By संतोष कुमार पाठक | Feb 02, 2026
सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी द्वारा बनाए गए नए नियमों पर फिलहाल रोक तो लगा दिया है लेकिन इसके बावजूद यह विवाद अभी थमने का नाम नहीं ले रहा है। पहले यूजीसी द्वारा बनाए गए नियमों के खिलाफ अगड़ी जातियों के लोग सड़कों पर थे और अब इसके समर्थन में एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय के लोग सड़कों पर हैं। विवाद चाहे किसी भी मुद्दे पर हो, यह तनाव लाता है और समाज की शांति को भंग करता है। इसलिए विवाद को टालने की बजाय हमेशा स्थाई समाधान को तलाशने के लिए काम करना चाहिए।
सही मायने में देखा जाए तो यूजीसी नियमों पर मचे घमासान या यूं कहें कि ताजा विवाद ने दुनिया के सबसे प्राचीन और सबसे विशाल लोकतांत्रिक देश भारत को एक बड़ा मौका दे दिया है और हम अगर इस बार चूक गए तो फिर आने वाले कई दशकों तक यह विवाद देश और समाज की शांति को भंग करता रहेगा।
सामान्य भाषा में कहे तो हमारे देश के संविधान ने भारत में रहने वाले सभी लोगों को समानता का अधिकार दिया है, चाहे वो किसी भी जाति, धर्म या संप्रदाय से जुड़े हुए हो। भारतीय न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत तो यही रहा है कि 'सौ दोषी भले छूट जाएं, लेकिन एक भी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए।" यह सिद्धांत हमें स्पष्ट तौर पर बताता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और न्याय प्रणाली पर पूरे समाज के भरोसे को बरकरार रखने के लिए यह सबसे अधिक जरूरी है कि किसी भी निर्दोष को किसी भी हालत में वर्ष, महीने, दिन और घंटे तो छोड़िए, एक सेकंड के लिए भी प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहिए।
इस कसौटी पर रखकर जब यूजीसी के नियमों को तौला जाता है तो यह साफ-साफ नज़र आता है कि यूजीसी ने अपने नियम के जरिए भारत के लोकतांत्रिक और न्यायिक व्यवस्था के मूल सिद्धांत को ही कुचलने की तैयारी कर ली थी। कई लोग यह तर्क भी देते हुए नजर आए कि दुरुपयोग तो किसी भी कानून का हो सकता है। कुछ लोगों ने कई अन्य कानूनों के दुरुपयोग का उदाहरण दिया तो कुछ लोगों ने हज़ार वर्षों के शोषण का जिक्र करते हुए इसे सही ठहराया।
हालांकि भारत के लोगों के लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि यह मामला सिर्फ अगड़ा बनाम पिछड़ा भर का नहीं रह गया है और इसे रहना भी नहीं चाहिए। आज़ादी के 75 वर्षों बाद अब यह सोचने का समय आ गया है कि क्या हमारी व्यवस्था कानून का पालन करने वाले निर्दोष लोगों के साथ न्याय कर पा रही है। यह आपको अजीब लगेगा लेकिन सही मायनों में अब हमें इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाना चाहिए कि आखिर बिना किसी सजा के लोगों को दिन, महीने, साल ही नहीं दशकों तक जेल की सलाखों के पीछे रखने के लिए जिम्मेदार कौन है? महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून, दहेज, महिला उत्पीड़न सहित उन तमाम कानूनों की समीक्षा करने का वक्त आ गया है जो पुलिस को बिना किसी जांच के गिरफ्तार करने का अधिकार देते हैं।
एक लोकतांत्रिक देश में बिना किसी सबूत के किसी भी व्यक्ति को किसी भी सूरत में गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए। जो लोग हज़ारों वर्षों के शोषण की याद दिलाते हैं,उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि उनके स्तर को उठाने और भेदभाव खत्म करने के लिए ही आरक्षण की व्यवस्था लागू की गई है और देश का अगड़ा वर्ग भी पिछले कई दशकों से इसे स्वीकार कर चुका है। लेकिन किसी को भी इतना अधिकार तो नहीं दिया जाना चाहिए कि वो किसी और जाति, धर्म अथवा संप्रदाय के लोगों को बिना मतलब कानूनी विवाद में उलझा दें अथवा जेल भिजवा दें।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि, लोग ना जाने क्यों इस तथ्य को भी भुला देते हैं कि हज़ार साल पहले की शासन व्यवस्था चाहे जैसी भी रही हो लेकिन इस देश में पिछले 75 वर्षों से लोकतंत्र है, संसद है, न्यायपालिका है और मीडिया भी है। अगर हज़ार साल पहले ऐसा कुछ हुआ भी होगा जिसका दावा आमतौर पर किया जाता है तो क्या उसका बदला अब एक आज़ाद लोकतांत्रिक देश में लेने की इजाज़त दी जा सकती है। यह तो 'आंख के बदले आंख' लेने जैसा नियम लागू हो जाएगा।
वाद-विवाद में तथ्यों और आंकड़ों की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण होती है लेकिन दुर्भाग्य से आज के माहौल में कोई इस पर बात ही नहीं करना चाहता। ऐसा लगता है जैसे सब अपना-अपना दायरा पहले ही तय कर चुके हैं और कोई भी इससे आगे जाना ही नहीं चाहता।
शोषण कौन कर रहा है और शोषण किसका हो रहा है, यह तो किसी व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों के परसेप्शन के आधार पर तय नहीं हो सकता, इसकी गवाही तो सिर्फ और सिर्फ आंकड़ें ही दे सकते हैं और जैसे ही आप आंकड़ों को सामने रखते हैं तो सारी कहानी ही पलटी हुई नजर आती है।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि बार-बार आबादी के बहाने इस विवाद को सुलगाने की कोशिश करने वाले ये भूल जाते हैं कि अगर आप बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की बात करेंगे तो फिर संविधान निर्माताओं की भावना का सम्मान करते हुए ऐसे लोगों को जिनकी आबादी कम है, उन्हें तो कई तरह के विशेषाधिकार देने पड़ेंगे।
इसलिए , इस विवाद को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म करना अब बहुत जरूरी हो गया है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार बार-बार आज़ादी के 100 वर्ष पूरे होने यानी 2047 तक भारत को विकसित भारत बनाने का दावा कर रही है तो क्या एक विकसित भारत में भी हमारा देश अतीत की गठरी लेकर ही प्रवेश करेगा? इस सवाल का जवाब अब तो ढूंढ ही लेना चाहिए।
- संतोष कुमार पाठक
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं