Prabhasakshi NewsRoom: Trump की 'कभी दोस्ती कभी दबाव' वाली नीति नहीं छोड़ पा रही प्रभाव, मोदी की कूटनीति के आगे US की सारी चालें बेअसर

By नीरज कुमार दुबे | Sep 10, 2025

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बयानबाज़ी और व्यवहार के बीच का अंतर कोई नई बात नहीं है। परंतु अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे एक कला का रूप दे दिया है। दो खबरें इसका ताज़ा उदाहरण हैं। एक ओर ट्रंप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “मित्र” बताते हुए भारत-अमेरिका संबंधों को “असीम संभावनाओं वाला साझेदारी” करार देते हैं और व्यापार वार्ताओं के शीघ्र व सफल निष्कर्ष का भरोसा दिलाते हैं। दूसरी ओर वह यूरोपियन यूनियन से आग्रह करते हैं कि वह भारत और चीन पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाए ताकि रूस को आर्थिक रूप से पंगु बनाया जा सके। यह विरोधाभास महज़ शब्दों का खेल नहीं है, बल्कि ट्रंप की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।

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इसके अलावा, ट्रंप की कूटनीति में विरोधाभास दरअसल उनकी “डील-मेकिंग” शैली का हिस्सा है। वे मित्रवत भाषा बोलकर विश्वास का माहौल रचते हैं और साथ ही दंडात्मक कदमों की धमकी देकर अपने पक्ष को मज़बूत करते हैं। भारत को “स्वाभाविक साझेदार” बताने और 100 प्रतिशत टैरिफ की धमकी देने के बीच यही संतुलन दिखाई देता है। उनका लक्ष्य भारत को यह अहसास कराना है कि यदि वह अमेरिकी शर्तों के अनुरूप नहीं चला तो आर्थिक कीमत चुकानी पड़ेगी।

यूरोपियन यूनियन के सामने दुविधा की बात करें तो सवाल यह है कि क्या यूरोपियन यूनियन ट्रंप की सलाह मानकर भारत पर टैरिफ लगाएगा? देखा जाये तो इसका उत्तर लगभग नकारात्मक है। हम आपको बता दें कि यूरोप और भारत इस साल के अंत तक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर पहुँचना चाहते हैं। यूरोप अपने उद्योगों और निवेशकों के लिए भारत जैसा बड़ा और तेज़ी से बढ़ता बाज़ार गंवाने का जोखिम नहीं उठा सकता। दरअसल, यूक्रेन युद्ध ने यूरोप को एक सबक दिया है कि एकतरफा निर्भरता खतरनाक है। अब वह एशिया में अपने साझेदारों को संतुलित करना चाहता है। इस दृष्टि से भारत उसके लिए एक महत्वपूर्ण धुरी है।

इसके अलावा, यूरोपीय नेतृत्व भलीभाँति जानता है कि ट्रंप के बयानों में निरंतरता नहीं है। कल जो “बहुत अच्छे मित्र” हैं, वे आज “सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी” भी बन सकते हैं। ऐसे में उनकी सलाह पर जल्दबाज़ी में कदम उठाना यूरोप की अपनी दीर्घकालिक रणनीति के विरुद्ध होगा।

देखा जाये तो ट्रंप की राजनीति दोहरे संदेशों पर आधारित है— एक ओर मधुर वाक्य, दूसरी ओर कठोर धमकियाँ। यह शैली उन्हें घरेलू राजनीति में लाभ पहुँचाती है, परंतु अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनकी विश्वसनीयता को संदेहास्पद बना देती है। यूरोपियन यूनियन इस हकीकत से परिचित है। रूस के विरुद्ध उसकी नाराज़गी सही है, परंतु भारत के साथ उसके बढ़ते आर्थिक रिश्ते कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। अतः यह मान लेना कठिन है कि यूरोप, ट्रंप की सलाह मानकर भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाएगा। इसलिए अधिक संभावना यही है कि वह अपनी स्वतंत्र नीति पर कायम रहते हुए भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौते की दिशा में आगे बढ़ेगा।

दूसरी ओर, भारत के लिए यह अवसर है कि वह इस परिदृश्य का लाभ उठाए और यूरोप के साथ अपने आर्थिक संबंधों को मज़बूती दे। साथ ही अमेरिका के साथ संवाद बनाए रखते हुए भारत को ट्रंप की “दोस्ती और दबाव” की राजनीति को एक संतुलित दृष्टिकोण से देखना होगा। प्रधानमंत्री मोदी इस स्थिति को सही तरह से समझ भी रहे हैं। मोदी भलीभांति जानते हैं कि ट्रंप के बयानों में निरंतरता नहीं होती और अक्सर उनका उद्देश्य केवल वार्ता की मेज़ पर दबाव बनाना होता है। इसलिए मोदी ने ट्रंप के बयानों पर हमेशा भावनात्मक प्रतिक्रिया देने की बजाय धैर्य और संयम की नीति अपनाई है। मोदी की रणनीति यह है कि अमेरिका से रिश्तों को बिगाड़े बिना, भारत के दीर्घकालिक आर्थिक और कूटनीतिक हितों की रक्षा की जाए। यही कारण है कि उन्होंने सार्वजनिक मंच से यह संदेश दिया कि भारत-अमेरिका वार्ताएँ “असीम संभावनाओं” का मार्ग खोलेंगी और वे जल्द ही सफल निष्कर्ष तक पहुँचेंगी। साथ ही मोदी ने हमेशा ट्रंप के आक्रामक रुख को नज़रअंदाज़ कर भविष्य की साझेदारी पर ध्यान केंद्रित किया है।

बहरहाल, यह रणनीतिक धैर्य ही मोदी की कूटनीति की सबसे बड़ी ताक़त है। वह जानते हैं कि वैश्विक राजनीति में गठबंधनों और साझेदारियों का मूल्य केवल शब्दों से नहीं, बल्कि लंबे समय तक निभाए गए व्यवहार से तय होता है। ट्रंप भले ही दबाव डालें, पर भारत जैसे उभरते बाज़ार और रणनीतिक साझेदार पर अमेरिका अंततः कठोर कदम उठाने से बचेगा। मोदी की कूटनीति तर्क और संयम से चाल चलती है और यही नीति भारत को आने वाले समय में अधिक मज़बूत स्थिति में खड़ा करेगी।

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