By Ankit Jaiswal | Jan 06, 2026
दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का परिसर सोमवार रात एक बार फिर राजनीतिक नारों और विवाद के बीच आ गया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा छात्र कार्यकर्ता उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार किए जाने के बाद जेएनयू के साबरमती हॉस्टल इलाके में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक और विवादित नारे सुनाई दिए हैं।
इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए दिल्ली सरकार में मंत्री और भाजपा नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा है कि अगर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ भी विरोध शुरू कर दिया जाए तो फिर कहने को कुछ नहीं बचता है। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे लोग देश विरोधी सोच रखते हैं और प्रधानमंत्री के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल करते हैं, जिससे उनकी मंशा साफ झलकती है।
गौरतलब है कि उमर खालिद और शरजील इमाम पिछले पांच वर्षों से जेल में बंद हैं। उन पर वर्ष 2020 में हुए दिल्ली दंगों के पीछे कथित “बड़ी साजिश” का हिस्सा होने का आरोप है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले शामिल थे, ने सोमवार को कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश सामग्री से प्रथम दृष्टया मामला बनता है और ऐसे में गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए की धारा 43डी(5) के तहत जमानत पर कानूनी रोक लागू होती है।
अदालत ने यह भी कहा कि इस स्तर पर उपलब्ध साक्ष्य जमानत देने के पक्ष में नहीं हैं और रिकॉर्ड से संकेत मिलता है कि दोनों की भूमिका योजना बनाने, लोगों को संगठित करने और रणनीतिक दिशा-निर्देश देने तक रही है। हालांकि, इसी मामले में नामजद पांच अन्य आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दे दी है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सभी आरोपियों की भूमिका समान नहीं मानी जा सकती है। पीठ ने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम की स्थिति अन्य आरोपियों से अलग है और जमानत पर विचार करते समय हर आरोपी की भूमिका का अलग-अलग मूल्यांकन जरूरी है।
इस बीच, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने भी इस नारेबाजी पर कड़ा रुख अपनाया है। जेएनयू में एबीवीपी के सचिव प्रवीण के. पियूष ने कहा है कि वामपंथी छात्रों ने आरएसएस, एबीवीपी और प्रधानमंत्री के खिलाफ नारे लगाए हैं। संगठन ने विश्वविद्यालय प्रशासन और संबंधित एजेंसियों से शिकायत दर्ज कराने की बात कही है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
गौरतलब है कि जेएनयू पहले भी ऐसे राजनीतिक और वैचारिक टकरावों का केंद्र रहा है। इस ताजा घटनाक्रम ने एक बार फिर कैंपस की राजनीति, अभिव्यक्ति की सीमाएं और न्यायिक फैसलों के बाद पैदा होने वाले माहौल को लेकर बहस को तेज कर दिया है।