार कोई राष्ट्रपति चीन पहुंचा था और चीन से दोस्ती का हाथ बढ़ाने का ही मकसद था। चीन ने भी निक्सन का खूब स्वागत किया और पहली बार चीन और अमेरिका में फिर से दोस्ती हुई। ये एक बड़ा उदाहरण था और दुनिया को ये सबक मिला की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थाई दोस्त नहीं होता, स्थाई दुश्मन नहीं होता। अमेरिका और चीन दशकों तक एक दूसरे के खिलाफ खड़े रहे थे। कोरिया वॉर में दोनों अप्रत्यक्ष रूप से आमने-सामने भी आए थे। अमेरिका ताइवान को असली चीन मानता था और चीन की कम्युनिस्ट सरकार को अपने लिए खतरा बताता था। लेकिन हर बीतते साल के साथ ये साफ होता गया कि असली चीन तो वही है जहां माओ का राज था और इस चीन की अमेरिका को बहुत जरूरत थी। दरअसल, उसे सोवियत संघ से मुकाबला करना था और इसी मकसद के लिए निक्सन 1972 में बीजिंग गए थे। चीन भी ये जानता था कि सोवियत संघ ये दोस्ती कहां तक निभाएगा। सोवियत ने पहले न्यूक्लियर बम बनाने का चीन को वादा किया था। लेकिन बीच में ही चीन को छोड़ दिया। फिर चीन को अकेले ही बम बनाना पड़ा। चीन और अमेरिका दोनों देश अपने पुराने मतभेंदो को कुछ समय के लिए पीछे छोड़ दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं। इस मुलाकात ने आने वाले दशकों में दुनिया की दिशा और दशा इसी गुंजाइश के चलते तय की। लेकिन उस वक्त शायदकिसी ने नहीं सोचा कि अमेरिका और चीन आने वाले सालों में केवल पार्टनर नहीं बनेंगे बल्कि एक दूसरे की अर्थव्यवस्था में इतने घुस जाएंगे कि दोनों चाहकर भी एक दूसरे से अलग नहीं हो पाएंगे। आज 50 साल बाद इतिहास फिर उसी मोड़ पर खड़ा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार लड़ाई साम्यवाद और पूंजीवाद की नहीं बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था और टेक्नोलॉजी पर नियंत्रण की है। सितंबर 2016 में बराक ओबामा चीन गए थे और अब मई 2026 में ट्रंप आए हैं। 

‘5 बी’ और ‘3 टी’

अमेरिका का पूरा ध्यान अंग्रेजी के 'B' अक्षर से शुरू होने वाले पांच मोर्चों पर टिका है: बोइंग विमान, बीफ, बीन्स यानी सोयाबीन, बोर्ड ऑफ ट्रेड (व्यापार बोर्ड) और बोर्ड ऑफ इन्वेस्टमेंट (निवेश बोर्ड)। अमेरिका की मंशा बिल्कुल साफ है। वह सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी संवेदनशील और अहम तकनीकों को विवादों से बचाकर रखना चाहता है, जबकि बाकी सामान्य व्यापार को पटरी पर लाना चाहता है। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि चीन के मौजूदा आर्थिक ढांचे से निपटने के लिए पुराने नियम अब नाकाफी हैं, इसलिए वे अब सीधे और बराबरी के सौदों पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, चीन का सारा जोर 'T' अक्षर वाले तीन मुख्य मुद्दों पर है: ताइवान,टैरिफ यानी आयात शुल्क और टेक्नोलॉजी। चीन की कोशिश है कि अमेरिका द्वारा उस पर लगाए गए तकनीकी और निवेश प्रतिबंधों में ढील दी जाए और दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनातनी पर लंबे समय के लिए विराम लगे। दरअसल, अमेरिका की सख्त पाबंदियों ने चीन को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनने की राह पर तेजी से धकेल दिया है। इस वक्त चीन की आर्थिक रफ्तार भी कुछ धीमी पड़ी है, जिससे वहां की सरकार पर बाहरी व्यापार को सुधारने का भारी दबाव है। ऐसे में, दुनिया भर में बदलते हालातों के बीच चीन की यह भी कोशिश है कि उसकी इलेक्ट्रिक कारों और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े अन्य उत्पादों के लिए वैश्विक बाजारों के दरवाज़े पूरी तरह से खुल जाएं।

