पुण्यतिथि विशेष: जवाहरलाल नेहरु से जुड़े अनछुए किस्से जिन्हें आपको भी जानना चाहिए

By अंकित सिंह | May 26, 2022

जब-जब आधुनिक भारत के निर्माताओं की बात होगी, उसमें देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की चर्चा जरूर होगी। जवाहरलाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री ही नहीं थे बल्कि वह महान स्वतंत्रता सेनानी भी थे जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ देश के लिए आजादी की लड़ाई लड़ी। दुनिया के तमाम सुखों को छोड़कर जवाहरलाल नेहरू ने देश की स्वतंत्रता को ज्यादा महत्व दिया और यही कारण रहा कि वे आजादी की लड़ाई में कूद गए। जवाहरलाल नेहरू महात्मा गांधी से काफी प्रभावित थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद जवाहरलाल नेहरू ने देश के लिए ऐसे कई फैसले लिए जिसकी वजह से आज भारत की नींव काफी मजबूत है। देश के पहले प्रधानमंत्री के बारे में कुछ अनछुए किस्से भी हैं जिसे आपको भी जानना चाहिए।

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- रुस्तम जी ने एक और वाकया साझा करते हुए लिखा कि एक बार जवाहरलाल नेहरू सऊदी अरब की यात्रा पर गए थे। वह महल के हर कमरे में जाकर बत्तियाँ बुझा रहे थे जिसे खासतौर पर उनके लिए ही जलाया गया था। इससे पता चलता है कि जवाहरलाल नेहरू किसी भी चीज को बर्बाद करने के पक्षधर नहीं थे।

- जवाहरलाल नेहरू का बाल काटने के लिए राष्ट्रपति भवन से एक नाई आया करता था। एक बार जवाहरलाल नेहरू ने उस नाई से पूछा कि मैं विदेश जा रहा हूं, बोलो तुम्हारे लिए क्या लाऊं? नाई ने मुस्कुराते हुए कहा कि मेरे लिए एक घड़ी लेते आइएगा, कभी-कभी आने में देर हो जाती है। जवाहरलाल नेहरू विदेश से उस नाई के लिए घड़ी लेकर आए।

- एक बार जवाहरलाल नेहरू की कार पंचर हो गई थी। तभी एक सरदार टैक्सी वाले ने उन्हें अपने कार में बैठने को कहा। जवाहरलाल नेहरु उस कार में बैठकर अपने दफ्तर पहुंच गए। लेकिन जब उन्होंने पैसे देने के लिए जेब को टटोला तो उनके पास कोई पैसा नहीं था। उस टैक्सी वाले ने बोला कि आप क्यों शर्मिंदा कर रहे हैं, मैं आपसे पैसे लूंगा। अब तो मैं 5 दिन किसी को इस सीट पर नहीं बैठाउंगा।

पूर्व विदेश सचिव दिनशॉ गुंडेविया अपनी आत्मकथा 'आउटसाइड आर्काइव्स' में एक बार मशहूर फिल्म अभिनेता चार्ली चैपलिन ने नेहरू को अपने घर खाने पर आमंत्रित किया था। नेहरू के लिए शैम्पेन की कई बोतलें भी लाई गई थी। चैपलिन ने एक शैम्पेन से भरी हुई क्लास नेहरू को थमाया। नेहरू ने कहा कि मैं नहीं पीता। जिसके बाद चैप्लिन ने कहा था कि प्रधानमंत्री महोदय आप कैसे मुझे मेरी शैंपेन पीने के सम्मान से वंचित रख सकते हैं। जिसके बाद नेहरू ने शैम्पेन से भरी गिलास को अपने होठों से लगाया था।

