उद्धव ठाकरे का प्रकरण 1995 में NTR के खिलाफ हुए विद्रोह की दिलाता है याद, होटल वायसराय में ठहरे बागी विधायकों की संख्या बढ़ती गई, और फिर...

By अभिनय आकाश | Jun 25, 2022

परिवार द्वारा संचालित पार्टी में विभाजन होता है और अतिहास में इसके कई उदाहरण भी मौजूं हैं। मुलायम सिंह यादव-अखिलेश यादव, प्रकाश सिंह बादल, लालू प्रसाद, एम करुणानिधि और कई अन्य क्षेत्रीय दलों को विद्रोह और तख्तापलट के प्रयासों का सामना करना पड़ा लेकिन इनमें से कई इसे दबाने में कामयाब रहे तो कितनों का हाल ऐसा भी रहा जैसा इन दिनों बाला साहेब की विरासत और पार्टी संभाल रहे उद्धव ठाकरे को झेलना पड़ रहा है। हालांकि, उद्धव ठाकरे की कहानी 1995 में मेगास्टार एनटी रामा राव की कहानी के समान दिखती प्रतीत होती है। जिस एन टी रामा राव ने टीडीपी को खड़ा किया था, चंद्रबाबू नायडू ने न सिर्फ उन्हें सरकार के प्रमुख के तौर पर बेदखल कर दिया, बल्कि पार्टी से भी निकाल दिया। 

होटल में एनटीआर को नहीं मिला कमरा तो बन गए राजनेता 

ये 80 के दशक के शुरुआती दिनों की बात है। तेलगू फिल्मों के जाने माने अभिनेता नंदमूरी तारक रामाराव यानी एनटी रामाराव आंध्र प्रदेश के छोटे से शहर नेल्लौड़ के दौरे पर थे। छोटा शहर होने की वजह से वहां होटलों की कमी थी। जब वे वहाम पहुंचे तो पता चला कि सारे कमरे बुक हैं। एक कमरा जो खाली था वो राज्य के किसी मंत्री के नाम पर बुक था। लेकिन रामा राव के कद और रुतबे को देखते हुए होल के केयरटेकर ने उन्हें कुछ घंटे के लिए कमरे के इस्तेमाल की इजाजत दे दी। रामाराव कमरे में प्रवेश कर नहाने चले गए। इतने में मंत्री साहब की होटल में एंट्री हो गई। कमरे में किसी और को देख मंत्री ने होटल के केयर टेकर को जमकर खड़ी खोटी सुनाई। जिसके बाद एनटीआर को सर्किट हाउस का कमरा खाली करना पड़ा। इस घटना ने रामाराव को अंदर तक झकझोड़ दिया। सारी बात एनटाआर ने अपने दोस्त को बताई तो उनके दोस्त ने कहा कि भले ही तुम कितनी भी दौलत और शोहरत हासिल कर लो, लेकिन असली पॉवर तो नेताओं के पास ही होती है। ये बात सुनने के बाद रामा राव ने तय कर लिया कि वो अपनी राजनीतिक पार्टी बनाएंगे। 

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एनटीआर ने बनाई नई पार्टी 

ये 1982 की बात है 29 मार्च को हैदराबाद में उन्होंने तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) की शुरुआत की। उनका फिल्मी करियर समाप्त हो गया था और वह पूरी तरह से राजनीति में आ चुके थे। पार्टी खड़ी करने के महज 9 महीने के अंदर रामाराव ने 2 तिहाई बहुमत हासिल कर लिया। कहा जाने लगा कि आंध्र प्रदेश की जनता का मिजाज भी अब तमिलनाडु की तरह फिल्म स्टार के ग्लैमर से प्रभावित होने लगा है। 1983 में वह पहली बार आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और लगातार तीन बार कुर्सी पर काबिज रहे। 1985 में उनकी पहली पत्नी का कैंसर से निधन हो गया और फिर उनकी जिंदगी में आईं लक्ष्मी पार्वती। उनकी मुलाकात एन टी रामा राव से उनकी जीवनी लिखने के सिलसिले में हुई थी और फिर देखते ही देखते दोनों में प्यार हो गया और बात शादी तक जा पहुंची। इसके बाद 1993 में 38 साल की लक्ष्मी पार्वती और 70 साल से अधिक की उम्र के एन टी रामा राव ने शादी कर ली और यहीं से शुरू हो गई रामा राव परिवार में उथल-पुथल।

