आतंकवाद मामलों में जमानत पर Supreme Court में 'घमासान', Ajmal Kasab और Hafiz Saeed का नाम लेकर केंद्र ने अदालत से पूछे सवाल

By नीरज कुमार दुबे | May 22, 2026

सुप्रीम कोर्ट में गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम यानी यूएपीए के तहत दर्ज मामलों में जमानत को लेकर अलग अलग पीठों के फैसलों के बीच अब यह सवाल और गंभीर हो गया है कि क्या आतंकवाद जैसे मामलों में भी "जमानत नियम है और जेल अपवाद" का सिद्धांत उसी तरह लागू होगा। केंद्र सरकार ने आज इस मुद्दे को बड़ी पीठ के पास भेजने की जोरदार मांग की। हम आपको बता दें कि न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पीबी वराले की पीठ वर्ष 2020 के दिल्ली दंगा मामले के आरोपित तस्लीम अहमद और खालिद सैफी की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने जमानत याचिकाओं के साथ-साथ इस सवाल पर भी फैसला सुरक्षित रख लिया कि क्या इस पूरे विवाद को बड़ी पीठ के पास भेजा जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि आदेश बाद में या 25 मई को सुनाया जा सकता है।

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राजू ने अदालत के सामने यह भी कहा कि हाल के फैसले में अपराध की प्रकृति और आरोपित की भूमिका को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। उन्होंने याद दिलाया कि दिल्ली दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और ऐसे मामलों में सामान्य आपराधिक मामलों जैसा दृष्टिकोण नहीं अपनाया जा सकता। उनका कहना था कि अदालत को हर मामले की गंभीरता, आरोपित की भूमिका, मुकदमे की स्थिति और देरी के कारणों को साथ में देखना चाहिए।

दरअसल यह पूरा विवाद 18 मई को आए एक फैसले के बाद और गहरा गया। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानि एनआईए द्वारा जांचे जा रहे एक यूएपीए मामले में आरोपी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत देते हुए दो अन्य पीठों के पुराने फैसलों से असहमति जताई थी। अदालत ने कहा था कि "जमानत नियम है और जेल अपवाद" भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 से निकला एक मूल सिद्धांत है तथा किसी भी सभ्य समाज में निर्दोष मानने का सिद्धांत कानून का आधार होता है।

इस फैसले में अदालत ने फरवरी 2024 के गुरविंदर सिंह मामले और जनवरी 2026 के गुलफिशा फातिमा मामले में दिए गए आदेशों पर सवाल उठाया था। गुरविंदर सिंह मामला एक अलगाववादी गतिविधि से जुड़ा था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि आरोप पहली नजर में सही प्रतीत होते हैं, तो जमानत अपवाद हो सकती है और जेल सामान्य स्थिति मानी जाएगी। वहीं गुलफिशा फातिमा मामले में अदालत ने दिल्ली दंगा साजिश मामले के पांच आरोपितों को जमानत दी थी, लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम को राहत देने से इंकार कर दिया था। अदालत ने कहा था कि इन दोनों की भूमिका साजिश में अधिक गंभीर स्तर की दिखाई देती है।

गुलफिशा फातिमा मामले में अदालत ने यह भी कहा था कि केवल लंबे समय तक जेल में रहना अपने आप में जमानत पाने का पूर्ण अधिकार नहीं बन सकता, खासकर आतंकवाद से जुड़े मामलों में। हालांकि 18 मई के फैसले में न्यायमूर्ति नागरत्ना और न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि पुराने फैसलों का उपयोग यूएपीए के तहत आरोपितों को अनिश्चितकाल तक जेल में रखने के लिए नहीं किया जा सकता।

हम आपको यह भी बता दें कि इस बहस के केंद्र में वर्ष 2021 का यूनियन ऑफ इंडिया बनाम केए नजीब मामला भी है। उस फैसले में तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा था कि यदि त्वरित सुनवाई का मौलिक अधिकार प्रभावित हो रहा हो, तो यूएपीए जैसे कठोर कानून में भी जमानत दी जा सकती है। यह मामला केरल के चर्चित प्रोफेसर के हाथ काटने की घटना से जुड़ा था, जिसमें आरोपी वर्ष 2015 से जेल में था।

बहरहाल, अब सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आतंकवाद और राष्ट्र सुरक्षा से जुड़े मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। केंद्र सरकार का कहना है कि केवल मुकदमे में देरी को आधार बनाकर जमानत देना उचित नहीं होगा, जबकि दूसरी ओर अदालत के कुछ फैसले यह स्पष्ट कर रहे हैं कि किसी भी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना संविधान की भावना के विपरीत है। ऐसे में बड़ी पीठ का संभावित फैसला भविष्य में यूएपीए मामलों में जमानत की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।

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