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एआई, सेमीकंडक्टर और नया बैटलग्राउंड

यदि कभी व्यापार और शुल्क अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता की पहचान थे, तो अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उन्नत सेमीकंडक्टर रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के मुख्य युद्धक्षेत्र बन गए हैं। शिखर सम्मेलन में तेजी से शक्तिशाली हो रहे अत्याधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों से उत्पन्न जोखिमों पर पहली बार गंभीर उच्च-स्तरीय चर्चा भी हो सकती है। यह उन कुछ क्षेत्रों में से एक है जहां वाशिंगटन और बीजिंग बढ़ते अविश्वास के बावजूद सीमित सहयोग की आवश्यकता को समझते हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस संबंधों में एक और बड़ी दरार बनकर उभरी है। एंथ्रोपिक के "क्लाउड मिथोस प्रीव्यू" एक हाइटेक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रणाली जो सॉफ्टवेयर कमजोरियों की स्वायत्त रूप से पहचान करने और जटिल साइबर ऑपरेशन करने में सक्षम है। इसके जारी होने से तेजी से शक्तिशाली हो रहे कृत्रिम बुद्धिमत्ता एजेंटों से उत्पन्न जोखिमों को लेकर वैश्विक चिंताएं बढ़ गई हैं। हालांकि दोनों पक्षों ने एआई की सुरक्षा और दुरुपयोग पर संवाद स्थापित करने में सीमित तत्परता दिखाई है, फिर भी गहरा अविश्वास सहयोग पर हावी है। यह अविश्वास चीन के हालिया फैसले में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जिसमें उसने चीनी मूल की एआई स्टार्टअप कंपनी मैनस के मेटा द्वारा 2 अरब डॉलर के अधिग्रहण को रोक दिया, जो बीजिंग के अग्रणी एआई प्रतिभा और बौद्धिक संपदा को अपने रणनीतिक पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर बनाए रखने के दृढ़ संकल्प का संकेत देता है। इस प्रकरण ने इस बात पर ज़ोर दिया कि तकनीकी प्रतिस्पर्धा अब हार्डवेयर तक पहुंच से हटकर प्रतिभा, डेटा और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र पर नियंत्रण की ओर बढ़ रही है। इन घटनाक्रमों से दोनों पक्षों के बीच शत्रुतापूर्ण धारणाएं और भी प्रबल होने की संभावना है, जिससे अंतर्निहित "कबीले का प्रभाव" और भी स्पष्ट हो जाएगा।

दोनों को एक दूसरे की जरूरत

अपने पहले कार्यकाल में ही उन्होंने चीन से होने वाले आयात पर टैरिफ की घोषणा की थी। दूसरे टर्म में वह इस लड़ाई को और आगे ले गए और 125% तक टैरिफ जड़ दिया। हालांकि रेयर अर्थ मिनरल्स पर चीनी नियंत्रण की वजह से आखिरकार ट्रंप को समझौता करना पड़ा था।  टैरिफ वॉर भले थम गई हो, पर अमेरिका और चीन के बीच की होड़ कायम है। दोनों एक-दूसरे पर दबाव बनाने की कोशिश करते हैं, पर इतना नहीं जिससे बात ज्यादा बिगड़े। ईरान युद्ध के दौरान भी यह देखने को मिला है। ईरान की मदद के आरोप में अमेरिका ने कुछ चीनी कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई की, जबकि चीन ने वॉशिंगटन की नीतियों का विरोध किया, पर सब नियंत्रण में। इसकी वजह है आपसी निर्भरता और जरूरत। चीन के लिए अमेरिका आज भी सबसे बड़ा बाजार है। हालांकि इस साल चीनी निर्यात में करीब 10% की कमी आई है। चीन की निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था के लिए यह झटका है। खाड़ी देशों में भी उसका निर्यात घटा है। तेहरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार होने के नाते भी उसकी परेशानी बढ़ रही है। वह चाहता है कि युद्ध जल्दी थमे। दूसरी ओर, ट्रंप को ईरान पर समर्थन और निवेश के लिए चीन चाहिए। इसीलिए वह अपने साथ कई बड़े उद्यमियों को लेकर पहुंचे हैं।