एक परिचय

प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को आधुनिक भारत का शिल्पकार माना जाता है। उनका जन्म इलाहाबाद में 14 नवम्बर 1889 को हुआ था। पंडित नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू एक बैरिस्टर थे और माता लाहौर की स्वरूपरानी थुस्सू थीं। जवाहर लाल नेहरू अपने भाई-बहनों में सबसे बड़े थे उनसे छोटी उनकी दो बहनें थीं। जवाहरलाल नेहरू की पढ़ाई ब्रिटेन के लंदन में हुई। उन्हें खेलों विशेष रूप से क्रिकेट में बहुत दिलचस्पी थी। अपनी पढ़ाई के दौरान वे लार्डस पर होने वाले मैच देखने भी चले जाते थे। पंडित नेहरू की छवि एक मृदुभाषी और कम बोलने वाले व ज्यादा सोचने वाले नेता की रही है। 1912 में उन्होंने लंदन के इनर टेंपल से वकालत की डिग्री हासिल की और उसी साल भारत लौट आए। उन्होंने इलाहाबाद में वकालत शुरू कर दी, लेकिन वकालत में उनकी ख़ास दिलचस्पी नहीं थी। भारतीय राजनीति में उनकी दिलचस्पी बढ़ने लगी और वह सियासी कार्यक्रमों में शिरकत करने लगे।

पंडित जवाहरलाल नेहरू 1916 के लखनऊ अधिवेशन में महात्मा गांधी के संपर्क में आए। मगर 1929 में कांग्रेस के ऐतिहासिक लाहौर अधिवेशन का अध्यक्ष चुने जाने तक नेहरू भारतीय राजनीति में अग्रणी भूमिका में नहीं आ पाए थे। इस अधिवेशन में भारत के राजनीतिक लक्ष्य के रूप में संपूर्ण स्वराज्य का ऐलान किया गया। कांग्रेस पार्टी के साथ नेहरू का जुड़ाव 1919 में प्रथम विश्व युद्ध के फ़ौरन बाद शुरू हुआ। उस वक़्त राष्ट्रवादी गतिविधियों की लहर ज़ोरों पर थी और अप्रैल 1919 को अमृतसर के नरसंहार के रूप में सरकारी दमन खुलकर सामने आया। कांग्रेस के साथ उनका राजनीतिक प्रशिक्षण 1919 से 1929 तक चला। 1923 में और फ़िर 1927 में वह दो-दो साल के लिए पार्टी के महासचिव बने। वह महात्मा गांधी के कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़े, चाहे असहयोग आंदोलन हो या फिर नमक सत्याग्रह, या फिर 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन हो। उन्होंने गांधी जी के हर आंदोलन में बढ़-चढ़कर शिरकत की। नेहरू की विश्व के बारे में जानकारी से गांधी जी काफ़ी प्रभावित थे और इसलिए आज़ादी के बाद वह उन्हें प्रधानमंत्री पद पर देखना चाहते थे।

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जब 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ तो पंडित जवाहर लाल नेहरू पहले प्रधानमंत्री बनें। लेकिन जब वह प्रधानमंत्री बने तो देश में परिस्थितियां बहुत विकट थी। हाल में देश का बंटवारा हुआ था और हिन्दू-मुस्लिम एकता को बनाए रखना बहुत बड़ी चुनौती थी। लेकिन नेहरू ने उस चुनौती को बखूबी स्वीकार किया तथा देश में एकता स्थापित कर धर्मनिरेपक्षता की रक्षा की। साथ ही उन्होंने अपने प्रधानमंत्री बनने के दौरान पंचवर्षीय योजनाएं जिससे भारत का विकास हुआ। नेहरू के कुशल नेतृत्व में, कांग्रेस पार्टी ने राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय चुनावों में लगातार प्रभुत्व दिखाते हुए और 1951, 1957, और 1962 के लगातार चुनाव जीतते हुए, देश में एक सर्व-ग्रहण पार्टी के रूप में अपनी पकड़ मजबूत की थी। उनके अन्तिम वर्षों में राजनीतिक मुसीबतों और 1962 के चीनी-भारत युद्ध में उनके नेतृत्व की असफलता के बावजूद, वे भारत के लोगों के बीच हमेशा लोकप्रिय बने रहें। यह महामानव 27 मई 1964 को देशवासियों को छोड़कर हमेशा के लिए चला गया।

- अंकित सिंह

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