By नीरज कुमार दुबे | Jun 17, 2026
उद्धव ठाकरे एक बार फिर अपनी पार्टी को एकजुट रखने में नाकाम दिखाई दे रहे हैं, लेकिन इसके लिए जिम्मेदारी स्वीकार करने की बजाय आरोप दूसरी पार्टियों और नेताओं पर लगाए जा रहे हैं। हम आपको बता दें कि शिवसेना यूबीटी में संभावित टूट की चर्चाओं ने महाराष्ट्र की राजनीति में नया भूचाल ला दिया है। अगर यह बिखराव सच साबित होता है तो इसका असर केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि केंद्र की राजनीति और विपक्षी गठबंधन की ताकत पर भी पड़ेगा।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच शिवसेना यूबीटी नेता संजय राउत लगातार हमलावर बने हुए हैं। उन्होंने दावा किया कि नांदेड से दो सांसदों को चार्टर्ड विमान के जरिए दिल्ली ले जाया गया। राउत ने कटाक्ष करते हुए कहा कि जिन लोगों के पास कभी रिक्शा से चलने तक के साधन नहीं थे, वे ठाकरे नाम की वजह से आज निजी विमानों में सफर कर रहे हैं। उन्होंने इसे राजनीतिक जवाबदेही से भागने की कोशिश बताया और कहा कि जनता तथा शिवसैनिक ऐसे लोगों को माफ नहीं करेंगे।
हालांकि राउत के आरोपों के बीच खुद शिवसेना यूबीटी के भीतर बेचैनी साफ दिखाई दे रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता कई सांसदों से संपर्क नहीं कर पा रहे हैं। कई सांसदों के फोन बंद बताए जा रहे हैं। उद्धव ठाकरे खुद व्यक्तिगत स्तर पर सांसदों को मनाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन पार्टी के अंदर असंतोष की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। दिल्ली में पार्टी की संसदीय समिति की बैठक रखी गई है, जिसमें कई सांसद पहुंचे हैं।
बागी के तौर पर जिन सांसदों के नाम सबसे अधिक चर्चा में हैं उनमें संजय दिना पाटिल, संजय देशमुख, नागेश पाटिल आष्टीकर, ओमराजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे और संजय जाधव शामिल हैं। पहले यह भी चर्चा थी कि नासिक के सांसद राजाभाऊ वाजे भी इस समूह में शामिल हो सकते हैं, लेकिन उन्होंने दिल्ली में संजय राउत के साथ प्रेस वार्ता में हिस्सा लेकर इन अटकलों को कमजोर करने की कोशिश की।
दिलचस्प बात यह है कि उद्धव ठाकरे द्वारा मुंबई में बुलाई गई बैठक में नौ में से केवल चार सांसद ही व्यक्तिगत रूप से पहुंचे थे। बाकी सांसदों ने ऑनलाइन या फोन के माध्यम से भाग लिया। कुछ सांसदों ने पारिवारिक या निजी कारणों का हवाला दिया। लेकिन इसके बाद संजय देशमुख की केंद्रीय मंत्री प्रतापराव जाधव से मुलाकात ने अटकलों को और तेज कर दिया।
उधर, शिंदे गुट के नेताओं ने भी संकेत दिए हैं कि अगर यूबीटी के सांसद उनके साथ आते हैं तो उनका स्वागत किया जाएगा। महाराष्ट्र सरकार में मंत्री प्रताप सरनाईक ने कहा कि अगर जनप्रतिनिधियों का अपने नेतृत्व पर भरोसा नहीं रहा और वे बाल ठाकरे की विचारधारा तथा एकनाथ शिंदे के नेतृत्व पर विश्वास जताना चाहते हैं तो शिवसेना के दरवाजे उनके लिए खुले हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे नेताओं को प्राथमिकता दी जाएगी।
दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने खुद को इस पूरे घटनाक्रम से अलग बताया है। भाजपा नेता और महाराष्ट्र सरकार में मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने कहा कि उनकी पार्टी का इन घटनाओं से कोई लेना देना नहीं है। हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि अगर लोग पार्टी छोड़ रहे हैं तो आत्ममंथन की जरूरत है। भाजपा ने यह संदेश देने की कोशिश की कि उसका ध्यान केवल शासन और विकास पर है।
वहीं संजय राउत ने आरोप लगाया कि सांसदों को तोड़ने के लिए प्रत्येक को पंद्रह करोड़ रुपये तक का प्रस्ताव दिया जा रहा है। उन्होंने इसे महाराष्ट्र की राजनीति को कलंकित करने वाला कदम बताया। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी की साठ साल पुरानी संगठनात्मक ताकत उसे ऐसे संकटों से उबार लेगी। लेकिन सवाल यह है कि अगर पार्टी वास्तव में मजबूत और एकजुट है तो फिर इतने सांसदों के संपर्क से बाहर होने की नौबत क्यों आई?
देखा जाये तो अगर शिवसेना यूबीटी में एक और बड़ी टूट होती है तो इसका सबसे ज्यादा नुकसान उद्धव ठाकरे की राजनीतिक विश्वसनीयता को होगा। पहले ही एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में पार्टी का बड़ा हिस्सा अलग हो चुका है। अब सांसदों के स्तर पर टूट होने से यह संदेश जाएगा कि उद्धव ठाकरे अपने संगठन और नेतृत्व पर पकड़ खो चुके हैं। इसका असर महाविकास आघाडी की एकजुटता पर भी पड़ेगा और विपक्षी गठबंधन में उनकी भूमिका कमजोर हो सकती है। यह भी कहा जा रहा है कि उद्धव ठाकरे अपने पिता की राजनीतिक विरासत को बचा कर रखने में नाकाम रहे।
बहरहाल, इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम का केंद्र की राजनीति में भी इसका असर दिखाई देगा। लोकसभा में विपक्ष की संख्या और रणनीतिक ताकत प्रभावित हो सकती है। साथ ही महाराष्ट्र में शिंदे गुट और भाजपा गठबंधन को और मजबूती मिलेगी। ऐसे में यह घटनाक्रम केवल दल बदल की साधारण कहानी नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति में बदलते शक्ति संतुलन का संकेत माना जा रहा है।