भारत के लिए संतुलन की चुनौती

भारत हाल के वर्षों में अमेरिका भारत का अहम रणनीतिक साझेदार बनकर उभरा है। दूसरी ओर चीन भारत का अहम पड़ोसी देश है, जिसके साथ सीमा विवाद के बाद रिश्ते व्यवहारिक समझ पर वापस लौट रहे हैं। ऐसे में दोनों देशों के आपसी संबंध और इस दौरे के निष्कर्ष भी भारत पर असर डालेगा। अमेरिका और चीन के रिश्ते एक लंबे वक्त तक असहजता के दायरे में रहे, जिसके जियोपॉलिटिकल प्रभाव से भारत भी अछूता नहीं रहा है। बीजिंग में चल रही बातचीत का तुरंत नतीजा चाहे जो हो। भारत के कूटनीतिक और विदेश नीति के विशेषज्ञ इन घटनाक्रमों पर पैनी नज़र है। अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय तक चलने वाली इस गहरी खींचतान से, पहले से ही उलझी और बंटी हुई वैश्विक व्यवस्था पर दबाव और ज्यादा बढ़ जाएगा। जैसे-जैसे दुनिया भर के व्यापार, तकनीक और कूटनीतिक रिश्ते दो अलग-अलग खेमों में बंटते जा रहे हैं, भारत की 'मल्टी-अलाइनमेंट' (यानी किसी एक गुट में न बंधकर, सभी देशों के साथ संतुलन बनाकर चलने की) नीति की असली परीक्षा होगी। आने वाले समय में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह किसी एक महाशक्ति या शक्तिशाली गुट पर पूरी तरह निर्भर हुए बिना, अपनी रणनीतिक आज़ादी को कैसे बरकरार रखता है। साथ ही, उसे अपने राष्ट्रीय हितों और अलग-अलग मुद्दों के हिसाब से अन्य देशों के साथ मिलकर चलने का यह नाजुक संतुलन भी साधे रखना होगा।

ट्रंप के धोखे से बढ़ेगी दिल्ली की टेंशन?

अमेरिका ने हलिया वर्षों में चीन को अपने सबसे प्रमुख प्रतिद्वंद्वी की तरह देखा है और भारत को बीजिंग को संतुलित करने के लिए आगे बढ़ाने की कोशिश की है लेकिन अब से स्थिति बदल सकती है। यह स्थिति भारत के लिए एक इम्तिहान की तरह हो सकती है। बीते दो दशको से अमेरिका ने भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के मुकाबले के लिए एक संतुलन बनाने वाले देश के तौर पर देखा है। हालांकि मौजूदा ट्रंप प्रशासन का रवैया बीजिंग के पक्ष में और भारत को नुकसान पहुंचाने जैसा है। ऐसे में अमेरिका-चीन शिखर सम्मेलन की खासतौर से नई दिल्ली के लिए अहमियत है। भारत की चिंता होगी कि चीन को अमेरिका एशिया में केंद्रीय रणनीतिक चुनौती के बजाय वार्ताकार साझेदार के तौर पर देख सकता है। भारत नहीं चाहेगा कि अमेरिका क्षेत्र में उसकी रणनीतिक अहमियत को नजरअंदाज करे।

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