Prajatantra: यूं ही नहीं बढ़ा TS Singh Deo का मान, Chhattisgarh को लेकर Congress की यह है रणनीति

By अंकित सिंह | Jun 29, 2023

देश के तीन अहम राज्यों में साल के आखिर में विधानसभा के चुनाव होने हैं। यह तीन राज्य मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान है। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है। दोनों ही राज्यों में कांग्रेस ने अपनी सत्ता की वापसी के लिए अभी से रणनीति बनाने की शुरुआत कर दी है। इसी कड़ी में कांग्रेस ने बड़ा निर्णय लेते हुए इस बात का ऐलान किया कि टीएस सिंह देव छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री होंगे। चुनावो में जब कुछ महीने का ही वक्त बचा है तो पार्टी ने यह फैसला लिया है। कांग्रेस के इस ऐलान के पीछे कई बड़ी रणनीति है। साथ ही साथ पार्टी कार्यकर्ताओं को एकजुटता का संदेश भी देने की कोशिश की गई है। बुधवार को कांग्रेस की ओर से छत्तीसगढ़ को लेकर एक बड़ी बैठक आयोजित की गई थी। इस बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, छत्तीसगढ़ प्रभारी कुमारी शैलजा, भूपेश बघेल और टीएस सिंह देव भी शामिल हुए थे। 

 

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डैमेज कंट्रोल की है कोशिश

हमारे देश में एक पुरानी कहावत है। आग लगने से पहले पानी का इंतजाम कर लो। शायद टीएस सिंह देव को उपमुख्यमंत्री बनाकर कांग्रेस ने यही करने की कोशिश की है। स्पष्ट शब्दों में कहें तो कांग्रेस की यह डैमेज कंट्रोल है। पार्टी को लगता है कि इससे राज्य में गुटबाजी और नाराजगी खत्म हो जाएगी। दरअसल, टीएस सिंह देव को छत्तीसगढ़ में मजबूत जनाधार वाले नेता माना जाता है। वे पार्टी के पुराने कार्यकर्ता भी रहे हैं। टीएस सिंह देव के समर्थक लगातार उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की मांग करते रहे हैं। 


लागू नहीं हो सका ढाई-ढाई साल वाला फार्मूला

सूत्रों की मानें तो जब छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने 2018 में चुनाव जीता था। तब मुख्यमंत्री पद के दो प्रमुख दावेदार थे। एक ओर भूपेश बघेल तो दूसरी ओर टीएस सिंह देव थे। दावा किया जाता है कि दोनों के समक्ष शीर्ष नेतृत्व ने ढाई-ढाई साल का प्रस्ताव रखा था और इस पर दोनों सहमत हो गए थे। लेकिन भूपेश बघेल के ढाई साल के कार्यकाल पूरा होने के बाद भी छत्तीसगढ़ में सत्ता में कोई बदलाव नहीं हुआ। ऐसे में टीएस सिंह देव खेमे में नाराजगी लगातार बढ़ती रही। यह नाराजगी कई बार खुलकर मीडिया के सामने भी आई है। खबर यह भी रही है कि कई राजनीतिक दल टीएस सिंह देव से लगातार संपर्क साधने की कोशिश में थे। फिलहाल टीएस सिंह देव की ओर से यह दावा किया जा रहा है कि उन्होंने कभी भी ढाई-ढाई साल वाला मुख्यमंत्री फार्मूले पर बात नहीं की और यह बातें मीडिया द्वारा बनाई गई है। 


सामने आई थी टीएस सिंह देव की नाराजगी

टीएस सिंह देव लगातार आक्रामक रुख अपनाए हुए थे। उन्होंने ग्रामीण विकास मंत्रालय से इस्तीफा दे दिया था। इसके साथ ही उन्होंने चौकाने वाला बयान देते हुए साफ तौर पर कहा था कि 2023 का विधानसभा चुनाव वह नहीं लड़ेंगे। इसको लेकर भी कांग्रेस के भीतर हलचल मची हुई थी। छत्तीसगढ़ के स्थानीय पत्रकार यह भी दावा करते हैं कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा हाशिए पर धकेले गए टीएस सिंहदेव अपनी सरकार के खिलाफ कई बार मोर्चा खोल चुके थे। इतना ही नहीं, सचिन पायलट के नाराजगी के बीच टीएस सिंह देव ने यह भी कह दिया था कि जब आलाकमान की ओर से किए हुए वादे पूरे नहीं होते तो दुख होता है। 


यूं ही नहीं बने उपमुख्यमंत्री

टीएस सिंह देव अंबिकापुर के विधायक हैं। छत्तीसगढ़ के उत्तरी हिस्से सरगुजा में उनकी पकड़ बेहद मजबूत है। टीएस सिंह देव शाही परिवार से आते हैं। आलाकमान के भरोसेमंद भी माने जाते हैं। सरगुजा संभाग में 6 जिले हैं जहां 14 सीटों पर टीएस सिंह देव का सीधा असर माना जाता है। इसे सत्ता की चाबी भी कहा जाता है। 2018 के चुनाव में यहां से कांग्रेस को भरपूर जीत मिली थी। इसके अलावा टीएस सिंह देव के भाजपा में भी शामिल होने की अटकलें थी। टीएस सिंह देव ने कहा था कि उन्हें भाजपा में शामिल होने के प्रस्ताव मिले हैं। टीएस सिंह देव 2013 में छत्तीसगढ़ विधानसभा में पार्टी की हार के बाद विधायक दल के नेता बने थे। 2018 में पार्टी को सत्ता में लाने में उनकी भूमिका अहम रही थी। 


एक तीर से कई निशान

टीएस सिंह देव को उपमुख्यमंत्री बनाकर कांग्रेस ने एक तीर से कई निशाने साध लिए है। कांग्रेस को इस बात की उम्मीद है कि इससे पार्टी के भीतर की गुटबाजी खत्म होगी। चुनाव से पहले पंजाब में और अभी राजस्थान में जिस तरीके से पार्टी के भीतर घमासान मचा हुआ है, वैसा छत्तीसगढ़ में नहीं होगा। साथ ही साथ जनता के बीच ही एकजुटता का संदेश जाएगा। जिस तरीके से कर्नाटक में कांग्रेस ने सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार को एक साथ लाकर चुनाव में जीत हासिल की थी, वैसा ही कुछ छत्तीसगढ़ में हो सकता है। वैसे भाजपा नेता रमन सिंह ने इसको लेकर एक शायराना तंज कसा है। डूबने लगी कश्ती तो कप्तान ने कुछ यूँ किया, सौंप दी है पतवार आधी दूसरे के हाथ में। बाक़ी 4 महीने के लिए महाराज जी को बधाई।

 

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राजनीति में परिस्थितियों और पात्रता के हिसाब से राजनीतिक दल अपने फैसले लेते रहते हैं। चुनावी दांव पेच में खुद की पकड़ को मजबूत करने के लिए कांग्रेस की ओर से यह कदम उठाया गया है। लेकिन जनता सब कुछ जानती और समझती है। देखना दिलचस्प होगा कि इससे कांग्रेस को कितना फायदा होता है क्योंकि अंतिम फैसला तो जनता के हाथ में ही होता है। यही तो प्रजातंत्र है। 

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