चंद्रबाबू ने विरोधी गुट का किया नेतृत्व 

जैसे-जैसे लक्ष्मी का पार्टी में दखल बढ़ना शुरू हुआ, उनको 'अम्मा' कहने वाले पार्टी के विधायक और सांसद भी उनके ही खिलाफ खड़े हो गए। जहां एक ओर रामा राव हमेशा अपनी पत्नी लक्ष्मी पार्वती के साथ खड़े रहते थे, वहीं उनके बेटे, बेटी और दामाद ने बगावत कर दी। इस बगावत की अगुवाई की थी चंद्रबाबू नायडू ने, जो उस दौरान रामा राव सरकार में मंत्री थे। शिवसेना के मामले में महाराष्ट्र के पीडब्ल्यूडी और शहरी विकास मंत्री एकनाथ शिंदे और कभी उद्धव ठाकरे के करीबी सहयोगी, विद्रोही खेमे का नेतृत्व कर रहे हैं।  

विधायक जुड़ते गए और कारवां बढ़ता गए

शिवसेना में बगावत 20 जून को शुरू हुई। जब एकनाथ ने शिंदे ने दावा किया कि उन्हें शिवसेना के 11 विधायकों का समर्थन हासिल है, हालांकि अब यह संख्या 50 से ज्यादा हो गई है। शिंदे गुट की तरउ से नई पार्टी शिवसेना बाला साहेब बनाने के दावे भी किए जा रहे हैं। वहीं आंध्र प्रदेश में भी कुछ ऐसा ही वाक्या देखने को मिला था। सियासी विद्रोह 23 अगस्त 1995 को शुरू हुआ था। इस दौरान बागी विधायकों को होटल वायसराय में ठहराया गया था और बाद में इनकी संख्या बढ़ती गई। तब हालात ऐसे थे कि कुल 214 विधायकों में से मुश्किल से दो दर्जन विधायक ही एन टी रामा राव के साथ थे। आखिरकार एन टी रामा राव ने अपने परिवार से सार्वजनिक रूप से सारे संबंध तोड़ लिए और चंद्रबाबू नायडू को 'पीठ में छुरा घोंपने वाला धोखेबाज' और 'औरंगजेब' कहने लगे।

 पार्टी को बचाने के लिए चंद्रबाबू ने की बगावत?

वर्तमान दौर में एकनाथ शिंदे और उनके समर्थक विधायकों की तरफ से शिवसेना को कांग्रेस और एनसीपी के सामने बंधक होने की बात कही जा रही है। एकनाथ शिंदे का कहना है कि पार्टी को बालासाहेब ठाकरे के आदर्शों पर वापस ले जाने के लिए अब विद्रोह ही एकमात्र रास्ता है जिसे वर्तमान नेतृत्व भूल गया है। वहीं चंद्रबाबू नायडू के शब्दों में बगावत पर कहा था कि “मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं एनटीआर के खिलाफ विद्रोह करूंगा। मेरे लिए एनटीआर सिर्फ ससुर नहीं थे, बल्कि एक भगवान थे जिनकी मैं पूजा करता था। लेकिन उन्हें 'दुष्ट शक्ति' के प्रभाव में आने के कारण समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था और इसलिए हमारे पास तेदेपा को बचाने के लिए कोई अन्य विकल्प नहीं बचा था। हमने उनके (लक्ष्मी पार्वती के) प्रभाव को रोकने और पार्टी को बचाने के लिए हर संभव कोशिश की लेकिन असफल रहे। फिर, हमारे पास कोई विकल्प नहीं बचा था, हमें 200 से अधिक विधायकों के समर्थन से नेतृत्व परिवर्तन और लोकतांत्रिक तरीके से (1995 में) सरकार बनानी पड़ी। 

-अभिनय आकाश 

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